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ट्रांसजेंडर कानून पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: अलग-अलग अदालत में सुनवाई पर लगाई रोक, केंद्र की याचिका पर नोटिस जारी

आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: Asmita Tripathi Updated Mon, 15 Jun 2026 06:45 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र की ट्रांसफर याचिका पर नोटिस जारी किया। अदालत ने दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में लंबित मामलों की सुनवाई पर रोक लगाई। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी।

Supreme Court tough on transgender law: Stays hearings in separate courts, issues notice on Centre's plea.
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार की उस याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें देश के विभिन्न हाईकोर्टों में लंबित उन याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित करने की मांग की गई है, जो ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती हैं। सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट सहित कई अदालतों में कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से जवाब मांगा है।

सुनवाई में क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि एक केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता को कई हाईकोर्टों में चुनौती दी गई है। वहीं, इससे जुड़े मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह या तो सभी मामलों की सुनवाई खुद करेगा या फिर किसी एक हाईकोर्ट को इन मामलों की सुनवाई सौंपेगा। ताकि एक ही मुद्दे पर अलग-अलग अदालतों से विरोधाभासी फैसले न आएं।

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केंद्र की मांग का विरोध किया
तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'नालसा' फैसले का भी जिक्र किया और कहा कि हाईकोर्टों के लिए उस फैसले में तय सिद्धांतों के विपरीत राय देना कठिन हो सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि इस मुद्दे पर बड़ी पीठ द्वारा विचार किए जाने की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने केंद्र की मांग का विरोध करते हुए कहा कि संशोधित कानून को चुनौती केवल 'नालसा' फैसले के आधार पर नहीं दी गई है। उनका तर्क था कि यह कानून 'न केवल असंवैधानिक है बल्कि इसका कोई चिकित्सीय आधार भी नहीं है।'

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अगली सुनवाई अगस्त में
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया और राजस्थान, कर्नाटक, केरल तथा दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित मामलों की आगे की सुनवाई पर फिलहाल रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी। केंद्र सरकार ने पहले भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सभी संबंधित मामलों को एक जगह स्थानांतरित करने की मांग की थी। सरकार का कहना है कि अलग-अलग हाईकोर्टों में चल रही सुनवाई से एक ही संवैधानिक प्रश्न पर अलग-अलग फैसले आ सकते हैं।

पिछले सुनवाई में क्या हुआ?
पिछले महीने भी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया था। उस समय मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा था कि कभी-कभी अलग-अलग हाईकोर्टों की राय भी उपयोगी हो सकती है, लेकिन मामले को जल्द सूचीबद्ध करने पर विचार किया जाएगा। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब विभिन्न हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट में संशोधित कानून की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गई हैं।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को चुनौती देने वाली एक याचिका पर नोटिस जारी किया था और मामले को तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नया संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'नालसा' फैसले में मान्यता प्राप्त लैंगिक पहचान के आत्म-पहचान के सिद्धांत को कमजोर करता है। उनका आरोप है कि संशोधन में चिकित्सा प्रमाणन और सरकारी सत्यापन की व्यवस्था लाकर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान को सरकारी नियंत्रण के दायरे में लाया गया है।


दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही इस कानून के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चुका है। इसी तरह की याचिकाएं राजस्थान, कर्नाटक और केरल हाईकोर्ट में भी लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह संशोधन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, क्योंकि इससे व्यक्ति की लैंगिक पहचान सरकारी जांच के अधीन हो जाती है।

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