Supreme Court: दहेज मामलों पर अदालत की सख्त टिप्पणी, कहा- सामान्य आरोपों पर ससुराल पक्ष को नहीं घसीटा जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दहेज मामलों में केवल सामान्य आरोपों के आधार पर ससुराल पक्ष को परेशान नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश के एक मामले में कोर्ट ने सास, ससुर और ननद के खिलाफ केस खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि ठोस साक्ष्य जरूरी हैं और शिकायत में देरी से केस कमजोर होता है।
विस्तार
दहेज उत्पीड़न के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों को परेशान नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश के एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सास, ससुर और ननद के खिलाफ दर्ज आपराधिक केस को खारिज कर दिया। अदालत ने यह भी कहा कि कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए और हर मामले में ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने की। यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें एफआईआर रद्द करने से इनकार किया गया था। महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 323 और दहेज निषेध कानून के तहत आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोप सामान्य हैं और उनके समर्थन में ठोस साक्ष्य नहीं हैं।
क्या थे आरोप और अदालत ने क्या पाया?
महिला ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद उससे 8.5 लाख रुपये और कार की मांग की गई। उसने यह भी कहा कि गर्भावस्था के दौरान उसके साथ मारपीट हुई और गर्भपात हो गया। हालांकि जांच में गर्भपात से जुड़े आरोप साबित नहीं हुए और मेडिकल रिकॉर्ड ने भी इसका समर्थन नहीं किया। अदालत ने पाया कि आरोपों में स्पष्टता नहीं है और ससुराल पक्ष की भूमिका भी साफ नहीं बताई गई है।
क्या देरी ने केस को कमजोर किया?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि शिकायत दर्ज कराने में छह साल से ज्यादा की देरी हुई, जिससे साक्ष्य कमजोर हो गए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में समय पर शिकायत करना जरूरी है, क्योंकि देरी से मामले की सच्चाई सामने लाना मुश्किल हो जाता है। यह देरी भी केस को कमजोर करने वाला बड़ा कारण बनी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या संदेश दिया?
अदालत ने साफ कहा कि दहेज कानून का इस्तेमाल बदले की भावना से नहीं किया जाना चाहिए। केवल यह कहना कि दहेज मांगा गया या उत्पीड़न हुआ, पर्याप्त नहीं है जब तक ठोस साक्ष्य न हों। कोर्ट ने एफआईआर, चार्जशीट और चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर अन्य वैवाहिक मामलों पर नहीं पड़ेगा।
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