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केरल में भाजपा की इकलौती नगर निगम पर खतरा: कांग्रेस का बड़ा दांव, LDF के एक फैसले से बदल सकता है पूरा खेल

Fri, 26 Jun 2026 04:35 PM IST
प्रशांत तिवारी आईएएनएस, तिरुवनंतपुरम
आईएएनएस, तिरुवनंतपुरम Published by: प्रशांत तिवारी Updated Fri, 26 Jun 2026 04:35 PM IST
सार

तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा प्रशासन के खिलाफ कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। यदि लेफ्ट कांग्रेस के इस कदम का समर्थन करता है तो केरल की इकलौती बीजेपी-शासित नगर निगम की सत्ता पार्टी से छिन सकती है।

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Threat BJP Thiruvananthapuram municipal corporation Congress move No confidence motion LDF will game changer
तिरुवनंतपुरम नगर निगम - फोटो : तिरुवनंतपुरम नगर निगम वेबसाइट

विस्तार

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम नगर निगम में सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) भारतीय जनता पार्टी  के नेतृत्व वाले नगर निगम प्रशासन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है। अगर वामपंथी गठबंधन भी इसका समर्थन कर देता है, तो राज्य की इकलौती बीजेपी-शासित नगर निगम की सत्ता पर संकट खड़ा हो सकता है।

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सोमवार को होने वाली बैठक पर टिकी निगाहें
नगर निगम परिषद की अगली बैठक सोमवार को होने वाली है। माना जा रहा है कि इसी बैठक में विपक्ष अपनी आगे की रणनीति तय कर सकता है। यह पूरा घटनाक्रम नगर निगम के भीतर इस सप्ताह हुई हिंसक झड़प के बाद सामने आया है।
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दरअसल, 2025 के स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर जीत दर्ज कर इतिहास रचा था। यह पहली बार था जब पार्टी ने केरल में किसी नगर निगम की सत्ता हासिल की। इसके साथ ही CPI-M के चार दशक से अधिक लंबे शासन का अंत हुआ था। लेकिन सत्ता संभालने के 10 महीने से भी कम समय में नगर निगम राजनीतिक विवादों और टकराव का केंद्र बन गया है।
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क्या है पूरा मामला?
ताजा विवाद गुरुवार को नगर निगम के अंदर हुई हाथापाई के बाद शुरू हुआ। इस झड़प में कई पार्षद घायल हो गए। मेयर वी.वी. राजेश भी गिरकर घायल हो गए, जिसके बाद उनके पैर में प्लास्टर चढ़ाना पड़ा। हंगामे की वजह बीजेपी पार्षद आर. सुगाथन को लेकर हुआ विरोध प्रदर्शन था। LDF ने उनकी सदस्यता खत्म करने की मांग करते हुए प्रदर्शन किया। सुगाथन फिलहाल केरल एंटी सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (KAAPA) के तहत जेल में बंद हैं। सिर्फ LDF ही नहीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF भी सुगाथन को पार्षद पद से अयोग्य घोषित करने की मांग कर रहा है।

भाजपा पार्षद का शपथ अमान्य घोषित
राज्य के गृह सचिव पहले ही उनके खिलाफ KAAPA लागू करने की मंजूरी दे चुके हैं। वहीं, उनके पहले ली गई शपथ को भी अमान्य घोषित किया जा चुका है। अब माना जा रहा है कि सुगाथन केरल हाई कोर्ट में दोबारा शपथ लेने की अनुमति मांग सकते हैं। इससे पहले हाई कोर्ट ने उन्हें 14 दिनों के भीतर शपथ लेने की इजाजत देने का आदेश दिया था। इसके अलावा सुगाथन अपनी हिरासत से राहत पाने के लिए KAAPA एडवाइजरी बोर्ड का भी दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। उधर, राज्य सरकार उन शिकायतों पर कानूनी राय लेने पर विचार कर रही है, जिनमें कहा गया है कि दोबारा शपथ लेने की अनुमति देना केरल नगरपालिका अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ होगा। इस पूरे विवाद के बीच भाजपा ने कांग्रेस और एलडीएफ पर मिलीभगत का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि दोनों मिलकर नगर निगम की बीजेपी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं।

कांग्रेस ने किया पलटवार 
भाजपा के इस आरोप पर कांग्रेस पार्षद और पूर्व विधायक के. सबरीनाथन ने निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा ने सत्ता में आने से पहले बड़े-बड़े वादे किए थे। कहती थी कि सत्ता में आते ही सब बदल जाएगा और 45 दिनों के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहां लेकर आएगी। लेकिन लेफ्ट के 10 साल के शासन में जो हालात नहीं बने, उससे भी खराब स्थिति बीजेपी के 10 महीने से कम के शासन में हो गई है। 


ये भी पढ़ें: देवी-देवताओं का नाम लेने पर उठे थे सवाल, हाईकोर्ट ने भाजपा पार्षदों को दोबारा शपथ लेने का दिया आदेश

नगर निगम परिषद में भाजपा के पास हैं 50 पार्षद 
101 सदस्यीय नगर निगम परिषद में बीजेपी के 50 पार्षद हैं और उसे एक निर्दलीय पार्षद का भी समर्थन प्राप्त है। दूसरी ओर, LDF के पास 29 सदस्य हैं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF के पास 20 पार्षद हैं। इसके अलावा एक निर्दलीय पार्षद भी है, जो आमतौर पर विपक्ष का समर्थन करता है। भाजपा का एक पार्षद फिलहाल जेल में होने की वजह से विपक्षी दलों के एकजुट होने की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव को लेकर सियासी गणित काफी दिलचस्प हो गया है। हालांकि, मेयर वी.वी. राजेश ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चिंता जताने से इनकार किया है। उन्होंने कहा, 'नगरपालिका कानून के मुताबिक हर पार्टी को अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार है। विपक्ष जो चाहे कर सकता है।' 

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