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आवारा कुत्तों का मामला: पंजाब सीएम के बयान पर याचिका, सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से साफ इनकार

पीटीआई, नई दिल्ली। Published by: राकेश कुमार Updated Mon, 25 May 2026 01:44 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी राजनेता के बयान के आधार पर अदालती फैसलों की व्याख्या नहीं बदली जा सकती। मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि नियमों को लागू कराने और किसी भी उल्लंघन पर नजर रखने की जिम्मेदारी अब सीधे राज्यों के हाई कोर्ट की है।
 

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सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बयान दिया है कि शीर्ष अदालत ने आवारा कुत्तों को मारने की खुली छूट दे दी है। मामले का उल्लेख करने वाले वकील से जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में कहा,'सिर्फ इसलिए कि किसी मुख्यमंत्री ने कोई बयान दिया है, क्या इसका मतलब यह है कि हमें अपना आदेश बदलना होगा?'


मुख्यमंत्री के एक्स पोस्ट पर आपत्ति
वकील ने अदालत को बताया कि 19 मई को आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर एक एक्स पोस्ट किया था। इस पोस्ट में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को मारने की खुली छूट दे दी है। इस दलील पर पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, 'आप पंजाब हाई कोर्ट जाइए।' इसके साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया, 'हम आपकी इस बात पर विचार नहीं कर रहे हैं।' हालांकि, वकील का यह दावा जारी रहा कि शीर्ष अदालत के फैसले के बाद आवारा कुत्तों को मारा जा रहा है।
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यह भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट: कॉकरोच जनता पार्टी के खिलाफ जनहित याचिका, सीजेआई बोले- मुद्दे को भावनात्मक तरीके से न लें
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मानवीय गरिमा और सुरक्षा सर्वोपरि- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 19 मई को दिए अपने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में इंसानी जिंदगी के खतरे को कम करने के लिए रैबीज से पीड़ित, लाइलाज, खतरनाक और आक्रामक कुत्तों को इच्छामृत्यु देने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने कहा था कि सम्मान के साथ जीने के अधिकार में बिना किसी डर के स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार भी शामिल है। अपने इस ऐतिहासिक आदेश में सर्वोच्च अदालत ने साफ किया था कि जब इंसानों की सुरक्षा और जिंदगी की तुलना जानवरों के कल्याण से होगी, तो संवैधानिक संतुलन निश्चित तौर पर मानव जीवन की सुरक्षा के पक्ष में झुकेगा।

हाई कोर्ट्स को सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों से निपटने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, देश के सभी हाई कोर्ट्स को आदेश दिया गया है कि वे इस मामले में 22 अगस्त 2025 और 7 नवंबर 2025 को जारी दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए खुद संज्ञान लेकर मामला दर्ज करें।

छत्तीसगढ़ के पूर्व आबकारी आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, राज्य से बाहर रहने की शर्त
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को छत्तीसगढ़ के शराब नीति घोटाला मामलेमें बड़ी राहत देते हुए पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास को दो अलग-अलग मामलों में जमानत दे दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुप एम पांचोली की पीठ ने नोट किया कि मामले के अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है और मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में काफी समय लगेगा। 

कथित तौर पर मुख्य सरगना बताए गए निरंजन दास 18 सितंबर 2025 को गिरफ्तार किया गया था। कोर्ट ने उन पर अन्य सह-आरोपियों जैसी ही शर्तें लागू की हैं, जिसके तहत उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर रहना होगा और वह केवल मुकदमे या जांच में शामिल होने के लिए ही राज्य जा सकेंगे, हालांकि बाद में वे इन शर्तों में ढील की मांग कर सकते हैं।

यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की अगुवाई वाली पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान 2019 से 2023 के बीच हुए कथित शराब घोटाले से जुड़ा है। राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से एक आपराधिक सिंडिकेट ने सरकारी दुकानों में शराब की आपूर्ति कर अवैध कमीशन वसूला था। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, इस घोटाले से सरकारी खजाने को कुल 2,883 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान है, जिसकी मनी लॉन्ड्रिंग जांच 11 अप्रैल 2024 से जारी है, जबकि राज्य की आर्थिक अपराध शाखा 17 जनवरी 2024 से इसके आपराधिक पहलुओं की जांच कर रही है। इससे पहले, इसी मामले से जुड़ी मुख्यमंत्री कार्यालय की पूर्व उप सचिव सौम्या चौरसिया को भी छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से एक मार्च को जमानत मिल चुकी है।
 

पंजाब: बैलेट पेपर के इस्तेमाल के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज, कल होगी वोटिंग
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें पंजाब राज्य चुनाव आयोग द्वारा नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव बैलेट पेपर से कराने के फैसले को चुनौती दी गई थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुत एम पांचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता रुचिता गर्ग द्वारा अदालत में देर से आने पर कड़ा सवाल उठाया और कहा कि वे अब चुनाव प्रक्रिया को अस्थिर नहीं कर सकते क्योंकि चुनाव कल 26 मई को ही होने हैं। अब बिल्कुल समय नहीं बचा है। 

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि चुनाव बैलेट पेपर से कराए जा रहे हैं जो कि ईवीएम के इस्तेमाल वाले सर्वोच्च अदालत के पिछले फैसलों के खिलाफ है, लेकिन पीठ ने चुनाव में कोई भी पर्यवेक्षक नियुक्त करने से साफ इनकार कर दिया। दरअसल, यह याचिका पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसने राज्य चुनाव आयोग के बैलेट पेपर से चुनाव कराने के फैसले को सही ठहराया था।

पंजाब के आठ नगर निगमों सहित कुल 104 नगर निकायों के लिए मतदान 26 मई को होना है, जबकि वोटों की गिनती 29 मई को की जाएगी। इससे पहले, राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट को बताया था कि भारत निर्वाचन आयोग की ओर से तय समय-सारणी के अनुसार ईवीएम उपलब्ध न करा पाने के कारण स्थानीय निकाय चुनाव बैलेट पेपर से कराने पड़ रहे हैं, वहीं राज्य सरकार के वकील ने भी इस याचिका के विचारणीय होने का कड़ा विरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि उन्हें चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक अधिसूचना का इंतजार करने की जरूरत नहीं थी क्योंकि वह पहले से जानती थीं कि चुनाव होने वाले हैं और इस मामले में पहले भी कई दौर की मुकदमेबाजी हो चुकी है।

 
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