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Explainer: बिना सुनवाई सालभर तक हिरासत, जुर्म की आशंका पर ही जेल..क्या हैं बंगाल में लागू हुए अपराध-रोधी कानून

Mon, 13 Jul 2026 04:57 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 13 Jul 2026 04:57 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियां अधिनियम, 2026  और सार्वजनिक व्यवस्था प्रबंधन अधिनियम, 2026 आज से राज्य में लागू हो गए हैं। इन दोनों ही कानूनों को लेकर देशभर में बहस छिड़ी है। विपक्ष और कानून के मामलों के जानकारों का कहना है कि इस अधिनियम के जरिए पुलिस-प्रशासन की ताकतों को काफी बढ़ा दिया गया है। वहीं, भाजपा का कहना है कि पिछले कानून बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा और संपत्ति के नुकसान से निपटने के लिए नाकाफी थे, इसलिए दंगों और संगठित हिंसा से निपटने के लिए राज्य की क्षमता को मजबूत करने के लिए ये कानून लाए गए।

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West Bengal New Anti Crime Laws come into force Public Safety and Control of Anti-social Activities explained
पश्चिम बंगाल में दो नए अपराध-रोधी कानून लागू। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिम बंगाल विधानसभा की तरफ से हाल ही में पारित किए गए दो अपराध-रोधी कानून- पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा एवं असामाजिक गतिविधियां अधिनियम, 2026  और सार्वजनिक व्यवस्था प्रबंधन अधिनियम, 2026 आज (सोमवार) से राज्य में लागू हो गए हैं। 29 जून को पारित किए जाने से पहले इन दोनों ही विधेयकों पर विधानसभा में जमकर बहस हुई थी। हालांकि, भाजपा को राज्य में हालिया चुनाव में मिले जनादेश का फायदा हुआ और इन दोनों ही विधेयकों के पक्ष में 176 वोट पड़े, जबकि खिलाफ में सिर्फ 41 वोट आए। इस तरह विधेयक के अधिनियम बनने की राह साफ हो गई और अब राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह दोनों ही कानून लागू हो गए हैं। 
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विपक्ष और कानून के मामलों के जानकारों का कहना है कि इसके जरिए पुलिस-प्रशासन की ताकत काफी बढ़ जाएगी और लोगों तक इनकी पहुंच का दायरा अब व्यापक हो चुका है। खासकर बिना किसी सुनवाई के एक वर्ष तक हिरासत में रखने के प्रावधान पर सबसे ज्यादा चर्चा है। आलोचकों का तर्क है कि यह कानून संविधान में दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों से जुड़े कई सवाल खड़े करता है।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर बंगाल में जो दो कानून आज से लागू हो रहे हैं, वह क्या हैं? इन कानूनों के तहत किन-किन लोगों पर और क्या कार्रवाई की जा सकती है? कानून में ऐसा क्या प्रावधान किया गया है, जिस पर विपक्ष चिंता जता रहा है? इन कानूनों के तहत होने वाली कार्रवाई की समीक्षा के लिए क्या नियम हैं? क्या किसी राज्य में इतने सख्त नियमों वाला कानून पहले भी है? आइये जानते हैं...
    

बंगाल में जो दो कानून आज से लागू हो रहे हैं, उनमें क्या प्रावधान?

पश्चिम बंगाल में आज से जो दो नए कड़े कानून लागू हो रहे हैं, वे असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण और सार्वजनिक या निजी संपत्ति के नुकसान की वसूली से जुड़े हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के मुताबिक, इन कानूनों को लाने का मुख्य उद्देश्य राज्य से गुंडाराज को खत्म करना, संगठित हिंसा से सख्ती से निपटना और महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना है।
 

पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण अधिनियम, 2026 

पश्चिम बंगाल सरकार के मुताबिक, सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण अधिनियम, 2026 संगठित अपराध और सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए लाया गया है।

1. प्रिवेंटिव डिटेंशन का प्रावधान
  • इस कानून के तहत असामाजिक गतिविधियों में शामिल या भविष्य में ऐसी गतिविधियों में शामिल होने की आशंका वाले व्यक्तियों को बिना ट्रायल (सुनवाई) के अधिकतम 12 महीने (एक वर्ष) तक निवारक हिरासत में रखा जा सकता है।
  • हिरासत का आदेश राज्य सरकार, जिला मजिस्ट्रेट (डीएम), पुलिस आयुक्त या सरकार की तरफ से अधिकृत पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआईजी) स्तर के पुलिस अधिकारी की ओर से जारी किया जा सकता है।
  • जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त की तरफ से जारी किए गए हिरासत का आदेश शुरुआत में केवल 15 दिनों के लिए वैध रहता है और इसे आगे जारी रखने के लिए राज्य सरकार से औपचारिक मंजूरी लेनी जरूरी होगा।



2. तड़ीपार करने का अधिकार
इस अधिनियम के तहत अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे असामाजिक तत्वों को किसी विशेष क्षेत्र या जिले से अधिकतम एक वर्ष तक के लिए तड़ीपार (बाहर) कर सकते हैं और उनके वहां लौटने पर रोक लगा सकते हैं।
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3. सलाहकार बोर्ड को दी गई ताकतें
  • हिरासत के आदेशों की समीक्षा के लिए सलाहकार बोर्ड के गठन का प्रावधान है। इस बोर्ड के अध्यक्ष हाईकोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश होंगे और इसमें दो अन्य सदस्य होंगे जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखते हों।
  • हर हिरासत आदेश को इस बोर्ड के सामने रखा जाएगा। अगर बोर्ड यह निष्कर्ष निकालता है कि हिरासत के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं, तभी राज्य सरकार हिरासत को 12 महीने तक बढ़ा सकती है। 
  • इस कानून का एक कड़ा प्रावधान यह है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को आमतौर पर सलाहकार बोर्ड के सामने किसी वकील के जरिए पक्ष रखने की इजाजत नहीं दी गई है। बोर्ड सिर्फ विशेष मामलों में ही लिखित कारण देकर ही आरोपी को वकील की अनुमति दे सकता है। 
  • बोर्ड में किसी भी मामले की कार्यवाही को पूरी तरह गोपनीय रखने का प्रावधान भी किया गया है। यानी किसी मामले की सुनवाई, तर्कों के दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए जाएंगे।

4. अपराध की गैर-जमानती प्रकृति
इस कानून के तहत आने वाले सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती माने जाएंगे। 

West Bengal New Anti Crime Laws come into force Public Safety and Control of Anti-social Activities explained
पश्चिम बंगाल में दो नए अपराध-रोधी कानून लागू। - फोटो : अमर उजाला
5. तलाशी, जब्ती और अन्य अधिकार
  • यह कानून पुलिस और प्रशासन को तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी के अधिकार देता है।
  • हिरासत में लिए गए या तड़ीपार किए गए व्यक्ति को पनाह देने वालों के लिए सजा का प्रावधान है।
  • अधिकारियों की निष्पक्ष और साफगोई से की गई कार्रवाइयों के लिए उन्हें कानूनी छूट दी गई है।


इस कानून के तहत किस-किस को हिरासत में लिया जा सकता है?

कानून के तहत उन लोगों को हिरासत में लिया जा सकता है जो असामाजिक गतिविधियों में शामिल हैं या जिनके भविष्य में ऐसी गतिविधियों में शामिल होने की संभावना है। 

1. 'गुंडा' के दायरे में आने वाले लोग
कानून में 'गुंडा' की परिभाषा को बहुत व्यापक बनाया गया है। इसमें वे लोग शामिल हैं जो आदतन असामाजिक कृत्य करते हैं, उसका प्रयास करते हैं, उसे बढ़ावा देते हैं, या उसके लिए रकम का प्रबंध करते हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो अकेले या किसी संगठित गिरोह (सिंडिकेट) के हिस्से के रूप में काम करते हैं।

2. समुदाय के लिए खतरनाक व्यक्ति 
ऐसे व्यक्ति जिन्हें आदतन अपराधी माना जाता है या जिनकी छवि समुदाय के लिए बहुत हताश और खतरनाक है, उन्हें भी इस कानून के तहत हिरासत में लिया जा सकता है।

3. विशिष्ट और गंभीर अपराधों के आरोपी
उन व्यक्तियों को हिरासत में लिया जा सकता है जो इन कानूनों के तहत अपराधों में शामिल हों या जिन पर चार्जशीट दायर की गई है...
  • संगठित अपराधों और छोटे संगठित अपराध के मामले में।
  • आर्म्स एक्ट।
  • नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट (एनडीपीएस)।
  • विस्फोटक पदार्थ अधिनियम।
  • अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम।

4. आर्थिक और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले
जो लोग सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने, डर का माहौल बनाने, दूसरों की संपत्ति पर अवैध कब्जा करने, अवैध खनन, बालू-रेत खनन या वन और वन्यजीवों से जुड़े ऐसे अपराधों में शामिल हैं, जिनसे सरकारी खजाने को भारी नुकसान होता है, उन्हें भी असामाजिक गतिविधियों के तहत हिरासत में लिया जा सकता है। एक लिहाज से देखा जाए तो असामाजिक गतिविधियों का दायरा भी इस कानून के जरिए बढ़ाया गया है। 

क्या हैं हिरासत में लेने के लिए जरूरी शर्तें

सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हिरासत का आदेश तभी जारी किया जा सकता है जब पिछले 7 वर्षों में उसे कम से कम एक बार कानून में दिए गए अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया हो या उसके खिलाफ कम से कम तीन अलग-अलग मामलों में चार्जशीट दायर की गई हो। हालांकि, भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 (संगठित अपराध) के तहत मामलों में, राज्य सरकार यदि चाहे तो लिखित रूप में कारण दर्ज करके इन अनिवार्य शर्तों (7 साल या 3 चार्जशीट) में ढील दे सकती है।
 

पश्चिम बंगाल सार्वजनिक व्यवस्था रखरखाव (संशोधन) अधिनियम, 2026

यह कानून मुख्य रूप से दंगों, आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसक प्रदर्शनों के दौरान नष्ट हुई सार्वजनिक और निजी संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए एक कानूनी ढांचा स्थापित करता है। यह 1972 के मूल कानून में संशोधन करता है। 

1. नुकसान की वसूली का तंत्र
यह कानून दंगों या असामाजिक गतिविधियों के दौरान सार्वजनिक और निजी दोनों तरह की संपत्तियों को हुए नुकसान की वसूली के लिए एक सख्त व्यवस्था बनाता है। इसका मकसद उन लोगों से पैसे वसूलना है जो हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं।
 

2. क्लेम कमीशन का गठन
  • नुकसान का आकलन करने और मुआवजा तय करने के लिए एक दावा आयोग बनाया जाएगा।
  • इस आयोग का प्रमुख एक नौकरशाह होगा, जो कम से कम अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) रैंक का अधिकारी होगा। 
  • आयोग को दीवानी अदालत यानी सिविल कोर्ट के बराबर के अधिकार प्राप्त होंगे।

3. दावा दायर करने की प्रक्रिया
सार्वजनिक संपत्ति के लिए: संबंधित सरकारी विभाग नुकसान का आकलन करेगा और जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) या पुलिस आयुक्त को अपना दावा सौंपेगा, जो इसे क्लेम कमीशन के सामने रखेंगे।

निजी संपत्ति के लिए: जिस व्यक्ति की निजी संपत्ति का नुकसान हुआ है, वह मुआवजे के लिए सीधे क्लेम कमीशन से संपर्क कर सकता है।

4. कठोर नियम और जिम्मेदारी
एक बार घटना और नुकसान के बीच संबंध साबित हो जाने पर, आयोग सख्त देयता लागू करता है। इसके तहत केवल नुकसान पहुंचाने वाले लोग ही नहीं, बल्कि उन्हें भड़काने वाले, पैसे मुहैया कराने वाले या पनाह देने वाले लोगों को भी मुआवजे के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

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पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक-निजी संपत्ति को पहुंचे नुकसान से जुड़ी शिकायतों को सुलझाएगा दावा आयोग। - फोटो : अमर उजाला
5. मुआवजे की राशि और दंडात्मक हर्जाना
तय किया गया मुआवजा संपत्ति के बाजार मूल्य से कम नहीं हो सकता। आयोग के पास यह अधिकार है कि वह एक सबक सिखाने के लिए मूल मुआवजे की दोगुनी राशि तक दंडात्मक हर्जाना लगा सकता है।

6. संपत्ति की कुर्की और नीलामी का भी प्रावधान
अगर कोई व्यक्ति तय समय सीमा के भीतर मुआवजे की राशि का भुगतान नहीं करता है, तो इस बकाया राशि को भू-राजस्व के बकाए के रूप में वसूला जाएगा। इसका मतलब है कि प्रशासन उस व्यक्ति की निजी संपत्ति को कुर्क कर सकता है और उसकी नीलामी (बिक्री) करके नुकसान की भरपाई कर सकता है।

7. फैसले को चुनौती का प्रावधान ही नहीं
इस कानून का एक बहुत ही सख्त प्रावधान यह है कि क्लेम कमीशन की तरफ से लिया गया हर फैसला अंतिम होगा। इस फैसले के खिलाफ किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकेगी और दीवानी अदालतों को इस मामले में दखल देने से पूरी तरह रोक दिया गया है।    

इन कानूनों को लेकर सरकार-विपक्ष-विशेषज्ञों का क्या तर्क?

पश्चिम बंगाल के इन दो नए कानूनों को लेकर राज्य सरकार और आलोचकों (कानूनी जानकारों) की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक तरफ सरकार इन्हें अपराध रोकने के लिए जरूरी बता रही है, वहीं दूसरी तरफ इनके कड़े प्रावधानों की तीखी आलोचना हो रही है।

राज्य सरकार और मुख्यमंत्री का पक्ष

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि ये पिछले 15 वर्षों के तृणमूल शासन की गुंडा-नीति और जंगलराज का समाधान हैं। सरकार का तर्क है कि मौजूदा कानून बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा और संपत्ति के नुकसान से निपटने के लिए अपर्याप्त थे, इसलिए दंगों और संगठित हिंसा से निपटने के लिए राज्य की क्षमता को मजबूत करने के लिए ये कानून लाए गए हैं।
 

आलोचकों और कानूनी जानकारों की चिंताएं

बिना ट्रायल के हिरासत: इन कानूनों की सबसे अधिक आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि इनमें बिना किसी आपराधिक मुकदमे (क्रिमिनल ट्रायल) के व्यक्ति को 12 महीने तक निवारक हिरासत में रखने की अनुमति दी गई है।

वकील के जरिए बचाव पर रोक: विपक्ष ने इस प्रावधान पर भी गंभीर चिंता जताई है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड के सामने अपना पक्ष रखने के लिए आमतौर पर किसी वकील की मदद लेने की अनुमति नहीं होगी।


व्यापक और अस्पष्ट परिभाषाएं: 'गुंडा' और 'असामाजिक गतिविधि' की परिभाषाओं को इतना व्यापक बना दिया गया है कि विश्लेषकों को डर है कि इससे प्रशासन की शक्तियों का दायरा बहुत अधिक बढ़ जाएगा। इसके अलावा, किसी व्यक्ति को बार-बार हिरासत में लेने की शक्ति ने भी चिंताएं बढ़ाई हैं।

दीवानी अदालतों में अपील का अधिकार छिनना: संपत्ति नुकसान वसूली कानून के तहत क्लेम कमीशन के हर फैसले को अंतिम माना गया है और दीवानी अदालतों में इसके खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकेगी।
 

क्या पहले भी आए हैं ऐसे कानून, उनकी स्थिति क्या?

पश्चिम बंगाल के ये दोनों कानून अपनी तरह के पहले कानून नहीं हैं। इससे पहले भी केंद्र और अन्य राज्यों में इस तरह के कानून लाए जा चुके हैं। 

1. निवारक हिरासत वाले कानून की पृष्ठभूमि

भारतीय संविधान: संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत कुछ सुरक्षा उपायों के साथ प्रिवेंटिव डिटेंशन की इजाजत दी गई है।

पश्चिम बंगाल का पुराना कानून: पश्चिम बंगाल में 1970 के दशक से ही एक निवारक निरोध कानून मौजूद है, लेकिन यह नया कानून (सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम) अपने दायरे में बहुत अधिक व्यापक है।

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), 1980: बंगाल का यह नया कानून काफी हद तक केंद्र के राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) से मिलता-जुलता है। रासुका के तहत भी राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए बिना आपराधिक मुकदमे (ट्रायल) के 12 महीने तक निवारक हिरासत में रखने की अनुमति है।

गुजरात का 'पासा' एक्ट, 1985: यह कानून गुजरात के प्रिवेंशन ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज एक्ट (पीएएसए), 1985 से बहुत मिलता-जुलता है। गुजरात के इस गुंडा कानून में भी एक साल तक हिरासत में रखने, तड़ीपार करने और एक सलाहकार बोर्ड की ओर से हिरासत की समीक्षा करने जैसे प्रावधान हैं।

2. संपत्ति नुकसान वसूली वाले कानून की स्थिति
बंगाल में संपत्ति के नुकसान की वसूली के लिए लाया गया यह कानून, कुछ हद तक उत्तर प्रदेश में लाए गए एक पूर्व कानून के प्रारूप पर आधारित है। दरअसल, दिसंबर 2019 में सीएए विरोध प्रदर्शनों के बाद योगी सरकार ने सड़क किनारे होर्डिंग लगाकर तोड़फोड़ के आरोपियों के नाम और तस्वीरें छापी थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन्हें हटाने का आदेश दिया था और सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि इस कार्रवाई का समर्थन करने के लिए कोई कानून नहीं है। इसके बाद यूपी सरकार ने एक अलग कानून बनाया, जिसके तहत संपत्ति की वसूली के लिए अलग प्रावधान बना दिए गए, जिसकी सुनवाई ट्रिब्यूनल को सौंपी गई। 

इस कानून को सुप्रीम कोर्ट से कड़ी फटकार सुननी पड़ी थी। फरवरी 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को 274 रिकवरी नोटिस वापस लेने और पैसे लौटाने के लिए मजबूर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संपत्तियों को कुर्क करने में राज्य ने शिकायतकर्ता, न्यायकर्ता और अभियोजक तीनों की भूमिका खुद ही निभा ली थी।

सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई के बाद, यूपी सरकार ने अपना 2020 का पुराना कानून वापस ले लिया और 2022 में एक नया कानून बनाया। नए कानून में ट्रिब्यूनल (क्लेम कमीशन) का प्रमुख एक स्वतंत्र सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश को बनाया गया। अहम बात यह है कि यूपी के इस 2022 वाले कानून को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यानी ऐसे कानूनों की वैधता का मामला अभी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

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