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OBC: पश्चिम बंगाल विधानसभा में पारित हुए ओबीसी से जुड़े दो संशोधन विधेयक, आरक्षण समेत और क्या बदलेगा?

Mon, 29 Jun 2026 05:40 PM IST
Devesh Tripathi पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता Published by: Devesh Tripathi Updated Mon, 29 Jun 2026 05:40 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने ओबीसी आरक्षण और पिछड़ा वर्ग आयोग से जुड़े दो संशोधन विधेयकों को बहुमत से मंजूरी दे दी। नए प्रावधानों के तहत 66 समुदायों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलेगा तथा आरक्षण व्यवस्था को कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप पुनर्गठित किया गया है। संशोधन से राज्य सरकार को आयोग से परामर्श के बाद विभिन्न ओबीसी श्रेणियों के लिए आरक्षण तय करने का अधिकार मिला है। 

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Two OBC amendment bills passed in West Bengal Assembly know what change in reservations BJP rebel TMC MLA
पश्चिम बंगाल सरकार ने पारित किए ओबीसी समुदाय से जुड़े दो संशोधन विधेयक - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से जुड़े दो संशोधन विधेयक पारित कर दिए। मतदान से पहले विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी विधायकों के एक समूह ने सदन से वाकआउट किया।
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पारित किए गए दोनों विधेयक पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को छोड़कर) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) (संशोधन) विधेयक, 2026 और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) विधेयक, 2026 हैं।
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आरक्षण समेत और क्या-क्या बदलेगा?
इन विधेयकों के तहत ओबीसी वर्ग की 66 जातियों को आरक्षण दिया गया है। साथ ही, कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव करते हुए पहले के 17 प्रतिशत की जगह 7 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा ओबीसी श्रेणियों का पुनर्गठन भी किया गया है। दूसरा विधेयक पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग से जुड़े वर्ष 1993 के कानून में संशोधन करता है।
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विधानसभा में दोनों विधेयकों के पक्ष में 186 विधायकों ने मतदान किया, जबकि 17 विधायकों ने विरोध में वोट डाला। छह सदस्य मतदान से दूर रहे। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस ने आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी के अनुरोध पर मत विभाजन कराया। नौशाद सिद्दीकी और टीएमसी के बागी विधायक बिश्वनाथ दास ने सामाजिक न्याय का हवाला देते हुए विधेयकों का विरोध किया और इन्हें प्रवर समिति को भेजने की मांग की।

कलकत्ता हाईकोर्ट का क्यों किया जिक्र?
विधेयक पेश करते हुए राज्य के पिछड़ा वर्ग विकास मंत्री गौरीशंकर घोष ने कहा कि सरकार हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई कर रही है और संशोधनों के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है। उन्होंने सदन में कहा, "हमने पहले बिना किसी जमीनी सर्वे के शामिल की गई 113 जातियों को सूची से हटा दिया है, जबकि विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर शामिल की गई 66 उप-जातियों को बरकरार रखा है।"

उन्होंने कहा, "पिछड़ा वर्ग आयोग जांच करेगा और अगर उसे लगेगा कि किसी समुदाय को शामिल किया जाना चाहिए, तो वह राज्य सरकार को इसकी सिफारिश करेगा। पिछली सरकार ने आयोग को दरकिनार किया था, इसलिए हाईकोर्ट ने उस प्रक्रिया को रद्द कर दिया।"

कलकत्ता हाईकोर्ट का क्या था फैसला?
मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच ओबीसी सूची में जोड़ी गई 77 अतिरिक्त समुदायों को ओबीसी दर्जा देने और जारी किए गए प्रमाणपत्रों को अवैध और असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। अदालत के फैसले से वर्ष 2010 के बाद जारी करीब 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र निरस्त हो गए थे। हालांकि, आरक्षण के आधार पर पहले से नौकरी पा चुके लोगों की नियुक्तियां सुरक्षित रखी गई थीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि वर्ष 2010 से पहले जारी प्रमाणपत्र वैध रहेंगे।

19 मई को राज्य सरकार ने धर्म आधारित वर्गीकरण व्यवस्था समाप्त कर दी थी। वर्ष 2010 से पहले ओबीसी सूची में शामिल 66 समुदायों को नियमित करते हुए उन्हें 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ फिर से बहाल किया था। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की अधिसूचना के अनुसार, एक ही श्रेणी में शामिल इन 66 समुदायों में तीन मुस्लिम समुदाय भी हैं। इन्हें अब सरकारी सेवाओं और पदों में 7 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा।

संशोधन विधेयक पारित होने से क्या बदला?
नई व्यवस्था ने पहले की उस प्रणाली की जगह ली है, जिसमें 'अधिक पिछड़ा' श्रेणी (कैटेगरी-ए) को 10 प्रतिशत और 'पिछड़ा' श्रेणी (कैटेगरी-बी) को 7 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। सोमवार को पारित संशोधनों के तहत राज्य सरकार को पिछड़ा वर्ग आयोग से परामर्श कर ओबीसी की विभिन्न श्रेणियों के लिए आरक्षण का प्रतिशत तय करने का अधिकार दिया गया है। इससे राज्य मंत्रिमंडल के फैसले को कानूनी मान्यता मिल गई है।

संशोधित विधेयक में कहा गया है कि आरक्षित पदों का प्रतिशत समय-समय पर आरक्षण के अनुपात में बदला जा सकता है, लेकिन कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। विधेयक के अनुसार, राज्य सरकार आयोग से परामर्श कर सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर ओबीसी नागरिकों को अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकेगी। इसके बाद प्रत्येक श्रेणी के लिए अलग-अलग आरक्षण का प्रावधान किया जाएगा।

पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 में संशोधन वाले विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि नागरिक ओबीसी सूची में शामिल किए जाने के लिए आवेदन कर सकेंगे। आयोग ऐसे आवेदनों की जांच करेगा और राज्य सरकार को अपनी सिफारिश भेजेगा।

कैसे लागू होगा संसोधन विधेयक?
अगर किसी समुदाय को ओबीसी सूची में अधिक या कम शामिल किए जाने संबंधी शिकायत आती है तो आयोग उसकी भी जांच करेगा और राज्य सरकार आयोग की सिफारिश के अनुसार कार्रवाई करेगी। विधेयक के अनुसार, आयोग के सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष का होगा, जबकि सदस्य-सचिव का कार्यकाल राज्य सरकार तय करेगी। सदस्य-सचिव एक कार्यरत सरकारी अधिकारी होगा।


मतदान से पहले ऋतब्रत बनर्जी समर्थक टीएमसी विधायकों के एक समूह ने सदन से वाकआउट किया। हालांकि, ममता बनर्जी के प्रति निष्ठा रखने वाले टीएमसी विधायक सदन में मौजूद रहे और संशोधन विधेयकों के पक्ष में मतदान किया।
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