SC Updates: अरावली मामले में 'सुप्रीम' सख्ती, बनेगा विशेषज्ञ पैनल; सोनम वांगचुक की याचिका पर अंतिम सुनवाई तय
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र की सही परिभाषा तय करने के मामले में अगली सुनवाई तय की है। कोर्ट एक विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार करेगा, जो यह देखेगी कि अरावली क्षेत्र की सीमा क्या हो और उससे जुड़े मुद्दों को कैसे सुलझाया जाए। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल जिन गतिविधियों, खासकर खनन के लिए लाइसेंस दिए गए थे, वे रुके रहेंगे। जब तक मामले का चरणबद्ध तरीके से समाधान नहीं होता, तब तक यथास्थिति बनी रहेगी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि इतिहास के आधार पर देखें तो सुप्रीम कोर्ट की इमारत भी कभी अरावली क्षेत्र में मानी जा सकती थी, लेकिन आज ऐसा कहना सही नहीं होगा।
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे आंगमो की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई 10 मार्च को तय कर दी है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत वांगचुक की हिरासत को चुनौती दी गई है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने साफ कहा कि अब किसी भी पक्ष को अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई संदेह होगा तो उसी दिन पूछा जाएगा और फिर मामले की सुनवाई समाप्त कर दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल्स को झंझट और जिम्मेदारीहीन करार दिया
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि देश के ट्रिब्यूनल्स अब एक झंझट और जिम्मेदारीहीन संस्था बन गए हैं। कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई कि कई ट्रिब्यूनल्स न्यायिक या किसी और के प्रति जवाबदेह नहीं हैं और कुछ तकनीकी सदस्य अपने फैसले खुद लिखने के बजाय उन्हें दूसरों से लिखवा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और बेंच के अन्य न्यायाधीशों ने कहा कि ट्रिब्यूनल्स सरकार की बनाई संस्थाएं हैं, लेकिन अब यह नो-मैन’स लैंड बन गए हैं।
सीजेआई ने कहा कि तकनीकी सदस्य कई ट्रिब्यूनल्स में खुद जजमेंट नहीं लिखते, बल्कि न्यायिक सदस्य से अपना नाम देकर जजमेंट लिखवाते हैं। उन्होंने इसे पूरी तरह सिस्टम में गड़बड़ी बताया और कहा कि यह राष्ट्रीय हित में नहीं है। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी सदस्य पर्यावरण, कॉर्पोरेट और दिवालियापन कानून नहीं समझते, जिससे उच्च न्यायालय के जज इन क्षेत्रों में अनुभव नहीं ले पा रहे। मामले में अंतरिम उपाय के तौर पर ट्रिब्यूनल्स के चेयरपर्सन की अवधि बढ़ाने का निर्देश दिया गया है, ताकि नई व्यवस्था बनने तक काम प्रभावित न हो। नवंबर 2025 में कोर्ट ने ट्रिब्यूनल्स सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधान रद्द किए थे।