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कौन हैं वीडी सतीशन?: 100 से कम सीट आने पर किया था राजनीति छोड़ने का एलान, दावा सच हुआ, अब बनेंगे केरल के नए CM
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 14 May 2026 12:19 PM IST
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सार
कांग्रेस ने आखिरकार चुनाव नतीजों के 10 दिन बाद केरल में विधायक दल के नए नेता के तौर पर वीडी सतीशन के नाम का एलान किया है। वीडी सतीशन कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे हैं, जो कि 2001 में पहली बार परवूर से चुनाव जीतने के बाद इस सीट से कभी नहीं हारे। इस दौरान वे नेता प्रतिपक्ष से होते हुए अब मुख्यमंत्री बनने के करीब पहुंच गए हैं।
केरल के अगले मुख्यमंत्री होंगे वीडी सतीशन।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
केरल के नए मुख्यमंत्री के नाम का एलान हो गया है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने गुरुवार को बताया कि वीडी सतीशन को विधायक दल का नेता चुना गया है। उनके नाम का एलान केरल के चुनाव नतीजों के 10 दिन बाद किया गया है। दरअसल, केरल में इस दौरान मुख्यमंत्री पद को लेकर टकराव जारी था। सीएम पद की रेस में वीडी सतीशन के अलावा केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथाला का नाम था। हालांकि, जमीनी स्तर के नेता रहे वीडी सतीशन अंततः इस रेस में सबसे आगे निकल गए।
वीडी सतीशन कौन हैं? उनका शुरुआती इतिहास क्या है? उनकी सियासत में एंट्री से लेकर केरल कांग्रेस के प्रमुख नेता बनने तक का सफर क्या रहा है? कैसे सतीशन केरल में कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की रेस में लगातार खुद को आगे रखने में सफल हुए हैं? आइये जानते हैं...
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वीडी सतीशन कौन हैं? उनका शुरुआती इतिहास क्या है? उनकी सियासत में एंट्री से लेकर केरल कांग्रेस के प्रमुख नेता बनने तक का सफर क्या रहा है? कैसे सतीशन केरल में कांग्रेस की मुख्यमंत्री पद की रेस में लगातार खुद को आगे रखने में सफल हुए हैं? आइये जानते हैं...
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वीडी सतीशन होंगे केरल के नए सीएम
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
क्या है वीडी सतीशन की पारिवारिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि?
वीडी. सतीशन जिनका पूरा नाम वदस्सेरी दामोदरन सतीशन का जन्म 31 मई 1964 को केरल के कोच्चि स्थित नेट्टूर में एक नायर परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम के. दामोदरा मेनन और मां का नाम वी. विलासिनी अम्मा है। दिल्ली के सत्ता हलकों की बजाय उनकी राजनीतिक जड़ें शुरू से ही जमीनी स्तर की राजनीति से जुड़ी रही हैं।सतीशन की शैक्षणिक पृष्ठभूमि काफी मजबूत रही है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पनांगड हाईस्कूल से हुई, जो कि क्षेत्र का लोकप्रिय स्कूल है। इसके बाद उन्होंने सैक्रेड हार्ट कॉलेज, थेवारा से स्नातक की पढ़ाई की। सतीशन ने राजगिरी कॉलेज ऑफ सोशल साइंसेज, कोच्चि से मास्टर ऑफ सोशल वर्क की डिग्री हासिल की।
राजनीति में आने से पहले उन्होंने कानून की गहरी पढ़ाई की। उन्होंने केरल लॉ एकेडमी लॉ कॉलेज से एलएलबी की और गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से मास्टर ऑफ लॉ (एलएलएम) की डिग्री भी हासिल की। वीडी सतीशन को जानने वाले उन्हें एक किताबी कीड़ा (बुकवर्म) नेता मानतेहैं, जिनकी अध्ययन में बहुत गहरी रुचि है।
ये भी पढ़ें: Kerala CM: वीडी सतीशन होंगे केरल के नए सीएम, 10 दिन कांग्रेस ने की घोषणा; बोले- एक नए युग की शुरुआत होगी
क्या रही राजनीति में आने की कहानी?
1. छात्र जीवन में ही रखा राजनीति में कदम
वीडी सतीशन का राजनीतिक सफर उनकी शिक्षा के दौरान ही शुरू हो गया था। दरअसल, उन्होंने जमीनी स्तर की राजनीति में कदम केरल स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) के जरिए रखा था। अपने छात्र जीवन में ही वे एक मुखर नेता बन गए और 1986-1987 के दौरान महात्मा गांधी विश्वविद्यालय संघ के अध्यक्ष चुने गए। इसके साथ ही, उन्होंने कांग्रेस की छात्र शाखा नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) के राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी भी निभाई।
2. 10 साल से ज्यादा हाईकोर्ट में की वकालत
हालांकि, राजनीति में शुरुआत से ही उतरने के बाद भी उन्होंने लंबे समय तक वकालत को अपना पेशा बनाया। वे एक प्रशिक्षित वकील और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय रहे। उन्होंने करीब 10 वर्षों तक केरल उच्च न्यायालय में वकालत की। इसी दौरान वे यूथ कांग्रेस में सक्रिय रूप से काम करते रहे और धीरे-धीरे एक तेजतर्रार वक्ता और आक्रामक राजनीतिक आयोजक के रूप में अपनी मजबूत पहचान बना ली।
3. वकालत के दौरान ही हुई चुनावी राजनीति में एंट्री
चुनावी राजनीति में उनका पहला कदम 1996 में पड़ा, जब उन्होंने परावूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। यह क्षेत्र तब कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ था और उन्हें भाकपा के उम्मीदवार पी. राजू से हार का सामना करना पड़ा।
इस हार के बावजूद सतीशन ने हार नहीं मानी और क्षेत्र में सक्रिय रहे। साल 2001 में उन्हें अपनी पहली बड़ी राजनीतिक सफलता मिली, जब वे परवूर निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार केरल विधानसभा के लिए विधायक चुने गए। दिलचस्प बात यह है कि जिस समय वे 2001 में पहली बार विधायक चुने गए, उस समय भी वे केरल उच्च न्यायालय में वकालत कर रहे थे।
चुनावी राजनीति में उनका पहला कदम 1996 में पड़ा, जब उन्होंने परावूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। यह क्षेत्र तब कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ था और उन्हें भाकपा के उम्मीदवार पी. राजू से हार का सामना करना पड़ा।
इस हार के बावजूद सतीशन ने हार नहीं मानी और क्षेत्र में सक्रिय रहे। साल 2001 में उन्हें अपनी पहली बड़ी राजनीतिक सफलता मिली, जब वे परवूर निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार केरल विधानसभा के लिए विधायक चुने गए। दिलचस्प बात यह है कि जिस समय वे 2001 में पहली बार विधायक चुने गए, उस समय भी वे केरल उच्च न्यायालय में वकालत कर रहे थे।
राहुल गांधी और अन्य पार्टी नेताओं के साथ वीडी सतीशन
- फोटो : ANI
कैसे केरल में कांग्रेस की राजनीति का चेहरा बन गए वीडी सतीशन?
पहली बार विधायक चुने जाने के बाद वीडी. सतीशन ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी बेदाग जमीनी पकड़ तथा आक्रामक राजनीति के दम पर खुद को केरल के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाया।परवूर को बनाया कांग्रेस का अजेय किला
2001 में पहली बार परवूर निर्वाचन क्षेत्र से जीतने के बाद, यह क्षेत्र उनकी राजनीति की प्रयोगशाला और लॉन्चपैड बन गया। उन्होंने 2001 के बाद से यहां कभी कोई चुनाव नहीं हारा और लगातार छह बार (2001, 2006, 2011, 2016, 2021 और 2026) विधायक चुने गए। उन्होंने 2006 में केएम. दिनाकरन, 2011 में भाकपा के पन्नियन रवींद्रन और 2016 में शारदा मोहन जैसे कद्दावर वामपंथी नेताओं को बड़े अंतर से हराया। अपने क्षेत्र में उन्होंने लाखों निवासियों के लिए बड़े पैमाने पर पेयजल परियोजना जैसी जमीनी पहल की, जिसने राजनीति से परे उनकी विश्वसनीयता को मजबूत किया।पार्टी के अंदर ही मिली बागी आवाज की पहचान
2011 से 2016 के बीच जब राज्य में यूडीएफ (यूडीएफ) की सरकार थी, तब सतीशन पार्टी के अंदर ही एक बागी आवाज के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने हरित राजनीति का समर्थन किया और अपनी ही पार्टी के नेताओं के प्रभावशाली सामुदायिक नेताओं के आगे झुकने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने हमेशा चुनाव में टिकट बंटवारे के लिए योग्यता को पैमाना बनाने की वकालत की। इसके अलावा, 12वीं विधानसभा के दौरान उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्य सचेतक (मुख्य व्हिप) के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।
केसी वेणुगोपाल, वीडी सतीशन और रमेश चेन्नीथला
- फोटो : एएनआई
लेफ्ट शासन में बने विपक्ष की सबसे मुखर आवाज
एक विधायक के रूप में सतीशन ने सदन में अनगिनत बहसों का नेतृत्व किया और पूर्व मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के शासन के दौरान विकास के दावों पर कड़े सवाल उठाकर वामपंथी सरकार के खिलाफ खुद को विपक्ष की मुख्य आवाज के रूप में स्थापित किया। उनकी इस आक्रामकता की वजह से उन्हें अक्सर सोशल मीडिया पर वामपंथी समर्थकों के तीखे हमलों का सामना भी करना पड़ा।2021 में आया राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट
उनके करियर में सबसे बड़ा उछाल 2021 में आया। दरअसल, केरल की राजनीति कुछ इस तरह की रही है कि यहां हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन एक चलन की तरह रहा। हालांकि, 2021 के चुनाव में वामपंथी मोर्चे ने लगातार दूसरी बार यूडीएफ को चुनाव में हरा दिया। इस हार के बाद कांग्रेस आलाकमान ने वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला की जगह सतीशन को 15वीं विधानसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त कर दिया।चूंकि उनके पास किसी भी मंत्री पद का कोई पूर्व अनुभव नहीं था, इसलिए कई लोगों ने इस फैसले को जोखिम भरा माना था। लेकिन उन्होंने अगले पांच वर्षों में खुद को विजयन सरकार के प्रमुख विकल्प और सबसे तेजतर्रार आलोचक के रूप में बदल दिया।
अब पार्टी को दिलाई ऐतिहासिक जीत, खुद-ब-खुद बने सीएम पद के दावेदार
2026 के विधानसभा चुनावों में सतीशन ने पूरे अभियान की कमान संभाली और सार्वजनिक कसम खाई कि अगर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन को 140 में से 100 सीटें नहीं मिलतीं, तो वे राजनीति छोड़कर संन्यास ले लेंगे। उनका यह जुआ सफल रहा और यूडीएफ ने 102 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि सतीशन ने खुद परवूर से 20,600 वोटों के भारी अंतर से अपनी छठी जीत हासिल की।एक समय पार्टी के दूसरे दर्जे के नेता माने जाने वाले सतीशन, आज यूडीएफ की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और कार्यकर्ताओं के भारी समर्थन के साथ केरल के मुख्यमंत्री नामित हो गए हैं।
कांग्रेस ने क्यों 10 दिन तक अटकाया नए मुख्यमंत्री के नाम का एलान?
केरल विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करने के बाद भी कांग्रेस को वीडी सतीशन के नाम का आधिकारिक एलान करने में 10 दिन का समय लग गया। इसके पीछे मुख्य रूप से पार्टी की आंतरिक खींचतान और कई रणनीतिक कारण थे।1. त्रिकोणीय शक्ति-संघर्ष
मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस के अंदर तीन कद्दावर नेताओं वीडी सतीशन, केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला था। चेन्निथला अपनी वरिष्ठता के आधार पर शीर्ष पद की मांग कर रहे थे, जबकि सतीशन के समर्थकों का तर्क था कि उन्होंने पिछले पांच वर्षों तक विपक्ष के नेता के रूप में संघर्ष किया और गठबंधन को जीत दिलाई।
2. दिल्ली बनाम राज्य की दुविधा
राजनीतिक जानकारों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांग्रेस आलाकमान एक बड़ी दुविधा में फंसा हुआ था। एक तरफ वीडी सतीशन थे, जिन्होंने चुनाव अभियान का नेतृत्व किया था, तो दूसरी तरफ केसी वेणुगोपाल थे जो राहुल गांधी के सबसे करीबी राजनीतिक सहयोगियों में से एक माने जाते हैं। बताया गया कि नवनिर्वाचित विधायकों के एक बड़े वर्ग का समर्थन वेणुगोपाल को मिला था, जिसके कारण दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) और राज्य के नेता (सतीशन) के बीच चयन करना मुश्किल हो गया था।
3. प्रशासनिक अनुभव की कमी पर सवाल
सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने में एक और बाधा उनका अनुभव था। पार्टी के भीतर आलोचकों ने तर्क दिया कि सतीशन एक बहुत आक्रामक विपक्षी नेता और प्रचारक जरूर हैं, लेकिन उन्होंने अतीत में कभी कोई मंत्री पद नहीं संभाला है। इसलिए जटिल नौकरशाही और गठबंधन की राजनीति को संभालने के लिए उनके प्रशासनिक अनुभव पर सवाल उठाए गए थे।
4. आम सहमति बनाने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया
सीएम के चुनाव में इस देरी का बचाव करते हुए चांडी ओमन और तारिक अनवर जैसे नेताओं ने कहा कि कांग्रेस कोई निरंकुश पार्टी नहीं है। किसी भी नेता या गुट को नाराज किए बिना एक आम सहमति बनाने के लिए विधायकों, पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और सहयोगी दलों से विचार-विमर्श करने में यह समय लगा। पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि मध्य प्रदेश या राजस्थान की तरह केरल में जीत के बाद कोई बगावत न हो।
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सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने में एक और बाधा उनका अनुभव था। पार्टी के भीतर आलोचकों ने तर्क दिया कि सतीशन एक बहुत आक्रामक विपक्षी नेता और प्रचारक जरूर हैं, लेकिन उन्होंने अतीत में कभी कोई मंत्री पद नहीं संभाला है। इसलिए जटिल नौकरशाही और गठबंधन की राजनीति को संभालने के लिए उनके प्रशासनिक अनुभव पर सवाल उठाए गए थे।
4. आम सहमति बनाने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया
सीएम के चुनाव में इस देरी का बचाव करते हुए चांडी ओमन और तारिक अनवर जैसे नेताओं ने कहा कि कांग्रेस कोई निरंकुश पार्टी नहीं है। किसी भी नेता या गुट को नाराज किए बिना एक आम सहमति बनाने के लिए विधायकों, पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और सहयोगी दलों से विचार-विमर्श करने में यह समय लगा। पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि मध्य प्रदेश या राजस्थान की तरह केरल में जीत के बाद कोई बगावत न हो।
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