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क्या है बंगाल का SIR विवाद?: सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब; 58 लाख मतदाताओं के नाम हटने पर उठे सवाल
Fri, 17 Jul 2026 04:41 PM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, नई दिल्ली।
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 17 Jul 2026 04:41 PM IST
सार
पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग और सरकार से जवाब मांगा है। आखिर क्या है पूरा मामला और 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटने पर क्यों उठे सवाल?
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निर्वाचन आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। यह मामला एक जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के दावों और आपत्तियों का विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस ने वकील नेहा राठी के जरिये दाखिल की है।
याचिका में क्या मांग की गई?
याचिका में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई है। इसमें फॉर्म-6 और फॉर्म-7 की कुल संख्या, कितने आवेदन स्वीकार हुए, कितने खारिज हुए और अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित तथा निपटाए गए मामलों का ब्योरा मांगा गया है।
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याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण मामले में दिए गए अपने फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जब कोई न्यायाधिकरण यह कहता है कि किसी व्यक्ति का नाम विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में शामिल नहीं किया जा सकता, तब निर्वाचन आयोग का यह दायित्व है कि वह नागरिकता कानून के तहत नागरिकता तय करने के लिए मामला केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को भेजे।
ये भी पढ़ें: 'अगर फर्ज नहीं निभा सकते तो डॉक्टर मत लिखिए': सुप्रीम कोर्ट की डॉक्टरों को फटकार, बच्ची के इलाज से कर दिया था इनकार
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का सांविधानिक अधिकार नहीं है। कानून में कोई भ्रम नहीं है। निर्वाचन आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची की निगरानी और नियंत्रण तक सीमित है।
कितनी अपीलें लंबित हैं?
वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि अभी भी 33.5 लाख अपीलें लंबित हैं। जिन मामलों का निपटारा हो चुका है, उनमें लगभग 70 फीसदी दावों को स्वीकार किया गया है। उन्होंने कहा कि जब तक इन मामलों का फैसला नहीं होता, तब तक लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और दूसरी सरकारी योजनाओं से बाहर नहीं रखा जा सकता है।
अगली सुनवाई कब होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस नई याचिका को विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सुनने पर सहमति जताई है। इनमें पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है। मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है।
याचिका में और क्या कहा गया?
अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज पर भी सवाल
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनाए गए 18 अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज पर भी चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन सदस्यीय न्यायिक समिति ने 7 अप्रैल को एक मानक कार्यप्रणाली तैयार की थी, लेकिन इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया।
याचिका में इस कार्यप्रणाली को सार्वजनिक करने और अपील की प्रक्रिया से जुड़ी आसान गाइडलाइन बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में जारी करने का निर्देश देने की मांग की गई है, ताकि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर मतदाता भी आसानी से अपील कर सकें।
याचिका में यह भी कहा गया है कि मतदाता सूची से बाहर किए गए कई लोग गरीब, अशिक्षित हैं या कानूनी सहायता के बिना अपील की प्रक्रिया पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी नहीं होने का सबसे ज्यादा असर समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है।
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चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस ने वकील नेहा राठी के जरिये दाखिल की है।
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याचिका में क्या मांग की गई?
याचिका में पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई है। इसमें फॉर्म-6 और फॉर्म-7 की कुल संख्या, कितने आवेदन स्वीकार हुए, कितने खारिज हुए और अपीलीय न्यायाधिकरणों में लंबित तथा निपटाए गए मामलों का ब्योरा मांगा गया है।
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याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
- प्रसेनजीत बोस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए बनाए गए 18 न्यायाधिकरणों का कामकाज सही ढंग से नहीं चल रहा है। इससे व्यावहारिक स्तर पर गड़बड़ियां और देरी हो रही है।
- उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटने के कारण लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्नपूर्णा जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। उन्हें जाति प्रमाण पत्र भी नहीं दिए जा रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
पीठ ने बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण मामले में दिए गए अपने फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जब कोई न्यायाधिकरण यह कहता है कि किसी व्यक्ति का नाम विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में शामिल नहीं किया जा सकता, तब निर्वाचन आयोग का यह दायित्व है कि वह नागरिकता कानून के तहत नागरिकता तय करने के लिए मामला केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को भेजे।
ये भी पढ़ें: 'अगर फर्ज नहीं निभा सकते तो डॉक्टर मत लिखिए': सुप्रीम कोर्ट की डॉक्टरों को फटकार, बच्ची के इलाज से कर दिया था इनकार
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का सांविधानिक अधिकार नहीं है। कानून में कोई भ्रम नहीं है। निर्वाचन आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची की निगरानी और नियंत्रण तक सीमित है।
कितनी अपीलें लंबित हैं?
वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि अभी भी 33.5 लाख अपीलें लंबित हैं। जिन मामलों का निपटारा हो चुका है, उनमें लगभग 70 फीसदी दावों को स्वीकार किया गया है। उन्होंने कहा कि जब तक इन मामलों का फैसला नहीं होता, तब तक लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और दूसरी सरकारी योजनाओं से बाहर नहीं रखा जा सकता है।
अगली सुनवाई कब होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस नई याचिका को विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सुनने पर सहमति जताई है। इनमें पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है। मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है।
याचिका में और क्या कहा गया?
- याचिका में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान गणना चरण में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए।
- दावों और आपत्तियों के चरण में नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख आवेदन और नाम हटाने के लिए 99 हजार से अधिक आवेदन मिले। लेकिन 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल करीब 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े गए।
- याचिकाकर्ता का कहना है कि निर्वाचन आयोग ने विधानसभा क्षेत्रवार यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की कि कितने आवेदन मिले, कितने स्वीकार किए गए और कितने खारिज किए गए। इससे पूरी प्रक्रिया की सार्वजनिक जांच सीमित हो गई है।
- जनहित याचिका में कहा गया है कि विस्तृत आंकड़े और वर्ष 2024 की मतदाता सूची नियमावली में तय प्रारूप सार्वजनिक नहीं किए गए। इससे पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर हुई है।
- याचिका में 60 लाख से अधिक मामलों को 'तार्किक विसंगति' वाला बताकर चिह्नित किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
- याचिका के अनुसार, माता-पिता और बच्चों की उम्र में अंतर, एक परिवार से कई संबंध और नामों में अंतर जैसे मानदंड अपनाए गए, जबकि इनका जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 या विशेष गहन पुनरीक्षण की अधिसूचनाओं में कोई आधार नहीं है।
- याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन्हीं आधारों पर लोगों को नोटिस भेजे गए और बड़ी संख्या में उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। लेकिन इस कार्रवाई का आधार पर्याप्त पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक नहीं किया गया।
अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज पर भी सवाल
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बनाए गए 18 अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज पर भी चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन सदस्यीय न्यायिक समिति ने 7 अप्रैल को एक मानक कार्यप्रणाली तैयार की थी, लेकिन इसे अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया।
याचिका में इस कार्यप्रणाली को सार्वजनिक करने और अपील की प्रक्रिया से जुड़ी आसान गाइडलाइन बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में जारी करने का निर्देश देने की मांग की गई है, ताकि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर मतदाता भी आसानी से अपील कर सकें।
याचिका में यह भी कहा गया है कि मतदाता सूची से बाहर किए गए कई लोग गरीब, अशिक्षित हैं या कानूनी सहायता के बिना अपील की प्रक्रिया पूरी करने में सक्षम नहीं हैं। प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी नहीं होने का सबसे ज्यादा असर समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है।