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Supreme Court: जस्टिस वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, संसदीय समिति के गठन के खिलाफ याचिका हुई खारिज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 16 Jan 2026 11:03 AM IST
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सार
घर से भारी संख्या में नकदी बरामद होने के मामले में जस्टिस वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। दरअसल जस्टिस वर्मा ने इस मामले की जांच के लिए संसदीय समिति के गठन का विरोध किया था और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज कर दी है।
करूर भगदड़ हादसे पर सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा की याचिका खारिज कर दी। जज वर्मा ने उस संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी थी, जिसे लोकसभा के स्पीकर ने उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए बनाया था। जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस एस. सी. शर्मा की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने इस मामले में सुनवाई पूरी कर 8 जनवरी 2026 को अपना निर्णय सुरक्षित रखा लिया था।
जस्टिस वर्मा ने याचिका में दिए थे ये तर्क
लोकसभा और राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था
21 जुलाई 2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए दो अलग-अलग प्रस्तावों को लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया गया था। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच के लिए एक संसदीय समिति का गठन करने का आदेश दिया। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के कारण राज्यसभा में उपसभापति ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।
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जस्टिस वर्मा ने याचिका में दिए थे ये तर्क
- जस्टिस वर्मा की ओर से दायर याचिका में न्यायाधीश जांच अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया के तहत लोकसभा की तरफ से गठित तीन सदस्यीय समिति की वैधता को चुनौती दी गई थी।
- याचिका में कहा गया है, 'न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के तहत माननीय समिति का गठन करने के संबंध में लोकसभा के माननीय अध्यक्ष की ओर से की गई विवादित कार्रवाई को असंवैधानिक घोषित और निरस्त करने के लिए निर्देश जारी किया जाए।'
- याचिका में इस आदेश को भारत के संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 का उल्लंघन बताते हुए न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत कानून की ओर से स्थापित प्रक्रिया के उलट कहा गया।
- जस्टिस वर्मा की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया था कि संसद के दोनों सदनों में उन्हें हटाने के संबंध में प्रस्ताव पेश करने के लिए यह जरूरी है कि तीन सदस्यीय समिति का गठन लोकसभा और राज्यसभा दोनों की ओर से संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए था, न कि लोकसभा अध्यक्ष की तरफ से एकतरफा रूप से।
- गौरतलब है कि जज वर्मा को हटाने के लिए पेश प्रस्ताव को राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने खारिज कर दिया था।
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लोकसभा और राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था
21 जुलाई 2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए दो अलग-अलग प्रस्तावों को लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया गया था। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच के लिए एक संसदीय समिति का गठन करने का आदेश दिया। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के कारण राज्यसभा में उपसभापति ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।
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