West Bengal: ममता राज में मदरसों का बजट 12 गुना बढ़ा, भाजपा ने पूछा- डर कर दिया, या वोटों के लिए?
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार में मदरसों का बजट 12 गुना बढ़ाया गया है। पहले यह बजट 472 करोड़ रुपये था जो अब बढ़कर 5713 करोड़ रुपये हो चुका है।
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ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल में मदरसा शिक्षा के लिए 5713 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है। टीएमसी के पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने के समय यह बजट करीब 472 करोड़ रुपये था जो अब लगभग 12 गुना बढ़ चुका है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि ममता बनर्जी सरकार चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के लिए मुस्लिमों का तुष्टिकरण कर रही है। पार्टी ने पूछा है कि ममता बनर्जी को बताना चाहिए कि मदरसों के बजट में इतना भारी वृद्धि किस कारण की गई है।
भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि ममता बनर्जी सरकार मदरसा शिक्षकों के नाम पर मस्जिद में अजान देने वाले मुअज्जिनों का वेतन बढ़ाकर मुसलमानों का समर्थन हासिल करना चाहती है। उन्होंने कहा कि यदि मुसलमान बच्चों की शिक्षा को बेहतर करने के लिए बजटीय प्रावधान किया गया होता तो इसका स्वागत किया जाता, लेकिन सरकार ने बच्चों की शिक्षा की बजाय केवल मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण पर खर्च किया गया है। ममता बनर्जी को बताना चाहिए कि वह यह बजटीय वृद्धि किस कारण कर रही है। उन्होंने कहा कि वे बताएं कि वे मुसलमानों से डर कर यह बजट बढ़ा रही हैं या इसके पीछे सरकार की कोई और राजनीतिक चाल है।
त्रिवेदी ने कहा कि पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कुछ मदरसों की हरकतों पर गहरे सवाल खड़े किए थे। उन्होंने इन मदरसों के पाकिस्तान से संबंध होने के साथ-साथ कुछ मदरसों में गंभीर आपराधिक गतिविधियों के होने तक की बात कही थी। उन्होंने कहा कि, लेकिन ममता बनर्जी सरकार केवल मुसलमानों का वोट लेने के लिए राज्य की सुरक्षा को ताक पर रख रही है। इसके भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
ममता का डर क्या है
दरअसल, पश्चिम बंगाल के करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता ममता बनर्जी को वोट देते आए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में मुसलमानों का ममता बनर्जी के प्रति यह झुकाव लगभग एक तरफा हो गया था जब वामदलों और कांग्रेस ने राज्य में एक रणनीति के अंतर्गत कमजोर खेलने का निर्णय कर लिया था। लेकिन इस बार ममता बनर्जी के ही सहयोगी रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी के रातों की नींद उड़ा रखी है। वे राज्य की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं।
इधर, एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी भी पश्चिम बंगाल में अपनी ताकत दिखाने के लिए बेचैन हैं। बिहार चुनाव में इस बार बेहतर सफलता हासिल करने के बाद उन्हें लगता है कि वे बिहार से सटे इलाकों में बेहतर प्रदर्शन कर अपनी पार्टी को बड़ा आयाम दे सकते हैं। लेकिन यदि हुमायूं कबीर या असदुद्दीन ओवैसी को पश्चिम बंगाल में जितनी भी सफलता मिलती है, यह सीधे तौर पर ममता बनर्जी का ही नुकसान होगा।
2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की टीएमसी ने करीब 48 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि भाजपा ने इस चुनाव में करीब 38 प्रतिशत वोट पाकर लोगों को चौंका दिया था। यदि हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी मिलकर ममता बनर्जी का 10 फीसदी भी वोट काटते हैं तो एसआईआर के कारण बदली हुई परिस्थितियों में सत्ता परिवर्तन हो सकता है।
यही कारण है कि ममता बनर्जी इस समय बहुत आक्रामक हैं। वे लगातार एसआईआर के बहाने केंद्र और चुनाव आयोग पर हमला कर रही हैं। माना जा रहा है कि इन्हीं परिस्थितियों में ममता बनर्जी ने मुसलमानों के लिए खजाना खोलकर उन्हें अपने से बांधे रखना चाहती हैं।
ये वादे भी किये
ममता बनर्जी सरकार ने अप्रैल-मई में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के ठीक पहले 5 फरवरी को अंतरिम बजट पेश किया है। सरकार ने 4.06 लाख करोड़ रुपये के बजट में लोकलुभावन योजनाओं पर भारी निवेश किया है। महिलाओं को लुभाने के लिए लाई गई लक्ष्मी भंडार योजना की लाभार्थियों को 500 रुपये प्रति महीने की अतिरिक्त सहायता, आशा कार्यकर्ताओं के वेतन में 1000 रुपये मासिक की वृद्धि किया है। सरकार ने युवाओं के लिए बांग्लार युवा साथी योजना लाने और हर बेरोजगार युवा को 1500 रुपये हर महीने देने का वादा किया है।
