CRPF: सीआरपीएफ में मंत्री के आदेशों को कौन कर रहा प्रमाणित? गृह मंत्रालय से मिले आरटीआई के जवाबों ने खोली पोल
CRPF: गृह मंत्रालय से मिले आरटीआई में सीआरपीएफ हेडक्वार्टर में डीआईजी 'सीआर/विजिलेंस' की कार्यप्रणाली को लेकर कई अहम खुलासे हुए हैं। विस्तार से पढ़ें अहम रिपोर्ट ...
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विस्तार
'सीआरपीएफ' हेडक्वार्टर में डीआईजी 'सीआर/विजिलेंस' की कार्यप्रणाली को लेकर जोरहाट सेक्टर के कमांडेंट एसके द्विवेदी ने जब सवाल उठाए तो मामला ही बदल गया। देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल में मंत्री के आदेशों को कौन प्रमाणित कर रहा है, इस बाबत गृह मंत्रालय से मिले आरटीआई के जवाबों ने पोल खोल दी है। द्विवेदी ने महानिदेशालय के डीआईजी (सीआर/विजिलेंस) से पूछा कि आप किस कानूनी प्राधिकार से मंत्री के आदेशों को प्रमाणित कर रहे हैं। डीजी सीआरपीएफ को किस नियम के तहत यह पावर मिली है कि वे अनुशासनात्मक मामले में सहायक फैसले ले सकते हैं। इस संबंध में अगर कोई नोटिफिकेशन/ऑर्डर है तो उसकी कॉपी दिखाई जाए। बल की तरफ से कमांडेंट को कॉपी नहीं दी गई। इस संबंध में बल के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि उक्त मामले में जो भी कार्रवाई हो रही है, वह नियमानुसार हो रही है।
खास बात है कि सीआरपीएफ ने कुछ पुराने नोटिफिकेशन और एमएचए पत्रों का संदर्भ दिया, लेकिन कमांडेंट द्विवेदी को प्रतियां प्रदान नहीं की गई। सीआरपीएफ की तरफ से बताया गया कि एमएचए के नियमों के तहत डीआईजी (सीआर/विजिलेंस) को ऐसे निर्णयों को प्रमाणित करने का अधिकार है। इस बाबत केंद्र सरकार के 3/11/1958, आर/डब्लू पत्र संख्या ए 19011/6/99-पर्स 3, 14/10/1999 और 16/2/2002 के एमएचए नोटिफिकेशन का हवाला दिया गया। खास बात है कि एमएचए ने आरटीआई के जवाब में बताया कि इस तरह से सीआरपीएफ को कोई अथॉरिटी डेलिगेट नहीं की गई है। डीजी सीआरपीएफ को किस नियम के तहत यह पावर मिली है या वे किस अधिकार से ऐसे सहायक निर्देश जारी करते हैं।
इसके समर्थन में एमएचए के पत्र संख्या 1-45022/89/98-पर्स 1, 3/12/1999 का हवाला देकर बताया गया कि एमएचए ने डीजी सीआरपीएफ को आईओ/पीओ नियुक्त करने के लिए अधिकृत किया है। डीआईजी विजिलेंस/सीआर द्वारा कमांडेंट को अवगत कराया गया कि एमएचए ने आपके संदर्भ में भी सजा या भारी पेनल्टी के लिए डीजी को सहायक निर्देश देने के लिए अधिकृत किया है। डीजी, विभागीय जांच के मामले में जीआईडी 3 (1)(बी) अंडर रूल 12 ऑफ सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के तहत सहायक कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है। इस नियम को लेकर भी एमएचए ने आरटीआई के जवाब में कहा, इस तरह की कोई भी पावर, सीआरपीएफ डीजी को प्राधिकृत नहीं की है।
डीआईजी विजिलेंस/सीआर की ओर से कहा गया कि आपके पास कोई तथ्य नहीं है। मनमर्जी से कह रहे हैं। सक्षम अधिकारी ने इच्छा जाहिर की है कि आप जांच अधिकारी के सामने पेश हों। इसके बाद दंड देने की प्रक्रिया शुरु की जा सके। इस पर कमांडेंट द्विवेदी ने कहा, आप जिन ऑर्डर का हवाला दे रहे हैं, मैने आपसे उनकी कॉपी मांगी थी। आपने नहीं दी। इसके बाद आपने कहा, डीजी को एमएचए ने अथॉरिटी दी है। अगर डीजी को अथॉरिटी दी है तो इसकी कॉपी दे दो। वह भी नहीं दी गई। इस पर कमांडेंट द्विवेदी को संदेह हुआ कि सीआरपीएफ में मंत्री की वास्तविक मंजूरी के बिना ही निचले अधिकारियों के माध्यम से ये सब चल रहा है।
गृह मंत्रालय में लगाई गई आरटीआई
उक्त अधिकारी ने गृह मंत्रालय में आरटीआई लगाकर पूछा कि क्या मंत्रालय ने किसी अधीनस्थ कार्यालय को सहायक अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार दिया है। अगर दिया है तो वह किस नियम से जारी किया गया है। गृह मंत्रालय की सतर्कता सेल से जवाब मिला कि हमारी तरफ से ऐसी कोई सामान्य अधिसूचना/आदेश जारी नहीं हुआ है। जब उक्त अधिकारी ने सही जानकारी देने का आग्रह किया तो गृह मंत्रालय ने अपनी अलग-अलग डिवीजनों/डेस्कों से जवाब एकत्रित किए। पुलिस-2 डिवीजन के पर्स-I, पर्स-II, पर्स-III और पर्स-IV डेस्क ने मूल रूप से बताया कि हमारे पास ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस बाबत कोई अधिसूचना/आदेश रिकॉर्ड में नहीं है।
क्या सीआरपीएफ विजिलेंस का दावा कमजोर है
कमांडेंट ने अपने दावों के समर्थन में अंतिम तर्क ये दिया कि सीआरपीएफ विजिलेंस का दावा तथ्यात्मक आधार पर कमजोर है। सहायक अनुशासनात्मक निर्णय लेने के लिए डीजी सीआरपीएफ को कानूनी तौर पर अधिकृत नहीं किया गया है। सीआरपीएफ के डीआईजी विजिलेंस/सीआर, मंत्री के आदेश प्रमाणित नहीं कर सकते। इस मामले में 'गोपनीय' और 'राष्ट्रपति' के चिन्ह का दुरुपयोग हो रहा है। अगर कार्रवाई का कानूनी आधार ही दोषपूर्ण है, तो पूरी अनुशासनात्मक प्रक्रिया कानूनी रूप से ध्वस्त हो सकती है। उक्त अधिकारी के मुताबिक, सीआरपीएफ अनुशासनात्मक कार्रवाई में कुछ शक्तियां और प्रक्रियाएं बिना उचित वैधानिक प्राधिकार के उपयोग कर रही है।आरटीआई में मिले जवाबों से भी उन शक्तियों का स्पष्ट कानूनी प्रमाण नहीं मिल सका है। अनेक ऑर्डर ऐसे होते हैं, जिन्हें मंत्री ने देखा ही नहीं। डीजी और डीआईजी विजिलेंस अपनी सुविधा के अनुसार उन्हें आगे बढ़ा देते हैं।
जोरहाट सेक्टर के कमांडेंट ने उठाया मुद्दा
'सीआरपीएफ' हेडक्वार्टर में डीआईजी 'सीआर/विजिलेंस' की कार्यप्रणाली को लेकर जोरहाट सेक्टर के कमांडेंट एसके द्विवेदी ने पिछले दिनों डीआईजी आरके ठाकुर (सीआर/विजिलेंस) को एक पत्र लिखा था। इसकी एक प्रति बल के सभी जोन 'एनईजेड, सेंट्रल और साउथ जोन' के अलावा जोरहाट सेक्टर व डीआईजी लॉ को भेजी गई। पत्र में उन्होंने पूछा कि डीआईजी 'सीआर/विजिलेंस' निदेशालय को ग्रुप 'ए' अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही के संबंध में मंत्री के आदेशों को प्रमाणित करने का न तो अधिकार है और न ही वे इसके लिए अधिकृत हैं। ऐसे में कमांडेंट ने उक्त डीआईजी से अनुरोध किया है कि इस बाबत वह सटीक कानूनी/वैधानिक प्राधिकरण बताया जाए, जिसके तहत ऐसा प्रमाणीकरण किया जा रहा है।
औपचारिक आपत्ति को रिकॉर्ड में लिया जाए
कमांडेंट ने आग्रह किया कि सीआरपीएफ महानिदेशालय के डीआईजी 'सीआर एवं विजिलेंस' द्वारा मंत्रियों के आदेशों (राष्ट्रपति की ओर से जारी) के प्रमाणीकरण पर मेरी विस्तृत औपचारिक आपत्ति को रिकॉर्ड में लिया जाए। सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के नियम 8 और 12 के तहत, राष्ट्रपति, गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सीआरपीएफ में कार्यरत अधिकारियों सहित सभी केंद्रीय सरकारी समूह 'ए' अधिकारियों के लिए क्रमशः 'नियुक्ति प्राधिकारी' और 'अनुशासनात्मक प्राधिकारी' हैं। हालांकि राष्ट्रपति प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं करते हैं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 77 (2), भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 और भारत सरकार (कार्य संचालन) नियम, 1961 के अनुसार मंत्रियों के माध्यम से कार्य करते हैं। इसमें एक मौलिक प्रश्न उठता है कि राष्ट्रपति की ओर से मंत्री द्वारा जारी आदेशों को प्रमाणित करने और संप्रेषित करने के लिए कौन सक्षम है।
अनुमोदित करना वैधानिक रूप से अनिवार्य
नियमानुसार, केंद्रीय सरकार के समूह 'ए' अधिकारियों से संबंधित अनुशासनात्मक कार्यवाही को संबंधित मंत्री द्वारा एक नोट पर अनुमोदित करना वैधानिक रूप से अनिवार्य है। यह भारत सरकार के निर्णय (जीआईडी) संख्या 3 (1) (बी) के तहत सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 (जीआई एमएचए ओएम संख्या एफ.39/1/69-एस्ट्स. (ए), दिनांक 16 अप्रैल, 1969 द्वारा अधिसूचित) में उल्लिखित है। मंत्रिमंडल सचिवालय कार्यालय प्रक्रिया नियमावली (सीएसएमओपी), 2022, 16वें संस्करण के पृष्ठ 103 पर पैरा 9.3 (i) के अनुसार, राष्ट्रपति के नाम से जारी एवं निष्पादित सभी आदेश और दस्तावेज उनके नाम से लिखे जाने चाहिएं। उन पर अवर सचिव, उससे ऊपर के नियमित या पदेन सचिवालय स्तर वाले अधिकारी द्वारा या प्रमाणीकरण (आदेश और अन्य दस्तावेज) नियम, 2002 के तहत विशेष रूप से अधिकृत किसी अन्य अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिएं।
अधीनस्थ कार्यालय की श्रेणी में सीआरपीएफ
प्रमाणीकरण (आदेश और अन्य दस्तावेज) नियम, 2002 के अनुच्छेद 2 के अनुसार, राष्ट्रपति के नाम से जारी किए गए सभी आदेशों को सचिव आदि द्वारा प्रमाणित किया जाना आवश्यक है। सीएसएमओपी के अनुच्छेद 2.4, पृष्ठ 6 के अनुसार, सरकारी नीतियों और योजनाओं के निर्माण के लिए कोई मंत्रालय/विभाग जिम्मेदार होता है। वर्तमान संदर्भ में, सीआरपीएफ उस अर्थ में 'विभाग' नहीं है। सीएसएमओपी के अनुच्छेद 2.6, पृष्ठ 8 के अनुसार, किसी विभाग के संलग्न और अधीनस्थ कार्यालय हो सकते हैं। सीआरपीएफ मंत्रालय के किसी विभाग के अधीन एक अधीनस्थ कार्यालय की श्रेणी में आता है।
क्या कहता है सीवीसी का नियम?
सीवीसी, 2021 द्वारा जारी सतर्कता नियमावली के 7वें अध्याय में अनुशासनात्मक कार्यवाही और निलंबन के अनुच्छेद 7.10.2 के अनुसार, जहां सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी राष्ट्रपति हैं, मंत्री की स्वीकृति के बाद, आरोप पत्र पर राष्ट्रपति के नाम से संविधान के अनुच्छेद 77 (2) के तहत राष्ट्रपति की ओर से आदेशों को प्रमाणित करने के लिए सक्षम अधिकारी द्वारा हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। ये प्रावधान संवैधानिक और वैधानिक प्रकृति के हैं। किसी भी स्थानीय व्यवस्था या प्रशासनिक सुविधा द्वारा इन्हें शिथिल नहीं किया जा सकता है। भारत सरकार (एओबी) नियम, 1961 और (टीओबी) नियम, 1961 के दायरे में ही कार्य करते हैं। गृह मंत्रालय से आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, सीआरपीएफ अधिकारियों/अधिकारियों को सीसीएस (सीसीए) नियम, 1965 के तहत ग्रुप 'ए' अधिकारियों से संबंधित किसी भी आदेश, जिसमें आरोप पत्र/आईओ एवं पीओ की नियुक्ति और दंड आदेश शामिल हैं, पर हस्ताक्षर करने या उन्हें प्रमाणित करने का कोई अधिकार कभी नहीं दिया गया है। प्रमाणीकरण (आदेश और अन्य दस्तावेज) नियम, 2002 के अनुच्छेद 2 के अनुसार, राष्ट्रपति के नाम से जारी किए गए सभी आदेशों को सचिव आदि द्वारा प्रमाणित किया जाना आवश्यक है।
इस तरह के हस्ताक्षर डीआईजी नहीं कर सकता
जिन लोगों के लिए अनुशासनात्मक अधिकारी, राष्ट्रपति हैं। उनकी चार्जशीट पर मंत्री की मंजूरी के बाद कोई न कोई सचिव ही साइन कर सकता। ऐसे साइन डीआईजी नहीं कर सकता। ये एक कानून है। इसमें मनमर्जी नहीं कर सकते। एमएचए से आरटीआई के जरिए मिली सूचना बताती है कि किसी भी सीआरपीएफ अफसर के खिलाफ चार्जशीट साइन करने में किसी को अधिकृत नहीं किया गया है। डीआईजी सीआर विजिलेंस के पास मंत्री के आर्डर को प्रमाणिक करने का अधिकार नहीं है। इस मामले में किस नियम से डीआईजी, मेमोरेंडम दे रहे हैं। कमांडेंट ने पूछा है कि वे यह सब किस अधिकार से दे रहे हैं। डीआईजी सीआर/विजिलेंस ही जांच अधिकारी की नियुक्ति का भी आदेश देता है। किसी मामले में जो सजा मिलती है, उस पर साइन कर बताने का अधिकार भी डीआईजी के पास नहीं है। दूसरी तरफ ऐसे सभी आदेश, डीआईजी सीआर/विजिलेंस की कलम से ही जारी होते हैं।