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West Bengal: क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक गठजोड़ ही सत्ता की चाबी; पहचान बनाम राष्ट्रीयता के बीच सिमटी असली लड़ाई

N Arjun एन अर्जुन
Updated Sat, 21 Mar 2026 04:14 AM IST
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सार

2021 के चुनावी आंकड़े को संकेत मानें, तो बंगाल में सत्ता की चाबी किसी बड़े नैरेटिव में नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक फैले क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक गठजोड़ और वोट ट्रांसफर में छिपी है और यही समीकरण 2026 की बाजी तय करेंगे।

west bengal assembly election 2026 Regional balance social alliances hold key to power BJP TMC Mamata Banerjee
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव - फोटो : ANI
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विस्तार

सियासी पारा चढ़ने के साथ पश्चिम बंगाल में इस बार भी तस्वीर साफ है...चुनाव किसी लहर या चेहरे से नहीं, बल्कि जमीन पर जमे समीकरणों से तय होगा। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस अपने मजबूत सामाजिक गठजोड़, महिला वोट बैंक और कल्याणकारी योजनाओं के सहारे लगातार चौथी पारी का दावा कर रही है। वहीं, भाजपा 2021 की हार से सबक लेते हुए क्षेत्रवार आक्रामक रणनीति के जरिए मुकाबले को सीधा और निर्णायक बनाने की कोशिश में है। 2021 के चुनावी आंकड़े को संकेत मानें, तो बंगाल में सत्ता की चाबी किसी बड़े नैरेटिव में नहीं, बल्कि उत्तर से दक्षिण तक फैले क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक गठजोड़ और वोट ट्रांसफर में छिपी है और यही समीकरण 2026 की बाजी तय करेंगे।
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बंगाल में विधानसभा की कुल सीटें 294 हैं। 2021 में तृणमूल ने 213 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा को 77 सीटें मिली थीं। चार सीटें निर्दलीयों के खाते में गई थीं। यह महज एक समग्र आंकड़ा नहीं है। इसकी असली ताकत तब समझ आती है, जब भौगोलिक क्षेत्रों में बांटकर देखते हैं। 2026 का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक मॉडल वेलफेयर और क्षेत्रीय पहचान बनाम विकास और राष्ट्रीय राजनीति के बीच सीधी टक्कर है। जिसने क्षेत्रीय गणित साध लिया, वही बंगाल की सत्ता पर काबिज होगा।
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किन मुद्दों पर आमने-सामने भाजपा और टीएमसी?
एक ओर तृणमूल कांग्रेस है, जो अपनी कल्याणकारी योजनाओं व बंगाली अस्मिता के मुद्दे को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ रही है। पार्टी महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता, मुफ्त राशन, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं के सहारे सीधे मतदाताओं तक पहुंच बनाने में जुटी है। साथ ही बाहरी बनाम स्थानीय की बहस को भी धार दे रही है।

वहीं, दूसरी ओर भाजपा विकास, निवेश और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के एजेंडे के साथ मैदान में है। वह रोजगार, उद्योग और कानून-व्यवस्था को मुख्य मुद्दा बना रही है। साथ ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के जरिये राष्ट्रीयता के मुद्दे को हवा दे रही है, तो केंद्रीय योजनाओं और डबल इंजन सरकार के जरिए तेज विकास का दावा कर रही है। विश्लेषक कहते हैं बंगाल का चुनाव फिर यह साफ कर रहा है कि यहां सत्ता का फैसला किसी एक मुद्दे से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और वोट ट्रांसफर से होता है।

उत्तर बंगाल : तृणमूल के लिए चुनौती, भाजपा की लाइफलाइन
उत्तर बंगाल में कुल 54 सीटें हैं। यह भाजपा का गढ़ माना जाता है। 2021 में उसे 30 सीटें मिली थीं, जबकि तृणमूल को 24। सीमावर्ती व पहाड़ी इलाकों में भाजपा ने मजबूत पकड़ बनाई। यही वह क्षेत्र था, जिसने उसे बंगाल में मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया। 2026 में भाजपा की रणनीति यहां बढ़त और बढ़ाने की है, जबकि तृणमूल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

दक्षिण और मध्य बंगाल : सत्ता की चाबी का ठिकाना यही
यह सबसे बड़ा और निर्णायक क्षेत्र है, जहां से सरकार का रास्ता तय होता है। ग्रामीण वोट बैंक और वेलफेयर योजनाओं ने टीएमसी को यहां निर्णायक बढ़त दिलाई। यहां पर कुल 167 सीटें हैं। इनमें से 134 सीटें तृणमूल को मिली थीं, जबकि भाजपा 29 और अन्यों को 4 सीटें मिली थीं।

ग्रेटर कोलकाता : तृणमूल का अभेद्य किला, भाजपा कमजोर
शहरी, मध्यम वर्ग और अल्पसंख्यक मतदाताओं का भारी समर्थन तृणमूल के साथ गया। भाजपा यहां अब भी संगठन और स्थानीय नेतृत्व के स्तर पर कमजोर दिखती है। यहां पर कुल 33 सीटें हैं, जिसमें से 2021 में तृणमूल को 30 और भाजपा को 3 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था।

जंगलमहल क्षेत्र : ममता का खोया जनाधार वापस लौटा
आदिवासी बहुल इस इलाके में तृणमूल ने 2019 के बाद खोया जनाधार वापस पाया। हालांकि यह इलाका पूरी तरह स्थिर नहीं है। हल्का सा स्विंग भी नतीजे बदल सकता है। पिछली बार यहां की 40 में से 25 सीटें तृणमूल ने झोली में डाली थी, जबकि भाजपा को 15 सीटें मिली थीं।

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