Tamilnadu: 'सनातन पर बार-बार हमले से डीएमके को चुनाव में नुकसान हुआ', जोहो के सह-संस्थापक का बड़ा दावा
तमिलनाडु में एक सोशल पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी है। जोहो के सह-संस्थापक ने दावा किया है कि डीएमके ने सनातन पर बार-बार हमले किया। इसी कारण से चुनाव में उसे नुकसान झेलना पड़ा।
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विस्तार
जोहो के सह-संस्थापक श्रीधर वेम्बू के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने तमिलनाडु की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। इस पोस्ट में भाषा, धर्म और डीएमके की वैचारिक स्थिति पर तीखी टिप्पणियां की गई हैं। यह बहस हाल ही में हुए चुनाव में डीएमके की हार के बाद और तेज हो गई है।
एक्स पर एक पोस्ट में वेम्बु ने तर्क दिया कि पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन की बार-बार आलोचना की। आलोचना पर तमिलनाडु की प्रतिक्रिया केवल विचारधारा से नहीं बल्कि भाषा और सांस्कृतिक उपयोग से गहराई से जुड़ी हुई है। इस लेख के अनुसार, संस्कृत से व्युत्पन्न शब्द ‘सनातन’ ऐतिहासिक रूप से अधिकांश सामान्य तमिल भाषी हिंदुओं की रोजमर्रा की शब्दावली का हिस्सा नहीं था। इसके विपरीत, ‘धर्मम्,’ ‘धरुमम्,’ और ‘अरम्’ जैसे तमिल शब्द तमिल संस्कृति में गहराई से समाहित हैं। यह धार्मिकता, नैतिकता और धार्मिक सद्गुणों से व्यापक रूप से जुड़े हुए हैं।
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तमिल में इसका अर्थ अलग
इस लेख में बताया गया है कि जहां हिंदी में धर्म शब्द का प्रयोग व्यापक रूप से धर्मों के लिए किया जाता है, जिसमें हिंदू धर्म के लिए सनातन धर्म और ईसाई धर्म के लिए ईसाई धर्म शामिल हैं। वहीं तमिल में इसका प्रयोग काफीृ अलग है। तमिल समाज में, धर्म को सांस्कृतिक रूप से हिंदू नैतिक और आध्यात्मिक परंपराओं से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है।
आम लोग भावनात्मक रूप से नही जुड़ पाए
वेम्बु ने तर्क दिया कि अगर उदयनिधि स्टालिन ने तमिल में धर्म पर सीधे हमला किया होता, तो हिंदू आबादी की प्रतिक्रिया कहीं अधिक गंभीर होती, क्योंकि इसे नैतिक और धार्मिक मूल्यों की प्रत्यक्ष अस्वीकृति के रूप में समझा जाता। इसके बजाय, वेम्बू ने सुझाव दिया कि अपेक्षाकृत अपरिचित शब्द सनातनम के प्रयोग से शुरू में जनता की प्रतिक्रिया नरम पड़ गई क्योंकि कई आम लोग भावनात्मक रूप से इस शब्द से नहीं जुड़ पाए।
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इसलिए हारी डीएमके
हालांकि, पोस्ट में आगे दावा किया गया कि सनातन पर बार-बार होने वाले हमलों ने विडंबनापूर्ण रूप से तमिल भाषी लोगों के बीच इस शब्द को लोकप्रिय बना दिया है। इस धारणा को मजबूत किया है कि डीएमके हिंदू मान्यताओं और परंपराओं के प्रति शत्रुतापूर्ण बनी हुई है। इन टिप्पणियों में बहस को 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के परिणाम से भी जोड़ा गया, जहां डीएमके एक मजबूत गठबंधन, भारी चुनावी खर्च और संगठनात्मक ताकत के बावजूद सत्ता हार गई थी।
उस पोस्ट में तर्क दिया गया कि हिंदू प्रतीकों और धार्मिक मुद्दों से जुड़े बार-बार होने वाले विवादों के कारण डीएमके विरोधी भावना वर्षों से लगातार बढ़ती जा रही है। उदयनिधि स्टालिन अपने तमाम 'ईमानदार' प्रयासों से तमिल भाषा में भी अपनी बात मनवा रहे हैं। डीएमके ने कभी भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं किया, क्योंकि डीएमके विरोधी लहर बहुत मजबूत है। उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं पर लगातार हमले करके यह लहर खड़ी की। एआईएडीएमके ने ऐसा कभी नहीं किया और उन्होंने डीएमके विरोधी लहर का भरपूर फायदा उठाया।
इन टिप्पणियों ने ऑनलाइन गहन बहस छेड़ दी है, जिसमें समर्थक और आलोचक तमिलनाडु की राजनीति में सनातन बहस के राजनीतिक और सांस्कृतिक निहितार्थों को लेकर बुरी तरह विभाजित हैं।
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