Explainer: दुनिया के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत कहां, सुधार के लिए सरकार कर रही कौन से प्रयास?
पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (EPI) 2026 की रिपोर्ट सामने आ गई है। इस रिपोर्ट में भारत की रैंकिंग के साथ पर्यावरणीय प्रदर्शन का आकलन किया गया है। आखिर यह सूचकांक क्या है और इसमें भारत को लेकर क्या कहा गया है और सरकार इस दिशा में क्या कर रही है? आइए समझते हैं।
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विस्तार
भारत एक ओर दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। हाल ही में जारी पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (EPI) 2026 में भारत 176वें स्थान पर है।
ईपीआई किन आधारों पर देशों की रैंकिंग तय करता है? भारत की स्थिति क्या है? रिपोर्ट में किन चुनौतियों का जिक्र किया गया है? 2024 की रिपोर्ट में भारत की स्थिति क्या रही? सरकार किन उपलब्धियों का दावा कर रही है? आइये जानते हैं...
क्या है पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (EPI)?
ईपीआई दुनिया के देशों के पर्यावरणीय प्रदर्शन को मापने वाला एक वैश्विक सूचकांक है। इसे येल यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया जाता है। इसका उद्देश्य यह आकलन करना है कि कोई देश पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से निपटने और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने में कितना सफल है। 2026 की रिपोर्ट में 177 देशों का मूल्यांकन किया गया।
ईपीआई किन आधारों पर रैंकिंग तय करता है?
ईपीआई केवल प्रदूषण या जंगलों के आधार पर रैंकिंग नहीं देता, बल्कि 47 अलग-अलग संकेतकों के जरिए किसी देश के समग्र पर्यावरणीय प्रदर्शन का आकलन करता है। इन संकेतकों को 12 श्रेणियों और तीन बड़े नीति उद्देश्यों में बांटा गया है।
- सबसे अधिक 45 प्रतिशत भार पारिस्थितिकी तंत्र को दिया गया है। इसमें वन, घासभूमि, जैव विविधता, कृषि, मत्स्य संसाधन, जल संसाधन और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण का मूल्यांकन किया जाता है।
- 30 प्रतिशत भार जलवायु परिवर्तन को दिया गया है। इसमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने, नेट-जीरो लक्ष्यों की दिशा में प्रगति और जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों का आकलन होता है।
- 25 प्रतिशत भार पर्यावरणीय स्वास्थ्य को दिया गया है। इसमें वायु गुणवत्ता, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, भारी धातुओं से प्रदूषण और कचरा प्रबंधन जैसे मानकों को शामिल किया जाता है।
भारत की रैंकिंग क्या रही?
ईपीआई 2026 में भारत 177 देशों में 176वें स्थान पर रहा। भारत का स्कोर 22.46 रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दस वर्षों में भारत के स्कोर में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन अधिकांश संकेतकों में प्रदर्शन अभी भी कमजोर है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत की चुनौतियां किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पर्यावरणीय स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी तंत्र तीनों क्षेत्रों में दिखाई देती हैं।
जलवायु परिवर्तन को लेकर रिपोर्ट क्या कहती है?
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया अभी भी पेरिस समझौते के लक्ष्यों से काफी पीछे है। नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार होने के बावजूद ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है। पिछले दस वर्षों में भारत का कुल उत्सर्जन लगभग 32 प्रतिशत बढ़ा है। इसकी वजह तेज आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और ऊर्जा की बढ़ती मांग को बताया गया है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत नवीकरणीय ऊर्जा और वन क्षेत्र बढ़ाने की दिशा में निवेश कर रहा है, लेकिन 2030 और 2070 के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अभी बड़े निवेश की जरूरत होगी।
2024 और 2026 की रिपोर्ट में क्या बदलाव हुआ?
2024 के ईपीआई में 180 देशों का मूल्यांकन 58 संकेतकों और 11 श्रेणियों के आधार पर किया गया था। इसमें भारत 27.6 स्कोर के साथ 176वें स्थान पर था, जबकि 2026 में कार्यप्रणाली बदली गई। इस बार 177 देशों, 47 संकेतकों और 12 श्रेणियों को शामिल किया गया। पहली बार घासभूमि को अलग श्रेणी बनाया गया और कई संकेतकों में बदलाव किए गए।
सरकार का पक्ष क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरण संरक्षण के लिए लगातार बड़े कदम उठा रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु लक्ष्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अगस्त 2022 में भारत के अपडेटेड राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (एनडीसी) को मंजूरी दी थी। इसके तहत भारत ने 2030 तक 2005 के स्तर की तुलना में जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता 45 प्रतिशत कम करने, बिजली उत्पादन क्षमता का लगभग 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल करने और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है।
दिसंबर 2025 में सरकार ने क्या उपलब्धियां गिनाईं?
दिसंबर 2025 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने वर्ष 2025 के दौरान पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी उपलब्धियों का विस्तृत विवरण जारी किया।
सरकार के अनुसार 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के तहत 24 दिसंबर 2025 तक 262.4 करोड़ पौधे लगाए जा चुके थे। यह अभियान जनभागीदारी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया था।
भारत में वन और वृक्ष क्षेत्र देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत हो गया है। 2013 की तुलना में इसमें 4.83 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत वन क्षेत्र के मामले में दुनिया में नौवें स्थान पर पहुंच गया है व वार्षिक शुद्ध वन वृद्धि के मामले में तीसरे स्थान पर बना हुआ है।
वन्यजीव संरक्षण में क्या उपलब्धियां बताई गईं?
सरकार के अनुसार, देश में टाइगर रिजर्व की संख्या बढ़कर 58 हो गई है। हाथी रिजर्व की संख्या 33 तक पहुंच गई है। संरक्षित क्षेत्रों की संख्या 1134 हो गई है। प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 30 हो गई है, जिनमें भारत में जन्मे 19 शावक भी शामिल हैं। इसके अलावा भारत 18 देशों के साथ अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट एलायंस का भी नेतृत्व कर रहा है।
भारत ने 2020 तक 2005 की तुलना में जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में 36 प्रतिशत की कमी हासिल कर ली थी। जून 2025 तक देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से आने लगा था। इसके अलावा 2005 से 2021 के बीच 2.29 अरब टन अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार किया गया। सरकार ने कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को भी जलवायु रणनीति का महत्वपूर्ण कदम बताया है।
वायु प्रदूषण कम करने के लिए क्या किया जा रहा है?
सरकार के अनुसार, वायु प्रदूषण को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत देश के 130 शहरों को शामिल किया गया है। इस योजना के लिए अब तक 13,415 करोड़ रुपये की सहायता दी गई है। सरकार का दावा है कि 2024-25 तक 103 शहरों में PM10 के स्तर में कमी दर्ज की गई। इनमें 64 शहरों में 20 प्रतिशत से अधिक और 25 शहरों में 40 प्रतिशत से अधिक कमी आई है, जबकि 22 शहर राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) तक पहुंच गए हैं।
ईंधन और स्वच्छ ऊर्जा को लेकर देश की स्थिति?
भारत ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले ही हासिल कर लिया है। सरकार का कहना है कि ई20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) कार्यक्रम से वाहनों से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोकार्बन (HC) और अन्य प्रदूषकों के उत्सर्जन में कमी आती है, जिससे पेट्रोल की खपत घटाने और स्वच्छ हवा को बढ़ावा देने में मदद मिलती है।
अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (आईआरईएनए) के वर्ष 2025 के अनुसार सौर ऊर्जा क्षमता में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में भी चौथे स्थान पर है।
जैव विविधता और आर्द्रभूमि संरक्षण को लेकर क्या स्थिति?
सरकार के अनुसार मैंग्रोव संरक्षण के लिए MISHTI कार्यक्रम चलाया जा रहा है। 2025 तक 22,560 हेक्टेयर क्षतिग्रस्त मैंग्रोव क्षेत्र का पुनर्स्थापन किया गया। इसी वर्ष 11 नए रामसर स्थल घोषित किए गए, जिसके बाद भारत में कुल 96 रामसर साइट हो गईं। यह संख्या एशिया में सबसे अधिक है। उदयपुर और इंदौर को देश के पहले रामसर मान्यता प्राप्त वेटलैंड शहर घोषित किया गया।
कचरा प्रबंधन और सर्कुलर इकोनॉमी
सरकार ने 2025 में प्लास्टिक, ई-वेस्ट, बैटरी, टायर और अन्य आठ प्रकार के कचरे के लिए विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) व्यवस्था को मजबूत किया। सरकार के अनुसार 71 हजार से अधिक उत्पादक और 4,400 से अधिक रीसाइक्लर इस व्यवस्था के तहत पंजीकृत हुए तथा लाखों टन कचरे का पुनर्चक्रण किया गया।
पर्यावरण से जुड़े सुधार हम कहां?
2025 के दौरान सरकार ने ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम, वन संरक्षण नियमों में संशोधन, प्रदूषित स्थलों के प्रबंधन के नियम, निर्माण एवं विध्वंस कचरा प्रबंधन नियम, एंड-ऑफ-लाइफ वाहन नियम और पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया में कई बदलाव किए। सरकार का कहना है कि इन सुधारों का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ पारदर्शिता और प्रशासनिक प्रक्रिया को बेहतर बनाना है।
संसद में सरकार ने क्या बताया?
- इसी वर्ष लोकसभा में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि सरकार जल और वायु प्रदूषण को रोकने के लिए जल अधिनियम 1974, वायु अधिनियम 1981 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कार्रवाई कर रही है।
- देश के 130 शहरों में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम लागू है। प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की निगरानी के लिए ऑनलाइन उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (OCEMS) लागू की गई है।
- साथ ही राष्ट्रीय जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के माध्यम से नदियों की गुणवत्ता की निगरानी और प्रदूषित नदी खंडों के पुनर्जीवन पर भी काम किया जा रहा है।