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Supreme Court: भ्रष्टाचार विरोधी कानून पर सुप्रीम कोर्ट का बंटा हुआ फैसला, अब बड़ी बेंच करेगी सुनवाई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: लव गौर
Updated Tue, 13 Jan 2026 11:22 AM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून से जुड़े मुकदमे में बंटा हुआ फैसला पारित किया है। अदालत ने साल 2018 के उस प्रावधान की वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया, जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। जानिए क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून के 2018 के एक प्रावधान की सांविधानिक वैधता पर खंडित फैसला सुनाया है, जिसमें भ्रष्टाचार के मामले में किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले मंजूरी लेना जरूरी है। भ्रष्टाचार निवारण कानून 1988 से जुड़े इस मामले में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए असांविधानिक है। इसे निरस्त किया जाना चाहिए।
इससे जांच बाधित होती है: जस्टिस नागरत्ना
वहीं 'पूर्व स्वीकृति अनिवार्य' होने पर सवाल खड़े करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ये शर्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की भावनाओं के खिलाफ है। इससे जांच बाधित होती है। कानून के ऐसी धाराओं से भ्रष्ट लोगों को संरक्षण मिलता है। हालांकि मुकदमे की सुनवाई कर रही इस खंडपीठ में शामिल एक अन्य न्यायमूर्ति ने कानून की इस धारा को सांविधानिक बताया।
धारा 17ए सांविधानिक प्रावधान: जस्टिस विश्वनाथन
न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने अपने हिस्से के फैसले में लिखा, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए सांविधानिक प्रावधान है। उन्होंने कहा कि कानून के इस प्रावधान से ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा होती है, जिस पर जोर दिया जाना आवश्यक है।
ये भी पढ़ें: Reservation: एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर सिद्धांत लागू करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
अब मामले की बड़ी बेंच करेगी सुनवाई
एक तरफ जहां जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A असांविधानिक है और इसे खत्म किया जाना चाहिए, तो वहीं जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इस प्रावधान को संवैधानिक बताया और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया। ऐसे में अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के सामने रखा जाएगा ताकि अंतिम फैसले के लिए मामले की दोबारा सुनवाई के लिए एक बड़ी बेंच बनाई जा सकें।
ये भी पढ़ें: UP News: केजीएमयू में धर्मांतरण और यौन शोषण पर बड़ा खुलासा, डॉ. रमीज का आतंकी डॉ. शाहीन से कनेक्शन
मंजूरी के बिना किसी भी 'पूछताछ या जांच' पर रोक
बता दें कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A, जिसे जुलाई 2018 में पेश किया गया था, किसी भी लोक सेवक के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों के लिए सक्षम प्राधिकारी से पहले मंजूरी के बिना किसी भी 'पूछताछ या जांच' पर रोक लगाती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला NGO 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (CPIL) द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संशोधित धारा 17A की वैधता के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर आया है।
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इससे जांच बाधित होती है: जस्टिस नागरत्ना
वहीं 'पूर्व स्वीकृति अनिवार्य' होने पर सवाल खड़े करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ये शर्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की भावनाओं के खिलाफ है। इससे जांच बाधित होती है। कानून के ऐसी धाराओं से भ्रष्ट लोगों को संरक्षण मिलता है। हालांकि मुकदमे की सुनवाई कर रही इस खंडपीठ में शामिल एक अन्य न्यायमूर्ति ने कानून की इस धारा को सांविधानिक बताया।
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धारा 17ए सांविधानिक प्रावधान: जस्टिस विश्वनाथन
न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने अपने हिस्से के फैसले में लिखा, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए सांविधानिक प्रावधान है। उन्होंने कहा कि कानून के इस प्रावधान से ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा होती है, जिस पर जोर दिया जाना आवश्यक है।
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अब मामले की बड़ी बेंच करेगी सुनवाई
एक तरफ जहां जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A असांविधानिक है और इसे खत्म किया जाना चाहिए, तो वहीं जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इस प्रावधान को संवैधानिक बताया और ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा की जरूरत पर जोर दिया। ऐसे में अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के सामने रखा जाएगा ताकि अंतिम फैसले के लिए मामले की दोबारा सुनवाई के लिए एक बड़ी बेंच बनाई जा सकें।
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मंजूरी के बिना किसी भी 'पूछताछ या जांच' पर रोक
बता दें कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A, जिसे जुलाई 2018 में पेश किया गया था, किसी भी लोक सेवक के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों के लिए सक्षम प्राधिकारी से पहले मंजूरी के बिना किसी भी 'पूछताछ या जांच' पर रोक लगाती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला NGO 'सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन' (CPIL) द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की संशोधित धारा 17A की वैधता के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर आया है।
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