सुप्रीम कोर्ट: 'देश की सीमाओं पर सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं सीएपीएफ अफसर, उन्हें अलग नहीं माना जा सकता'
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मानना गलत है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में नेतृत्व के लिए सक्षम अधिकारियों की कमी है। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब वह इस मामले की खुद निगरानी करेगा।
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विस्तार
सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (सीएपीएफ) के कैडर अफसरों के 'संगठित समूह 'ए' सेवा' (ओजीएएस) मामले में अवमानना केस की सुनवाई करते हुए कहा, 'यह मानना गलत है कि सीएपीएफ में नेतृत्व करने के लिए सक्षम अधिकारी नहीं हैं। सीएपीएफ अधिकारी देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं। उनके पास 30 साल का अनुभव है, ऐसे में उन्हें अलग नहीं माना जा सकता। सरकार की तरह न्यायपालिका को भी उनकी चिंता है। कैडर अफसरों के मामले को लेकर सर्विस रूल्स में क्या बदलाव किया गया है, पूरा रोडमैप क्या है। 23 मई 2025 का फैसला लागू करने के लिए सरकार ने अभी तक क्या किया है। इस बाबत केंद्रीय गृह सचिव से दो सप्ताह में जवाब मांगा गया है। सर्वोच्च अदालत ने संकेत दिया है कि अब इस मामले निगरानी वह खुद करेगा।
आईपीएस की संख्या बढ़ती चली गई
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 मई 2025 में संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार, मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया था। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने सीएपीएफ के ग्रुप 'ए' कार्यपालक संवर्ग को 'संगठित ग्रुप 'ए' सेवा' (ओजीएएस) घोषित करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। उनमें आईजी स्तर तक आईपीएस की प्रतिनियुक्ति में चरणबद्ध तरीके से कमी लाना, सीएपीएफ में नियमित कैडर समीक्षा करना, नए सेवा नियमों का निर्माण तथा नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) लागू कर दीर्घकालीन पदोन्नति ठहराव को दूर करना शामिल था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी सीएपीएफ (सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी) में 'एसएजी' ग्रेड तक दो साल के भीतर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए, लेकिन उक्त पदों पर आईपीएस की संख्या बढ़ती चली गई। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ सरकार ने संसद में 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026' पारित करा दिया।
इसलिए दायर हुई अवमानना याचिका
सर्वोच्च अदालत के फैसले पर तय अवधि में जब सरकार ने कुछ नहीं किया तो दिसंबर 2025 में रिटायर्ड कैडर अधिकारियों द्वारा केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की गई। केस की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने सीएपीएफ अधिकारियों की खुलकर तारीफ की है। सुप्रीम कोर्ट ने गृह सचिव से पूछा है कि एसएजी तक प्रतिनियुक्ति के पद कम करने के आदेश पर अब तक क्या किया गया है। कितने पद कम हुए हैं। सेवा नियमों में कोई बदलाव किया गया है, इसका पूरा रोडमैप बताया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह अपने फैसले के पालन की खुद मॉनिटरिंग करेगा। इस मामले में उठाए गए हर कदम की जानकारी सरकार को देनी होगी। केस की अगली सुनवाई 22 सितंबर को तय की गई है। पिछले दिनों कैडर अफसरों द्वारा 'सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026' को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
56 से ज्यादा आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर आए
सुप्रीम कोर्ट का 23 मई 2025 का वह फैसला, गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन, कैडर समीक्षा और आईपीएस प्रतिनियुक्ति को समाप्त करने के लिए भर्ती नियमों के पुनर्गठन व संशोधन की मांग वाली कई याचिकाओं पर आया था। सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि देश की सीमाओं पर सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा कर्तव्यों के निर्वहन के लिए सीएपीएफ की भूमिका महत्वपूर्ण है। केंद्रीय गृह मंत्रालय को छह माह के भीतर इस फैसले का पालन करना था। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार, रिव्यू पिटीशन में चली गई। पिछले साल 28 अक्तूबर को सर्वोच्च अदालत में जस्टिस सूर्य कांत (अब चीफ जस्टिस) और जस्टिस उज्जल भुइयां की बैंच द्वारा रिव्यू पिटीशन को डिसमिस कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम किया जाए। दूसरी तरफ गत छह माह में केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति में तेजी देखने को मिली। 56 से ज्यादा आईपीएस ने सीएपीएफ में प्रतिनियुक्ति पर ज्वाइन किया।
स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका
पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि सीएपीएफ के नए अधिनियम के माध्यम से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में आईजी तथा उससे ऊपर के पदों पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को न्यूनतम प्रतिशत के साथ वैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। साथ ही, सेवा संबंधी मामलों में गृह मंत्रालय को व्यापक एवं सर्वोपरि अधिकार दिए गए हैं, जिससे सीएपीएफ की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करने के लिए कई बार समय मांगा, किंतु आश्चर्यजनक रूप से उसी दौरान ऐसा विधेयक लेकर आई, जिसे अनेक अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय की भावना और निर्देशों के विपरीत बताया। मौजूद केस में सेवारत अधिकारियों के अलावा पूर्व कैडर अफसर भी वकालतनामे पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।