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SC: मद्रास हाईकोर्ट ने टीवीके विधायक के फ्लोर टेस्ट में शामिल होने पर लगाई थी रोक, सुप्रीम कोर्ट ने दी राहत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Wed, 13 May 2026 12:49 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने टीवीके विधायक को फ्लोर टेस्ट में शामिल होने से रोकने वाले आदेश पर रोक लगा दी है। विधायक ने एक वोट के अंतर से चुनाव जीता था। अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताई और विपक्षी नेताओं से जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसने टीवीके (TVK) विधायक आर श्रीनिवास सेतुपति को विधानसभा के फ्लोर टेस्ट में हिस्सा लेने से रोका था। सेतुपति ने शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर सीट पर डीएमके नेता केआर पेरियाकरुप्पन को केवल एक वोट से हराया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताई। बेंच ने कहा कि चुनाव से जुड़े मामलों में सीधे हाई कोर्ट में याचिका पर सुनवाई करना हैरान करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट में चल रही इस मामले की पूरी कार्यवाही को भी फिलहाल रोक दिया है।
अदालत ने डीएमके नेता पेरियाकरुप्पन और अन्य लोगों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। सेतुपति ने हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें किसी भी तरह के शक्ति परीक्षण या विश्वास मत में वोट डालने से मना किया गया था। इस बीच, सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने बुधवार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया है।
ये भी पढे़ं: बंगाल वाली रणनीति से पंजाब फतह?: नशा और राज्य की सुरक्षा को मुद्दा बनाएगी भाजपा, जून में ही मिल जाएंगे प्रभारी
क्या है मामला?
मामले में टीवीके (TVK) विधायक आर श्रीनिवास सेतुपति ने मद्रास हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें तमिलनाडु विधानसभा की किसी भी कार्यवाही या फ्लोर टेस्ट में शामिल होने से रोका गया था। जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की बेंच इस मामले की सुनवाई की। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने मंगलवार को चीफ जस्टिस के सामने इस मामले को जल्द सुनने की अपील की थी। इसके बाद शीर्ष अदालत इस पर सुनवाई के लिए तैयार हुई।
हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
मद्रास हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच ने सेतुपति के खिलाफ यह आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि जब तक अगला आदेश नहीं आता, सेतुपति विश्वास मत, अविश्वास मत या ऐसी किसी भी वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सकते जहां सदन की संख्या बल का परीक्षण होता हो। यह आदेश पूर्व मंत्री और डीएमके नेता केआर पेरियाकरुप्पन की याचिका पर आया है। पेरियाकरुप्पन इस चुनाव में सेतुपति से सिर्फ एक वोट के अंतर से हार गए थे।
एक वोट से मिली थी जीत
चुनाव आयोग के नतीजों के अनुसार, सेतुपति को 83,365 वोट मिले, जबकि पेरियाकरुप्पन को 83,364 वोट मिले। इसके बाद पेरियाकरुप्पन ने गिनती की प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी का आरोप लगाया। उनका दावा है कि शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर सीट का एक पोस्टल बैलेट गलती से वेल्लोर के पास वाली तिरुपत्तूर सीट पर भेज दिया गया था। वहां इसे वापस भेजने के बजाय खारिज कर दिया गया।
हाई कोर्ट ने इसे एक अजीब संवैधानिक स्थिति माना। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ वोटों की गिनती का सामान्य विवाद नहीं है, बल्कि प्रशासनिक विफलता का मामला है। कोर्ट के अनुसार, जिस चुनाव का फैसला सिर्फ एक वोट से हुआ हो, वहां हर एक वोट बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसके अलावा, दो सरकारी स्रोतों के बीच ईवीएम के 18 वोटों का अंतर भी सामने आया है। हाई कोर्ट ने माना कि इतनी कम जीत के अंतर को देखते हुए इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग ने किया याचिका का विरोध
हाई कोर्ट ने चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे गिनती से जुड़े सभी रिकॉर्ड, पोस्टल बैलेट और वीडियो फुटेज सुरक्षित रखें। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने सेतुपति के चुनाव को रद्द नहीं किया है। दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने इस याचिका का विरोध किया। आयोग का कहना है कि नतीजे घोषित होने के बाद किसी भी विवाद का निपटारा केवल 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' के तहत चुनाव याचिका के जरिए ही हो सकता है।
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जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और विजय बिश्नोई की बेंच ने हाई कोर्ट के फैसले पर नाराजगी जताई। बेंच ने कहा कि चुनाव से जुड़े मामलों में सीधे हाई कोर्ट में याचिका पर सुनवाई करना हैरान करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट में चल रही इस मामले की पूरी कार्यवाही को भी फिलहाल रोक दिया है।
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अदालत ने डीएमके नेता पेरियाकरुप्पन और अन्य लोगों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। सेतुपति ने हाई कोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें किसी भी तरह के शक्ति परीक्षण या विश्वास मत में वोट डालने से मना किया गया था। इस बीच, सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार ने बुधवार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया है।
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क्या है मामला?
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हाई कोर्ट ने क्या कहा था?
मद्रास हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच ने सेतुपति के खिलाफ यह आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि जब तक अगला आदेश नहीं आता, सेतुपति विश्वास मत, अविश्वास मत या ऐसी किसी भी वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सकते जहां सदन की संख्या बल का परीक्षण होता हो। यह आदेश पूर्व मंत्री और डीएमके नेता केआर पेरियाकरुप्पन की याचिका पर आया है। पेरियाकरुप्पन इस चुनाव में सेतुपति से सिर्फ एक वोट के अंतर से हार गए थे।
एक वोट से मिली थी जीत
चुनाव आयोग के नतीजों के अनुसार, सेतुपति को 83,365 वोट मिले, जबकि पेरियाकरुप्पन को 83,364 वोट मिले। इसके बाद पेरियाकरुप्पन ने गिनती की प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी का आरोप लगाया। उनका दावा है कि शिवगंगा जिले की तिरुपत्तूर सीट का एक पोस्टल बैलेट गलती से वेल्लोर के पास वाली तिरुपत्तूर सीट पर भेज दिया गया था। वहां इसे वापस भेजने के बजाय खारिज कर दिया गया।
हाई कोर्ट ने इसे एक अजीब संवैधानिक स्थिति माना। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ वोटों की गिनती का सामान्य विवाद नहीं है, बल्कि प्रशासनिक विफलता का मामला है। कोर्ट के अनुसार, जिस चुनाव का फैसला सिर्फ एक वोट से हुआ हो, वहां हर एक वोट बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसके अलावा, दो सरकारी स्रोतों के बीच ईवीएम के 18 वोटों का अंतर भी सामने आया है। हाई कोर्ट ने माना कि इतनी कम जीत के अंतर को देखते हुए इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग ने किया याचिका का विरोध
हाई कोर्ट ने चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे गिनती से जुड़े सभी रिकॉर्ड, पोस्टल बैलेट और वीडियो फुटेज सुरक्षित रखें। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने सेतुपति के चुनाव को रद्द नहीं किया है। दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने इस याचिका का विरोध किया। आयोग का कहना है कि नतीजे घोषित होने के बाद किसी भी विवाद का निपटारा केवल 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' के तहत चुनाव याचिका के जरिए ही हो सकता है।
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