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Climate Change: गर्मी बढ़ी, बर्फ घटी और बिगड़ा बारिश का चक्र; ग्लेशियर पिघलने से उभर रहा नया जलवायु खतरा

अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: हिमांशु चंदेल Updated Mon, 09 Feb 2026 05:36 AM IST
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सार

वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि पर्वतीय क्षेत्र मैदानी इलाकों से ज्यादा तेजी से गर्म हो रहे हैं। तापमान वृद्धि, कम बर्फबारी और बिगड़े वर्षा चक्र से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे भविष्य में जल संकट, बाढ़ और सूखे का खतरा बढ़ेगा। हिमालय समेत कई पर्वत क्षेत्रों में जैव विविधता भी खतरे में है। आइए इस, पूरी रिपोर्ट को विस्तार से समझते हैं।

Rising temperatures shrinking ice disrupted rainfall patterns new climate threat emerging as glaciers melt
जलवायु परिवर्तन (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : AI Generated
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विस्तार

जलवायु परिवर्तन का असर अब सबसे साफ और तेज रूप में दुनिया के पर्वतीय इलाकों में दिखाई दे रहा है। पहाड़, जिन्हें हमेशा ठंडा और स्थिर माना जाता था, अब तेजी से गर्म हो रहे हैं। तापमान बढ़ने, बर्फबारी घटने और बारिश के पैटर्न बदलने से नया जल संकट खड़ा हो रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इसका असर सीधे अरबों लोगों के जीवन और पानी के स्रोतों पर पड़ेगा।
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वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन के अनुसार पर्वतीय क्षेत्र मैदानी इलाकों की तुलना में ज्यादा तेजी से गर्म हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान औसतन प्रति दशक 0.21 डिग्री सेल्सियस ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ बर्फबारी कम हो रही है और वर्षा का संतुलन बिगड़ रहा है। शोध में बताया गया है कि ऊंचाई बढ़ने के साथ जलवायु परिवर्तन का असर भी तेज होता जाता है। इसी प्रवृत्ति को एलिवेशन-डिपेंडेंट क्लाइमेट चेंज कहा गया है।
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ग्लेशियर पिघले, जल संकट का खतरा बढ़ा
अध्ययन में रॉकी माउंटेंस, आल्प्स, एंडीज और तिब्बत पठार जैसी प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। 1980 से 2020 के बीच के डेटा से पता चला कि पहाड़ों में तापमान तेजी से बढ़ा है। कई क्षेत्रों में जहां पहले बर्फ गिरती थी, अब बारिश हो रही है। इससे हिमपात घटा है और ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियर पिघलने से पहले कुछ समय तक नदियों में पानी बढ़ेगा, लेकिन बाद में जल उपलब्धता कम हो सकती है।

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बारिश का पैटर्न टूटा, आपदाएं बढ़ीं
पर्वतीय इलाकों में वर्षा का चक्र अस्थिर हो गया है। कहीं बहुत ज्यादा बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। अचानक भारी वर्षा, बादल फटना और तेज बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। एशिया के कई पर्वतीय क्षेत्रों में हाल के वर्षों में आई बाढ़ और भूस्खलन को इसी बदलाव से जोड़ा जा रहा है। मौसम का यह असंतुलन स्थानीय आबादी, खेती और बुनियादी ढांचे के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।

जैव विविधता पर सीधा असर
तापमान बढ़ने का असर पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है। ठंडे मौसम पर निर्भर पौधे और जानवर ऊंचाई की ओर खिसक रहे हैं। लेकिन पहाड़ों की चोटी के बाद उनके पास आगे जाने की जगह नहीं बचती। इससे कई प्रजातियों के खत्म होने का खतरा बढ़ गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पहाड़ और आर्कटिक क्षेत्र सबसे तेजी से बदलते जलवायु क्षेत्र बन गए हैं, जहां बर्फ और जीव तंत्र दोनों दबाव में हैं।

हिमालय और भारत के लिए चेतावनी
हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती गर्मी भारत के लिए गंभीर जोखिम लेकर आ रही है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी बड़ी नदियां हिमनदों और बर्फ पर निर्भर हैं। अगर ग्लेशियर तेजी से घटते हैं तो लंबे समय में नदी जल कम हो सकता है। इससे खेती, पेयजल और जलविद्युत परियोजनाओं पर असर पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि पर्वतीय जलवायु बदलाव को अब वैश्विक नीति और स्थानीय योजना के केंद्र में लाना जरूरी है।


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