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The Second Orbit: शुभांशु की इस किताब में अंतरिक्ष के किस्से; ISRO की किस चुनौती को पांच दिन में पूरा किया?

Sat, 04 Jul 2026 04:50 PM IST
प्रशांत तिवारी पीटीआई, बंगलूरु
पीटीआई, बंगलूरु Published by: प्रशांत तिवारी Updated Sat, 04 Jul 2026 04:50 PM IST
सार

 भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन और अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला ने अपनी पुस्तक 'द सेकेंड ऑर्बिट: बिलीफ ऑफ ए मैन... ड्रीम्स ऑफ 1.4 बिलियन हार्ट्स' में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में बिताए पलों, ISRO की चुनौतीपूर्ण प्रयोग, अंतरिक्ष में हुई मजेदार घटनाओं और टीमवर्क की अहमियत पर खुलकर बात की। कार्यक्रम में इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने भी गगनयान मिशन की चुनौतियों के बारे में बताया। 

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The Second Orbit Tales of space in book by Shubhanshu which ISRO challenge was completed in five days
शुभांशु शुक्ला - फोटो : शुभांशु एक्स प्रोफाइल/ अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

एस्ट्रोनॉट और भारतीय वायुसेना (IAF) के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने शनिवार को अंतरिक्ष में बिताए अपने दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि पिछले साल 4 जुलाई के दिन वह धरती पर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर थे। अपनी पुस्तक 'द सेकेंड ऑर्बिट: बिलीफ ऑफ़ ए मैन... ड्रीम्स ऑफ 1.4 बिलियन हार्ट्स' के लोकार्पण समारोह में उन्होंने अंतरिक्ष मिशन से जुड़े कई प्रेरणादायक और मज़ेदार अनुभव साझा किए। ISS जाने वाले पहले भारतीय शुभांशु ने बताया कि ISRO द्वारा दिए गए एक चुनौतीपूर्ण STEM प्रयोग को पूरा करने में उन्हें लगातार पांच दिन लग गए थे।

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ISRO ने क्या दिया था चैलेंज?
ISS पर बिताए अपने समय को याद करते हुए शुभांशु शुक्ला ने बताया कि ISRO ने उन्हें एक बेहद चुनौतीपूर्ण STEM डेमोंस्ट्रेशन सौंपा था। इसमें उन्हें पहले पानी का एक बुलबुला बनाना था, उसके भीतर हवा का बुलबुला और फिर उस हवा के बुलबुले के अंदर कॉफी का एक और बुलबुला तैयार करना था। उन्होंने आगे कहा कि अंतरिक्ष में तीन बुलबुले बनाना जितना सुनने में आसान लगता है, उतना था नहीं। पिछले पांच दिनों से मैं यही कोशिश कर रहा था। सबसे मुश्किल काम पानी के बुलबुले को स्थिर रखना था। आखिरकार 4 जुलाई को मैं इसमें सफल हो गया और उस दिन मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था।"
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चार दशक बाद किसी भारतीय की अंतरिक्ष में हुई थी वापसी
शुभांशु शुक्ला उस चार सदस्यीय दल का हिस्सा थे, जिसने NASA के एक्सिओम-4 मिशन के तहत ISS पर 18 दिन बिताए। यह लगभग चार दशक बाद किसी भारतीय की अंतरिक्ष में वापसी थी। इससे पहले 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा अंतरिक्ष जाने वाले पहले भारतीय बने थे। उन्होंने बताया कि ISS की कपोला विंडो से विशेष लेंस की मदद से उन्होंने पहली बार पूरी पृथ्वी की तस्वीर भी खींची। उनके अनुसार, यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि धरती पर काम कर रही हजारों लोगों की मेहनत का परिणाम थी। उन्होंने कहा, 'जब किसी इंसान को अंतरिक्ष में भेजा जाता है, तो उसके पीछे हजारों लोगों की मेहनत होती है। हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। मेरी किताब भी इसी भावना को समर्पित है।' 
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किताब के लिए किसे दिया श्रेय?
ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने कहा कि उनकी पुस्तक किसी एक व्यक्ति की सफलता का जश्न नहीं मनाती, बल्कि यह बताती है कि बड़ी उपलब्धियां केवल टीमवर्क से ही संभव होती हैं। आखिर में यह टीमवर्क ही तय करता है कि आप कितनी दूर तक जाएंगे और कितनी बड़ी उपलब्धियां हासिल करेंगे। मिशन पूरा कर भारत लौटने के बाद उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह किताब लिखेंगे। लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि अपनी पूरी यात्रा हर व्यक्ति तक पहुंचाना संभव नहीं है। ऐसे में किताब ही इस कहानी को साझा करने का सबसे अच्छा माध्यम बन गई।

स्पेसक्राफ्ट में कैसे 'गायब' हो गए शुभांशु?
अपने मिशन का सबसे मजेदार अनुभव साझा करते हुए शुभांशु ने बताया कि ISS पहुंचने से पहले ऑर्बिट में लगभग 22 घंटे का समय था, जिसमें अंतरिक्ष यात्रियों को आराम करने का मौका मिला।
अंतरिक्ष में बिस्तर नहीं होते और अंतरिक्ष यात्री स्पेसक्राफ्ट के भीतर कहीं भी सो सकते हैं। उनके साथी अपनी-अपनी सीटों से बंधकर सो गए, लेकिन उन्होंने एक सीट के नीचे जगह बनाई और ठंड से बचने के लिए स्पेससूट रखने वाले बड़े काले बैग में घुसकर सो गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'मैं धीरे-धीरे बैग के अंदर चला गया और आराम से सो गया।' 

अंतरिक्ष यात्रियों ने कैसे ढूंढ़ा?  
शुभांशु ने बताया कि शून्य गुरुत्वाकर्षण के कारण सोते समय उनका शरीर धीरे-धीरे और अंदर खिसक गया। जब बाकी क्रू सदस्य जागे और भोजन करने लगे तो उन्हें शुभांशु कहीं दिखाई नहीं दिए।
उन्होंने कहा, 'उन्हें चार बड़े बैग दिखाई दे रहे थे, लेकिन केवल तीन क्रू मेंबर। कुछ देर के लिए सब हैरान रह गए कि इतने छोटे से स्पेसक्राफ्ट में कोई इंसान आखिर गायब कैसे हो सकता है?' उनकी यह बात सुनकर कार्यक्रम में मौजूद लोग ठहाके लगाने लगे। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में घटी ऐसी कई हल्की-फुल्की घटनाओं और अपने साथियों के अनुभवों को उन्होंने अपनी पुस्तक में शामिल किया है, ताकि पाठकों को अंतरिक्ष जीवन का मानवीय और रोचक पक्ष भी देखने को मिले।

320 चक्कर और 1.4 करोड़ किलोमीटर की यात्रा
शुभांशु शुक्ला ने बताया कि अंतरिक्ष में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने पृथ्वी के 320 चक्कर लगाए और करीब 1.4 करोड़ किलोमीटर की यात्रा की। उन्होंने कहा, 'अगर हम 140 करोड़ भारतीयों को आधार मानें, तो मैंने आप सभी के लिए लगभग 100-100 मीटर की यात्रा की है। एक तरह से आप सभी इस यात्रा का हिस्सा रहे हैं।'


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क्या गगनयान मिशन शुभांशु की उड़ान से भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण? 
कार्यक्रम में मौजूद इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने गगनयान मिशन पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा कि यह मिशन शुभांशु शुक्ला की उड़ान की तुलना में कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा, 'जब आप इंसानों को अंतरिक्ष में ले जाने वाला स्पेसक्राफ्ट स्वयं विकसित करते हैं, तो उसके लिए जरूरी तकनीकी ज्ञान आसानी से उपलब्ध नहीं होता। हमें लगातार शोध करके यह क्षमता विकसित करनी पड़ती है। साथ ही, ऐसे अंतरिक्ष यात्रियों के अनुभव भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, जो वास्तव में ऐसे मिशनों का हिस्सा रह चुके हैं।' एस. सोमनाथ ने कहा कि शुभांशु शुक्ला के मिशन से मिले अनुभव गगनयान कार्यक्रम के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। उन्होंने बताया कि ISRO मानव मिशन से पहले कई मानव-रहित परीक्षण उड़ानें करेगा। हर तकनीकी पहलू का गहन परीक्षण और समाधान सुनिश्चित करने के बाद ही भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को गगनयान के जरिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, ताकि मिशन की सुरक्षा और सफलता के सर्वोच्च मानकों को सुनिश्चित किया जा सके।

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