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कौन थे सोनम वांगचुक के पिता?: अनशन तुड़वाने खुद लेह पहुंची थीं इंदिरा; 42 साल बाद सोनिया ने क्यों याद किया?
Fri, 17 Jul 2026 04:06 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 17 Jul 2026 04:06 PM IST
सार
42 साल पुरानी एक घटना ने फिर गांधी परिवार और वांगचुक परिवार के रिश्ते को चर्चा में ला दिया है। आखिर कौन थे सोनम वांगचुक के पिता और क्या है इस पूरे घटनाक्रम की कहानी? पढ़िए रिपोर्ट-
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सोनम वांग्याल, सोनम वांगचुक
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई/एक्स
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विस्तार
कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन का समर्थन करने का फैसला किया है। इस फैसले ने लद्दाख के राजनीतिक इतिहास के एक कम चर्चित अध्याय को फिर से चर्चा में ला दिया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को याद दिलाया कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वर्ष 1984 में लेह गई थीं। उनका मकसद सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग को लेकर चल रही उनकीभूख हड़ताल को समाप्त करने के लिए मनाना था।
यह बात संसद के मानसून सत्र से पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सामने आई, जब कुछ नेता वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करने को लेकर असमंजस की स्थिति में थे।
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सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने आंदोलन का समर्थन करने की बात कही। इसके कुछ समय बाद उनके निर्देश पर कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने सोनम वांगचुक से मुलाकात की, उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया और कांग्रेस की ओर से पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया।
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पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को याद दिलाया कि उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वर्ष 1984 में लेह गई थीं। उनका मकसद सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग को लेकर चल रही उनकीभूख हड़ताल को समाप्त करने के लिए मनाना था।
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यह बात संसद के मानसून सत्र से पहले कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सामने आई, जब कुछ नेता वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करने को लेकर असमंजस की स्थिति में थे।
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सूत्रों ने बताया कि सोनिया गांधी ने आंदोलन का समर्थन करने की बात कही। इसके कुछ समय बाद उनके निर्देश पर कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने सोनम वांगचुक से मुलाकात की, उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया और कांग्रेस की ओर से पूरा समर्थन देने का भरोसा दिलाया।
सोनम वांगचुक
- फोटो : एएनआई (फाइल)
क्या पिता और बेटे के आंदोलन में समानता है?
इस घटना ने पिता और बेटे की चार दशक लंबी एक अनोखी कहानी को भी फिर से सामने ला दिया है। 42 साल के अंतराल पर सोनम वांग्याल और उनके बेटे सोनम वांगचुक दोनों ने गांधीवादी तरीके यानी भूख हड़ताल को अपनाया। लेकिन दोनों की मांगें अलग-अलग थीं।
पूर्व कांग्रेस विधायक रहे सोनम वांग्याल ने लद्दाख की सांविधानिक पहचान के लिए संघर्ष किया था। वहीं, उनके बेटे सोनम वांगचुक ने लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर अभियान चलाया। अब वह भारत की परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग वाले आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं।
इस घटना ने पिता और बेटे की चार दशक लंबी एक अनोखी कहानी को भी फिर से सामने ला दिया है। 42 साल के अंतराल पर सोनम वांग्याल और उनके बेटे सोनम वांगचुक दोनों ने गांधीवादी तरीके यानी भूख हड़ताल को अपनाया। लेकिन दोनों की मांगें अलग-अलग थीं।
पूर्व कांग्रेस विधायक रहे सोनम वांग्याल ने लद्दाख की सांविधानिक पहचान के लिए संघर्ष किया था। वहीं, उनके बेटे सोनम वांगचुक ने लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर अभियान चलाया। अब वह भारत की परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग वाले आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं।
जब इंदिरा गांधी पहुंची थीं लेह
साल 1984 में सोनम वांग्याल ने लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। लद्दाख स्टडीज में प्रकाशित उनके संस्मरण और अन्य ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इंदिरा गांधी लेह पहुंचीं और उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस मांग पर विचार करेगी। उसी वर्ष इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। बाद में वर्ष 1989 में राजीव गांधी सरकार ने लद्दाख के प्रमुख समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया।
साल 1984 में सोनम वांग्याल ने लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। लद्दाख स्टडीज में प्रकाशित उनके संस्मरण और अन्य ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इंदिरा गांधी लेह पहुंचीं और उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार इस मांग पर विचार करेगी। उसी वर्ष इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। बाद में वर्ष 1989 में राजीव गांधी सरकार ने लद्दाख के प्रमुख समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया।
सोनम वांग्याल, सोनम वांगचुक
- फोटो : एएनआई/एक्स
पिता की राह पर बेटे का आंदोलन?
अपने पिता के विपरीत सोनम वांगचुक ने चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी। वह एक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता हैं। उन्होंने लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और आइस स्तूप जैसी नई पहल के कारण दुनिया भर में पहचान बनाई। लेकिन उन्होंने अपने पिता से एक बात जरूर अपनाई कि भूख हड़ताल लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
वर्ष 2024 में सोनम वांगचुक ने लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा और अन्य सांविधानिक सुरक्षा देने की मांग को लेकर 21 दिन का जलवायु अनशन किया था। इसके बाद उन्होंने 'दिल्ली चलो' मार्च का नेतृत्व किया, लेकिन उन्हें सिंघू सीमा पर हिरासत में ले लिया गया।
अब वह प्रतियोगी परीक्षाओं, खासकर नीट-यूजी में कथित गड़बड़ियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे छात्रों के आंदोलन में शामिल होने के बाद अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। इस छात्र आंदोलन का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) कर रही है।
पिता और बेटे के संघर्ष में कई समानताएं दिखाई देती हैं। पिता ने लद्दाख को सांविधानिक पहचान दिलाने के लिए भूख हड़ताल की थी। बेटे ने पहले लद्दाख के भविष्य और अब पूरे देश की परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग के लिए उसी रास्ते को चुना। पिता कांग्रेस के भीतर रहकर काम करते थे। जबकि बेटा किसी राजनीतिक दल से जुड़े बिना आंदोलन कर रहा है।
गांधी परिवार के साथ भी इस परिवार का संबंध तीन पीढ़ियों तक रहा है। चार दशक से अधिक समय बाद सोनिया गांधी की ओर से सोनम वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करने के फैसले ने कांग्रेस और वांगचुक परिवार को एक बार फिर आमने-सामने ला दिया है, लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं।
अपने पिता के विपरीत सोनम वांगचुक ने चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी। वह एक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता हैं। उन्होंने लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और आइस स्तूप जैसी नई पहल के कारण दुनिया भर में पहचान बनाई। लेकिन उन्होंने अपने पिता से एक बात जरूर अपनाई कि भूख हड़ताल लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
वर्ष 2024 में सोनम वांगचुक ने लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा और अन्य सांविधानिक सुरक्षा देने की मांग को लेकर 21 दिन का जलवायु अनशन किया था। इसके बाद उन्होंने 'दिल्ली चलो' मार्च का नेतृत्व किया, लेकिन उन्हें सिंघू सीमा पर हिरासत में ले लिया गया।
अब वह प्रतियोगी परीक्षाओं, खासकर नीट-यूजी में कथित गड़बड़ियों को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे छात्रों के आंदोलन में शामिल होने के बाद अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। इस छात्र आंदोलन का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) कर रही है।
पिता और बेटे के संघर्ष में कई समानताएं दिखाई देती हैं। पिता ने लद्दाख को सांविधानिक पहचान दिलाने के लिए भूख हड़ताल की थी। बेटे ने पहले लद्दाख के भविष्य और अब पूरे देश की परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग के लिए उसी रास्ते को चुना। पिता कांग्रेस के भीतर रहकर काम करते थे। जबकि बेटा किसी राजनीतिक दल से जुड़े बिना आंदोलन कर रहा है।
गांधी परिवार के साथ भी इस परिवार का संबंध तीन पीढ़ियों तक रहा है। चार दशक से अधिक समय बाद सोनिया गांधी की ओर से सोनम वांगचुक के आंदोलन का समर्थन करने के फैसले ने कांग्रेस और वांगचुक परिवार को एक बार फिर आमने-सामने ला दिया है, लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं।
सोनम वांगचुक के पिता कौन थे?
ये भी पढ़ें: '...तो मैं भूत बनकर वापस आऊंगा', 20वें दिन भी जारी सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल
- सोनम वांगचुक का जन्म लद्दाख के छोटे और दूरस्थ गांव उलायटोकपो में हुआ था। वह लद्दाख के प्रमुख राजनेता सोनम वांग्याल की कई संतानों में से एक हैं।
- सोनम वांग्याल पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) से जुड़े थे। बाद में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए।
- वर्ष 1975 से उन्होंने जम्मू-कश्मीर सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी काम किया। उनका निधन वर्ष 1998 में हुआ।
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लेख में क्या लिखा था?
सोनम वांग्याल ने 'स्वतंत्रता के बाद लद्दाख में राजनीतिक विकास' नाम से लिखे एक लेख में इस घटना का विस्तार से जिक्र किया था। उन्होंने लिखा कि लद्दाख लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने का हकदार था। उत्तर-पूर्व के राज्यों और हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अनुसूचित जनजाति घोषित किया जा चुका था। लेकिन लद्दाख को नजरअंदाज किया गया था।
सोनम वांग्याल ने 'स्वतंत्रता के बाद लद्दाख में राजनीतिक विकास' नाम से लिखे एक लेख में इस घटना का विस्तार से जिक्र किया था। उन्होंने लिखा कि लद्दाख लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने का हकदार था। उत्तर-पूर्व के राज्यों और हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अनुसूचित जनजाति घोषित किया जा चुका था। लेकिन लद्दाख को नजरअंदाज किया गया था।
कितने दिन की भूख हड़ताल की थी?
उन्होंने लिखा कि वर्ष 1982 में इस मांग को लेकर एक अभियान शुरू किया गया, जिसमें उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इस आंदोलन में लद्दाख के मुसलमान और बौद्ध दोनों समुदाय शामिल थे। सरकार की उदासीनता के खिलाफ लोगों की नाराजगी जताने के लिए उन्होंने 15 जनवरी से 30 जनवरी तक 16 दिनों की भूख हड़ताल की। इसके बाद वर्ष 1984 में उन्होंने फिर से पांच दिन की भूख हड़ताल शुरू की।
उन्होंने लिखा कि उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी लेह आईं। उन्होंने भरोसा दिया कि लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाएगा। उन्होंने उनसे भूख हड़ताल समाप्त करने का अनुरोध किया और उन्हें एक गिलास शीतल पेय पिलाकर अनशन तुड़वाया। दिल्ली लौटने के बाद इंदिरा गांधी ने सरकार की ओर से लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मंशा की घोषणा भी की। हालांकि, यह फैसला तत्काल लागू नहीं हुआ और आखिरकार वर्ष 1989 में इसे लागू किया गया।
उन्होंने लिखा कि वर्ष 1982 में इस मांग को लेकर एक अभियान शुरू किया गया, जिसमें उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इस आंदोलन में लद्दाख के मुसलमान और बौद्ध दोनों समुदाय शामिल थे। सरकार की उदासीनता के खिलाफ लोगों की नाराजगी जताने के लिए उन्होंने 15 जनवरी से 30 जनवरी तक 16 दिनों की भूख हड़ताल की। इसके बाद वर्ष 1984 में उन्होंने फिर से पांच दिन की भूख हड़ताल शुरू की।
उन्होंने लिखा कि उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी लेह आईं। उन्होंने भरोसा दिया कि लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाएगा। उन्होंने उनसे भूख हड़ताल समाप्त करने का अनुरोध किया और उन्हें एक गिलास शीतल पेय पिलाकर अनशन तुड़वाया। दिल्ली लौटने के बाद इंदिरा गांधी ने सरकार की ओर से लद्दाख को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मंशा की घोषणा भी की। हालांकि, यह फैसला तत्काल लागू नहीं हुआ और आखिरकार वर्ष 1989 में इसे लागू किया गया।