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माननीयों का आपराधिक रिकॉर्ड: 326 सांसदों और 14 मुख्यमंत्रियों के खिलाफ मामले, सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश
Mon, 17 Aug 2026 08:52 PM IST
Devesh Tripathi
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 17 Aug 2026 08:52 PM IST
सार
राजनीति के अपराधीकरण से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश रिपोर्ट में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों की स्थिति सामने आई है। न्याय मित्र विजय हंसारिया के हलफनामे के अनुसार, लोकसभा के 251 और राज्यसभा के 75 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। सांसदों और विधायकों से जुड़े कुल 4,192 मामले लंबित बताए गए हैं।
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सुप्रीम कोर्ट में पेश रिपोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
राजनीति के अपराधीकरण पर सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लोकसभा के 543 में से 251 सदस्यों और राज्यसभा के 233 में से 75 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के जल्द निपटारे की मांग वाली जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के न्याय मित्र नियुक्त वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया की ओर से दाखिल हलफनामे में यह जानकारी दी गई है।
हलफनामे में कहा गया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ 4,000 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। हलफनामे के अनुसार, 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। इनमें गंभीर मामले भी शामिल हैं।
किस मुख्यमंत्री पर सबसे ज्यादा आपराधिक मामले?
आंकड़ों के मुताबिक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के खिलाफ 89 मामले हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ 19 मामले हैं। हंसारिया ने कहा कि मामलों की जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की निगरानी के बावजूद 2018 से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की संख्या लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है।
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विभिन्न उच्च न्यायालयों से आंकड़े जुटाकर न्याय मित्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2025 में 1,243 आपराधिक मामलों का निपटारा हुआ, जबकि उसी साल 1,050 नए मामले दर्ज किए गए। उन्होंने अदालत को बताया कि पूर्व और मौजूदा सांसदों के साथ विधायकों के खिलाफ कुल 4,192 मामले लंबित हैं।
सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले कितने?
हलफनामे में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है, "लोकसभा में 543 सदस्यों में से 251 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 170 मामले गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।"
इसमें कहा गया है, "राज्यसभा में 233 सदस्यों में से 75 (33 प्रतिशत) सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 40 (18 प्रतिशत) मामले गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।" वरिष्ठ अधिवक्ता ने विभिन्न उच्च न्यायालयों की ओर से दाखिल रिपोर्टों का विश्लेषण भी पेश किया। इसमें उत्तर प्रदेश को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय से रिपोर्ट नहीं मिली थी।
केरल में क्यों 95 फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले?
हलफनामे के अनुसार, केरल के 20 में से 19 सांसदों यानी 95 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें से 11 सांसदों के खिलाफ गंभीर मामले हैं। तेलंगाना के 17 में से 14 सांसदों यानी 82 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। ओडिशा में 21 में से 16 सांसदों यानी 76 प्रतिशत, झारखंड में 14 में से 10 यानी 71 प्रतिशत और तमिलनाडु में 39 में से 26 यानी 67 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य प्रमुख राज्यों में करीब 50 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। हरियाणा के 10 सांसदों और छत्तीसगढ़ के 11 सांसदों में से एक-एक के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। पंजाब के 13 में से दो, असम के 14 में से तीन, दिल्ली के सात में से तीन, राजस्थान के 25 में से चार, गुजरात के 25 में से पांच और मध्य प्रदेश के 29 में से नौ सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।
विशेष अदालतों में तेजी से सुनवाई की मांग
न्याय मित्र ने कहा कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट को इनकी निगरानी करनी चाहिए। उन्होंने निर्देश देने की मांग की कि सांसदों और विधायकों के मामलों के लिए निर्धारित विशेष अदालतें केवल उन्हीं मामलों की सुनवाई करें। इन मामलों की सुनवाई पूरी होने के बाद ही अन्य मामलों को लिया जाए।
हंसारिया ने यह भी अनुरोध किया कि उच्च न्यायालय मामलों की बारीकी से निगरानी करें और जहां मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं, वहां प्रभावी आदेश जारी करें। हंसारिया सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों के जल्द निपटारे के लिए अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल जनहित याचिका में अदालत की सहायता कर रहे हैं।
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हलफनामे में कहा गया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ 4,000 से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। हलफनामे के अनुसार, 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। इनमें गंभीर मामले भी शामिल हैं।
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किस मुख्यमंत्री पर सबसे ज्यादा आपराधिक मामले?
आंकड़ों के मुताबिक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के खिलाफ 89 मामले हैं। इसके बाद पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के खिलाफ 19 मामले हैं। हंसारिया ने कहा कि मामलों की जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की निगरानी के बावजूद 2018 से सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की संख्या लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है।
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विभिन्न उच्च न्यायालयों से आंकड़े जुटाकर न्याय मित्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2025 में 1,243 आपराधिक मामलों का निपटारा हुआ, जबकि उसी साल 1,050 नए मामले दर्ज किए गए। उन्होंने अदालत को बताया कि पूर्व और मौजूदा सांसदों के साथ विधायकों के खिलाफ कुल 4,192 मामले लंबित हैं।
सांसदों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले कितने?
हलफनामे में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है, "लोकसभा में 543 सदस्यों में से 251 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 170 मामले गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।"
इसमें कहा गया है, "राज्यसभा में 233 सदस्यों में से 75 (33 प्रतिशत) सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें 40 (18 प्रतिशत) मामले गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है।" वरिष्ठ अधिवक्ता ने विभिन्न उच्च न्यायालयों की ओर से दाखिल रिपोर्टों का विश्लेषण भी पेश किया। इसमें उत्तर प्रदेश को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय से रिपोर्ट नहीं मिली थी।
केरल में क्यों 95 फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले?
हलफनामे के अनुसार, केरल के 20 में से 19 सांसदों यानी 95 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें से 11 सांसदों के खिलाफ गंभीर मामले हैं। तेलंगाना के 17 में से 14 सांसदों यानी 82 प्रतिशत के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। ओडिशा में 21 में से 16 सांसदों यानी 76 प्रतिशत, झारखंड में 14 में से 10 यानी 71 प्रतिशत और तमिलनाडु में 39 में से 26 यानी 67 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य प्रमुख राज्यों में करीब 50 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। हरियाणा के 10 सांसदों और छत्तीसगढ़ के 11 सांसदों में से एक-एक के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। पंजाब के 13 में से दो, असम के 14 में से तीन, दिल्ली के सात में से तीन, राजस्थान के 25 में से चार, गुजरात के 25 में से पांच और मध्य प्रदेश के 29 में से नौ सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं।
विशेष अदालतों में तेजी से सुनवाई की मांग
न्याय मित्र ने कहा कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों की जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट को इनकी निगरानी करनी चाहिए। उन्होंने निर्देश देने की मांग की कि सांसदों और विधायकों के मामलों के लिए निर्धारित विशेष अदालतें केवल उन्हीं मामलों की सुनवाई करें। इन मामलों की सुनवाई पूरी होने के बाद ही अन्य मामलों को लिया जाए।
हंसारिया ने यह भी अनुरोध किया कि उच्च न्यायालय मामलों की बारीकी से निगरानी करें और जहां मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं, वहां प्रभावी आदेश जारी करें। हंसारिया सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों के जल्द निपटारे के लिए अश्विनी उपाध्याय की ओर से दाखिल जनहित याचिका में अदालत की सहायता कर रहे हैं।