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Manoj Jha: राजद नेता बोले- नीतीश एनडीए में गए नहीं, ले जाये गए थे, अब मुद्दों पर आंदोलनात्मक तेवर अपनाने होंगे
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डॉ. मनोज झा, राष्ट्रीय जनता दल के सांसद
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विपक्षी इंडिया गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में गए नहीं बल्कि ले जाये गए जिसकी सच्चाई वक्त आने पर जरूर सामने आएगी। विपक्षी नेता शायद इस साजिश को वक्त रहते समझ नहीं पाये कि पर्दे के पीछे क्या चल रहा है। ये दावा किया है राष्ट्रीय जनता दल के सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. मनोज झा ने। उन्होंने इसके साथ ही कई अन्य मुद्दों पर अमर उजाला डिजिटल के कार्यक्रम खरी बात में खुलकर बात की।
मनोज झा ने कहा कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का नारा नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान का मूल विचार और संदेश तो शानदार है और वो उससे पूरी तरह सहमत हैं लेकिन बाजार और दुकान शब्द जमते नहीं हैं। इनकी जगह कुछ और हो सकता था जैसे नफरत की खेती में मोहब्बत के बीज या नफरत की आंधी में मोहब्बत की बयार। झा से पूछा गया कि बिहार की सामाजिक परिस्थिति में उनका झुकाव आरजेडी जैसे दल की तरफ कैसे हुआ तो उन्होने कहा कि अमेरिका के संदर्भ में पढ़ी हुई एक किताब व्हाइट प्रिवलेज और अयोध्या आंदोलन से बने वातावरण में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की विचारधारा ने उन्हें लालू प्रसाद यादव और राष्ट्रीय जनता दल की तरफ आकर्षित किया।
हार से आहत
मनोज झा कहते हैं कि बिहार चुनावों में राजद को मिली करारी हार ने उनकी पार्टी नेताओं के साथ आम लोगों को आहत किया क्योंकि राज्य में एक बड़ा वर्ग बदलाव चाहता था। भले ही हमारी सीटें बहुत कम रहीं पर हमारा जनाधार बढ़ा है और आज भी राजद ही बिहार में विकल्प है। चुनावी हार के लिए झा एसआईआर में काटे गए वोट, महिलाओं के खाते में डाले गए दस हजार और आगे दो लाख और देने के वादे को जिम्मेदार मानते हैं।
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हार
'अपनाने होंगे आंदोलनात्मक तेवर'
मनोज झा कहते हैं कि अब मुद्दों पर आंदोलनात्मक तेवर अपनाने होंगे। जैसे नीट पेपर लीक और सीबीएसई के गड़बड़झाले ने सरकार के सारे अवधारणा प्रबंधन को तार-तार कर दिया है। मुझे लगता है कि हमें और हमारे दल को तय करना होगा कि हमारी राजनीति चुनाव आयोग की घोषणा के बाद नहीं 24 घंटे करनी होगी। आम आदमी इस लड़ाई को पसंद करता है।
मनोज झा ने कहा कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का नारा नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान का मूल विचार और संदेश तो शानदार है और वो उससे पूरी तरह सहमत हैं लेकिन बाजार और दुकान शब्द जमते नहीं हैं। इनकी जगह कुछ और हो सकता था जैसे नफरत की खेती में मोहब्बत के बीज या नफरत की आंधी में मोहब्बत की बयार। झा से पूछा गया कि बिहार की सामाजिक परिस्थिति में उनका झुकाव आरजेडी जैसे दल की तरफ कैसे हुआ तो उन्होने कहा कि अमेरिका के संदर्भ में पढ़ी हुई एक किताब व्हाइट प्रिवलेज और अयोध्या आंदोलन से बने वातावरण में धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की विचारधारा ने उन्हें लालू प्रसाद यादव और राष्ट्रीय जनता दल की तरफ आकर्षित किया।
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हार से आहत
मनोज झा कहते हैं कि बिहार चुनावों में राजद को मिली करारी हार ने उनकी पार्टी नेताओं के साथ आम लोगों को आहत किया क्योंकि राज्य में एक बड़ा वर्ग बदलाव चाहता था। भले ही हमारी सीटें बहुत कम रहीं पर हमारा जनाधार बढ़ा है और आज भी राजद ही बिहार में विकल्प है। चुनावी हार के लिए झा एसआईआर में काटे गए वोट, महिलाओं के खाते में डाले गए दस हजार और आगे दो लाख और देने के वादे को जिम्मेदार मानते हैं।
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'अपनाने होंगे आंदोलनात्मक तेवर'
मनोज झा कहते हैं कि अब मुद्दों पर आंदोलनात्मक तेवर अपनाने होंगे। जैसे नीट पेपर लीक और सीबीएसई के गड़बड़झाले ने सरकार के सारे अवधारणा प्रबंधन को तार-तार कर दिया है। मुझे लगता है कि हमें और हमारे दल को तय करना होगा कि हमारी राजनीति चुनाव आयोग की घोषणा के बाद नहीं 24 घंटे करनी होगी। आम आदमी इस लड़ाई को पसंद करता है।