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Supreme Court: महंगाई भत्ते को लेकर कर्मियों-पेंशनभोगियों में भेदभाव न करें राज्य, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Sat, 11 Apr 2026 06:26 AM IST
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सार

पीठ ने कहा, समानता एक गतिशील अवधारणा है जिसके कई पहलू और आयाम हैं और इसे पारंपरिक और सैद्धांतिक सीमाओं में बांधा या सीमित नहीं किया जा सकता है। सकारात्मक दृष्टिकोण से, समानता मनमानी के विपरीत है।

supreme court said state should not diffrentiate dearness allowance between employees pensioners updates
करूर भगदड़ हादसे पर सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई - फोटो : ANI
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महंगाई से निपटने के लिए भत्ते बढ़ाने के मामले में राज्य सेवारत कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता। सेवानिवृत्त कर्मचारियों के समानता के अधिकार को बरकरार रखते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने केरल राज्य और केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) की ओर से दायर अपीलों को खारिज कर दिया और पुष्टि की कि महंगाई सेवारत और सेवानिवृत्त दोनों कर्मचारियों को समान रूप से प्रभावित करती है।
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फैसला लिखने वाले जस्टिस मिश्रा ने कहा, वास्तव में, समानता और मनमानी एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं। एक गणतंत्र में कानून के शासन का हिस्सा है, जबकि दूसरा निरंकुश राजा की सनक और मनमानी का। संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का हवाला देते हुए, फैसले में कहा गया है कि यह वर्ग-आधारित कानून बनाने पर रोक लगाता है, लेकिन उचित वर्गीकरण की अनुमति देता है, जिसे दो कसौटियों को पूरा करना होगा। दोहरी कसौटियों के अनुसार, वर्गीकरण एक ऐसे बोधगम्य अंतर पर आधारित होना चाहिए जो एक समूह में रखे गए लोगों को दूसरों से अलग करता हो, और दूसरा, उस अंतर का अधिनियम से प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य के साथ तर्कसंगत संबंध होना चाहिए। 
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बंगाल में मतदाता सूची को फ्रीज करने के फैसले के खिलाफ अर्जी पर 13 को सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की मतदाता सूची को फ्रीज करने को चुनौती देने वाली लंबित याचिकाओं के साथ एक नई याचिका पर 13 अप्रैल को सुनवाई करने की सहमति दी। चुनाव आयोग ने पहले चरण में मतदान के लिए विधानसभा सीटों की मतदाता सूची को 9 अप्रैल को फ्रीज और अंतिम रूप दे दिया था। जेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष एक वकील ने मतदाता सूची पर रोक लगाने के खिलाफ याचिका पर तत्काल सुनवाई करने का आग्रह किया। वकील ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ कई अपीलें अभी भी लंबित हैं और चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को मतदाता सूची पर रोक लगा दी थी। 
 

25 पीआईएल दायर करने वाले को सुप्रीम सुझाव, प्राधिकरणों के पास जाएं

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मुद्दों पर 25 अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर करने वाले एक अधिवक्ता से शुक्रवार को कहा कि उन्हें अदालत का रुख करने से पहले संबंधित प्राधिकरणों के पास जाना चाहिए। जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, याचिकाकर्ता के रूप में स्वयं पेश हुए अधिवक्ता सचिन गुप्ता ने सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ से कहा कि वह अपनी सभी जनहित याचिकाएं वापस लेना चाहते हैं। पीठ ने गुप्ता से कहा, आप अपने पेशे पर ध्यान दें। आपको सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय संबंधित प्राधिकरणों के पास जाना चाहिए और उन्हें विभिन्न मुद्दों पर जानकारी देनी चाहिए। पीठ ने कहा कि उचित समय आने पर यदि आवश्यकता हुई, तो न्यायालय उनकी याचिकाओं पर विचार भी करेगा।

अशोभनीय भाषा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जाति जनगणना रोकने की याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने जाति जनगणना पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया और याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी नाराजगी जताई। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि याचिका में असभ्य और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने याचिकाकर्ता से कहा, आपने अपनी याचिका में बदतमीजी की भाषा लिखी है। आपने यह याचिका किससे लिखवाई है? अदालत ने आगे कहा, आप इस तरह की भाषा याचिका में कहां से लिखते हैं? पीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की भाषा न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के अनुरूप नहीं है। अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए किसी भी प्रकार का निर्देश देने से इन्कार कर दिया।

इस याचिका में केंद्र सरकार को जाति जनगणना रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी। साथ ही याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि एक बच्चे वाले परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देने के लिए नीति बनाई जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका के तथ्यों पर विचार करने के बजाय पहले उसके प्रस्तुतिकरण और भाषा पर गंभीर आपत्ति जताई और कहा कि अदालत में दायर दस्तावेजों में मर्यादा और शालीनता का पालन जरूरी है। 

2027 की जनगणना से जुड़ी पीआईएल से भी इन्कार
इससे पहले 2 फरवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2027 की जनगणना में जाति संबंधी आंकड़ों को दर्ज करने, उनके वर्गीकरण और सत्यापन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक अन्य जनहित याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया था। वर्ष 2027 में होने वाली जनगणना देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी। इसमें 1931 के बाद पहली बार व्यापक स्तर पर जाति आधारित गणना शामिल किए जाने की योजना है। यह देश की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना भी होगी, जिसमें आंकड़ों के संग्रह और प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाएगा।



 
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