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Supreme Court: 'इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश चिंताजनक और कानून की अवहेलना'; इंडिया बुल्स के खिलाफ जांच पर रोक हटी

Thu, 15 Feb 2024 02:42 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 15 Feb 2024 02:42 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने 2800 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर चिंता जताई है। हाईकोर्ट के आदेश को कानून की अवहेलना बताते हुए शीर्ष अदालत ने इंडिया बुल्स के खिलाफ जांच पर लगी रोक को हटा दिया।

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Supreme Court India Bulls 2800 Crore Fraud Allahabad High Court Verdict
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने 2,800 करोड़ रुपये की संपत्तियों की धोखाधड़ी के मामले में इंडिया बुल्स हाउसिंग फाइनेंस लि. व अन्य के खिलाफ जांच पर रोक वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट की ओर से कंपनी के अधिकारियों को गिरफ्तारी से बचाने पर गंभीर चिंता जताई। शीर्ष अदालत ने इसे कानून की अवहेलना बताया। 
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अग्रिम जमानत के लिए आवेदन
जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने कहा, शीर्ष अदालत के फैसलों में तय की गई कानूनी स्थिति के बावजूद हाईकोर्ट ने संबंधित एफआईआर और ईसीआईआर की जांच पर रोक का आदेश दिया। हाईकोर्ट ने साथ ही आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किए बिना गिरफ्तारी पर रोक लगाने के व्यापक आदेश दिए। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तीन याधिक हरामकार है कि याचिकाओं हुए, पीठ ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियां हाईकोर्ट को सनक में कार्य करने के लिए कोई मनमाना अधिकार प्रदान नहीं करती है।
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शिप्रा समूह की एफआईआर में अंतरिम राहत
हाईकोर्ट ने दिया था यह आदेश हाईकोर्ट ने 13 जुलाई, 2023 से 13 सितंबर, 2023 के बीच पारित तीन अलग- अलग आदेशों के जरिये नीरज त्यागी, आईएचएफएल की रीना बग्गा और एमउएम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अन्य को गिरवी संपत्तियों की धोखाधड़ी से बिक्री के लिए शिप्रा समूह की एफआईआर में अंतरिम राहत प्रदान की थी। दूसरा मामला शेयरों के ट्रांसफर से जुड़ा था।
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हाईकोर्ट में अधिकारियों को बचाने की कोशिश
ईडी की ओर से तर्क दिया गया था कि हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को राहत प्रदान करने वाले इस अदालत द्वारा पारित 4 जुलाई, 2023 के आदेश का पालन करने की आड़ में बिना कोई ठोस कारण चताए आदेश पारित कर दिया। जबकि उक्त आदेश के खिलाफ एक समीक्षा याचिका लंबित थी। इस तर्क से सहमति जताते हुए पीठ ने कहा, इस अदालत ने उक्त आदेश पारित किया था और हाईकोर्ट को मेरिट के आधार पर रिट याचिकाओं पर निर्णय लेने की छूट दी थी। पीठ ने कहा कि वह मेरिट के आधार पर अपनी राय व्यक्त नहीं करेगी क्योंकि रिट याचिकाएं हाईकोर्ट के समक्ष लंबित हैं।

हालांकि अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को न्यायिक अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए कानून का पालन करना चाहिए। अपनी सनक और मनमर्जी के अनुसार कार्य करने के लिए अपनी असाधारण और अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग नहीं करना चाहिए। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वैधानिक शक्ति का इस्तेमाल सावधानी से और दुर्लभतम मामलों में किया जाना चाहिए।


क्या है धोखाधड़ी का पूरा मामला
आरोप है कि 2017 और 2020 के बीच, आईएचएफएल ने शिप्रा समूह/उधारकर्ताओं को 2,801 करोड़ रुपये के 16 कर्ज स्वीकृत किए थे। हालांकि शिप्रा समूह आईएचएफएल को ऋण भुगतान में चूक गया। इस प्रकार, शिप्रा समूह की संपत्ति, विशेष रूप से शिप्रा मॉल को आईएचएफएल ने नीलाम किया। हिमरी एस्टेट ने सबसे ऊंची बोली लगाकर मॉल खरीद लिया। शिप्रा ग्रुप के प्रतिनिधि मोहित सिंह ने आईएचएफएल और हिमरी एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारियों के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज की। आरोप लगाया कि शिप्रा मॉल को बिक्री अवैध थी क्योंकि इसे कम मूल्यांकन पर बेचा गया था। इस बिक्री से राज्य को राजस्व की भारी हानि हुई। इसके अलावा, यह आरोप लगाया गया कि आईएचएफएल ने अवैध रूप से शिप्रा समूह को डिफॉल्टर के रूप में दिखाया था ताकि वे समूह के स्वामित्व वाली संपत्तियों का दुरुपयोग कर सकें।
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