कैंसर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: 19 राज्यों से पूछा- कब होगी हर मरीज की अनिवार्य रिपोर्टिंग?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बाकी बचे 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा कि वे कैंसर का जल्द पता लगाने और मरीजों को बेहतर उपचार एवं देखभाल उपलब्ध कराने के लिए इसे ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने पर उचित निर्णय लें।
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने पर अब तक कदम नहीं उठाने वाले 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उचित निर्णय लेने को कहा है। अदालत ने एक समान नीति और अनुपालन हलफनामे दाखिल करने की बात कही। यह मामला कैंसर की अनिवार्य रिपोर्टिंग, शुरुआती पहचान, राष्ट्रीय स्तर की रियल-टाइम डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री और देशभर में स्क्रीनिंग व्यवस्था से जुड़ा है। PIL में मौजूदा कैंसर रजिस्ट्री की सीमित कवरेज और अवैज्ञानिक वैकल्पिक उपचारों के दावों को लेकर भी चिंता जताई गई है। बता दें कि ‘नोटिफिएबल बीमारी’ यानी ऐसी बीमारी होती है, जिसके मामलों की जानकारी संबंधित सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को देना अनिवार्य होता है।
कितने राज्यों ने कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित किया?
शीर्ष अदालत का यह निर्देश उस समय आया, जब उसे बताया गया कि संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में की गई सिफारिशों के आधार पर देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 17 ने अब तक कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित कर दिया है।
किस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है सुप्रीम कोर्ट?
अदालत ने पिछले साल 12 दिसंबर को मशहूर डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव की जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। याचिका में देशभर में कैंसर का जल्द पता लगाने और मरीजों को उचित उपचार एवं देखभाल सुनिश्चित करने के लिए इसे ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
केंद्र से सुप्रीम कोर्ट ने एक समान नीति पर क्या पूछा?
मंगलवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा कि वह 'सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश' क्यों जारी नहीं कर रही है। पीठ ने कहा कि इस मामले में एक समान नीति होनी चाहिए। इस मामले पर केंद्र सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने कहा कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है। CJI सूर्य कांत ने कहा कि हम बाकी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देते हैं कि वे ऊपर बताई गई सिफारिशों पर विचार करें और उचित निर्णय लें। अनुपालन हलफनामे दाखिल करने होंगे।
याचिका में केंद्र और राज्यों पर क्या आरोप लगाया गया?
अपनी याचिका में डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव ने पूरे भारत में कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित करने में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा राज्यों की कथित विफलता को उजागर किया है।
याचिका में कहा गया है, 'प्रतिवादी नंबर 1 (केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय) के खिलाफ उचित रिट मैंडमस जारी करें, ताकि भारत में कैंसर के मामलों की एक समान और अनिवार्य रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के लिए कैंसर को नोटिफिएबल बीमारी घोषित किया जा सके।
कैंसर की रिपोर्टिंग को मौलिक अधिकारों से कैसे जोड़ा गया?
याचिका में कहा गया है, 'भारत में कैंसर का बोझ खतरनाक रूप से बढ़ने के बावजूद इसे नोटिफाई न करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत राज्य के संवैधानिक कर्तव्य का गंभीर उल्लंघन है, क्योंकि यह एक जैसी स्थिति वाले नागरिकों को समान इलाज से वंचित करता है और स्वास्थ्य एवं सम्मान के साथ जीने के उनके मौलिक अधिकार को कमजोर करता है।' केंद्र सरकार और सभी राज्यों के अलावा दिल्ली के एम्स में सर्जिकल डिसिप्लिन विभाग के पूर्व प्रमुख डॉक्टर श्रीवास्तव ने ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रिवेंशन एंड रिसर्च’ को भी इस PIL में एक पक्ष बनाया है।
अनिवार्य रिपोर्टिंग न होने से क्या समस्या पैदा हो रही है?
याचिका में कहा गया है कि कैंसर के मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग नहीं होने के कारण डेटा बिखरा हुआ है, निगरानी व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रही है और भारत में तेजी से बढ़ रहे कैंसर के बोझ से निपटने में ‘‘पॉलिसी पैरालिसिस’’ यानी नीतिगत गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई है।
याचिका में CoWIN जैसी कैंसर रजिस्ट्री की मांग क्यों की गई?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह अधिकारियों को पूरे देश में कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने का निर्देश दे। इसके साथ ही कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू किए गए CoWIN प्लेटफॉर्म की तर्ज पर एक एकीकृत और रियल-टाइम डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री बनाने की भी मांग की गई है।
क्या कैंसर को नोटिफाई करने का अधिकार केवल राज्यों के पास है?
याचिका में कहा गया है कि संविधान के तहत स्वास्थ्य मुख्य रूप से राज्य का विषय है, लेकिन बीमारियों को नोटिफाई करने का अधिकार केंद्र और राज्य, दोनों के पास है। याचिका के अनुसार, इस दोहरी स्थिति के कारण एक 'कानूनी शून्य' पैदा हो गया है। कुछ राज्यों ने कैंसर को नोटिफाई किया है, जबकि कई अन्य राज्यों ने ऐसा नहीं किया है। इससे कैंसर की रिपोर्टिंग और शुरुआती पहचान में भारी असमानताएं पैदा हो रही हैं।
एक समान नोटिफिकेशन नहीं होने का मरीजों पर क्या असर पड़ता है?
याचिका के मुताबिक, एक समान नोटिफिकेशन नहीं होने से कैंसर की निगरानी में बड़ी असमानताएं पैदा हुई हैं। इसके परिणामस्वरूप बीमारी का पता अक्सर देर से चलता है, इलाज का खर्च बढ़ जाता है और मरीजों के उपचार के नतीजे खराब होते हैं। याचिका के अनुसार, कई राज्यों में मरीजों में कैंसर का पता तब चलता है, जब बीमारी एडवांस स्टेज यानी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है। इस चरण में इलाज के जरिए बीमारी को ठीक करना ‘‘मुश्किल, महंगा या असंभव’’ हो सकता है।
मौजूदा नेशनल कैंसर रजिस्ट्री की कवरेज कितनी है?
यह PIL इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की ओर से चलाए जा रहे ‘नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम’ (NCRP) की बड़ी कमियों को भी उजागर करती है। फिलहाल यह रजिस्ट्री देश की आबादी के केवल 10 प्रतिशत हिस्से को ही कवर करती है और ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी कवरेज सिर्फ 1 प्रतिशत है।
याचिका में कैंसर के वैकल्पिक इलाज को लेकर क्या चिंता जताई गई?
याचिका में कहा गया है कि संकट को और बढ़ाने वाली एक समस्या कैंसर के अवैज्ञानिक और बिना जांचे-परखे वैकल्पिक उपचारों का बढ़ता चलन है। इनमें कैंसर के इलाज के तौर पर गोमूत्र (गाय के पेशाब) के इस्तेमाल का व्यापक रूप से किया जाने वाला दावा भी शामिल है।
क्या गोमूत्र को कैंसर के प्रभावी इलाज के तौर पर वैज्ञानिक प्रमाण मिला है?
याचिका में कहा गया है, 'राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में दायर एक RTI से पता चला है कि किसी भी वैज्ञानिक शोध में गोमूत्र को कैंसर के प्रभावी इलाज के तौर पर साबित नहीं किया गया है। फिर भी, नियमन और लोगों में जागरूकता की कमी के कारण मरीज ऐसे गुमराह करने वाले दावों का शिकार होते रहते हैं। इससे इलाज में देरी होती है और ऐसी मौतें होती हैं, जिन्हें रोका जा सकता था।'
सरकार से किस तरह की स्पष्ट नीति की मांग की गई है?
याचिका में कहा गया है कि इन परिस्थितियों से सरकार की ओर से एक स्पष्ट नीतिगत बयान जारी करने की तत्काल जरूरत सामने आती है। इसमें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार पद्धतियों और बिना जांचे-परखे दावों के बीच अंतर स्पष्ट किया जाना चाहिए। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भारत में केवल साक्ष्य-आधारित उपचार, चाहे वह आधुनिक हो या पारंपरिक, के अभ्यास या प्रचार की अनुमति हो।
सुप्रीम कोर्ट से याचिकाकर्ता ने अंतिम तौर पर क्या मांग की है?
याचिका में कहा गया है, 'इन हालात में, बहुत सम्मानपूर्वक यह प्रार्थना की जाती है कि यह माननीय न्यायालय उचित रिट, आदेश या निर्देश (जैसे कि मैंडमस) जारी करे, जिसमें संबंधित अधिकारियों को कैंसर से निपटने की राष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए तत्काल, समन्वित और कानूनी रूप से लागू होने वाले उपाय करने का निर्देश दिया जाए।'
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देशभर में कैंसर स्क्रीनिंग को लेकर क्या मांग की गई है?
याचिका में एक केंद्रीय, रियल-टाइम डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसे NCRP, अस्पतालों के डेटाबेस, राज्य की बीमा योजनाओं और मृत्यु रिकॉर्ड से जोड़े जाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही याचिका में पूरे देश में कैंसर की स्क्रीनिंग लागू करने के लिए भी निर्देश जारी करने की मांग की गई है।