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Explainer: एफसीआरए विधेयक जेपीसी के पास क्यों भेजा गया, क्या है संयुक्त संसदीय समिति और कैस करती है काम?

Fri, 14 Aug 2026 03:55 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Fri, 14 Aug 2026 03:55 PM IST
सार

विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को विपक्ष के विरोध और व्यापक जांच की मांग के बाद संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजा गया है। जेपीसी में लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सांसद शामिल होते हैं और यह किसी खास विधेयक या मामले की गहराई से जांच करती है। ऐसे में आइए जानते हैं कि यह समिति कैसे काम करती है?

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Why Was the FCRA Bill Sent to the JPC? What Is a Joint Parliamentary Committee and How Does It Work?
एफसीआरए संशोधन विधेयक - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को 13 अगस्त को लोकसभा और राज्यसभा की मंजूरी के बाद संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी)  के पास भेज दिया गया। समिति में दोनों सदनों के सांसद होंगे और उसे शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक अपनी रिपोर्ट लोकसभा में देनी है।

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ऐसे में सवाल उठता है कि एफसीआरए क्या है? विधेयक की संयुक्त संसदीय समिति में कितने सदस्य होंगे? संयुक्त संसदीय समिति क्या होती है? संसद में समिति व्यवस्था कब शुरू हुई? संयुक्त संसदीय समिति कैसे बनती है?समिति का अध्यक्ष कौन होता है? समिति विधेयक की जांच कैसे करती है?क्या जेपीसी ने पहले कानूनों और नीतियों पर असर डाला है?आइए जानते हैं।

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एफसीआरए क्या है और क्यों हो रहा विरोध?

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए यह तय करता है कि भारत में कोई गैर सरकारी संगठन, न्यास, शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक संगठन, कंपनी या व्यक्ति विदेश से मिलने वाला धन किन शर्तों पर प्राप्त कर सकता है और उसका इस्तेमाल कैसे कर सकता है।

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इस कानून का मुख्य उद्देश्य विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाना, उसके उपयोग की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कार्यों में न हो। हालांकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों ने विधेयक का विरोध किया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि इसके प्रावधानों का असर सिविल सोसाइटी और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर पड़ सकता है। विपक्ष ने विधेयक की व्यापक जांच और सभी पक्षों से चर्चा के बाद आगे बढ़ने की मांग की। बढ़ते विरोध के बीच इस विधेयक को जेपीसी के पास भेजा गया। राज्यसभा के सदस्यों का नामांकन राज्यसभा के सभापति करेंगे। 

Why Was the FCRA Bill Sent to the JPC? What Is a Joint Parliamentary Committee and How Does It Work?
एफसीआरए संशोधन विधेयक - फोटो : Amar Ujala

संयुक्त संसदीय समिति क्या होती है?

संयुक्त संसदीय समिति संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों से मिलकर बनी समिति होती है।  ये किसी खास उद्देश्य और निश्चित अवधि के लिए बनाई जाने वाली अस्थायी समिति होती है। इसे एक सदन में प्रस्ताव पारित करके बनाया जाता है और दूसरे सदन की सहमति ली जाती है। समिति में कितने सदस्य होंगे और किन विषयों की जांच करनी है, यह संसद तय करती है।

संसद में समिति व्यवस्था कब शुरू हुई?

संसद में समिति व्यवस्था को 1993 में व्यवस्थित रूप दिया गया था। इसका उद्देश्य संसद के जरिए सरकार के कामकाज की ज्यादा गहराई से जांच करना था।

क्या हर संयुक्त संसदीय समिति में सदस्यों की संख्या समान होती है?

नहीं। हर संयुक्त संसदीय समिति में सदस्यों की संख्या एक जैसी नहीं होती। किसी विधेयक के लिए बनाई जाने वाली संयुक्त समिति में कितने सदस्य होंगे, यह उसके गठन के प्रस्ताव में तय किया जाता है। समिति बनने के बाद उसके अध्यक्ष की नियुक्ति सभापति या अध्यक्ष करते हैं। समिति की बैठकों से जुड़े सभी काम राज्यसभा या लोकसभा सचिवालय देखते हैं।

क्या मंत्री समिति की बैठक में शामिल हो सकते हैं?

अगर कोई मंत्री समिति का सदस्य नहीं है, तब भी वह समिति के अध्यक्ष की अनुमति से समिति को संबोधित कर सकते हैं।

समिति किसी विशेष विधेयक या किसी खास मामले की जांच कैसे करती है?

समिति को भेजे गए किसी विशेष विधेयक या किसी खास मामले की जांच की जाती है और उसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है। समिति आम लोगों, विभिन्न संगठनों, विशेषज्ञों और संबंधित हितों वाले पक्षों से लिखित सुझाव मांग सकती है। जरूरत पड़ने पर इन्हें समिति के सामने मौखिक रूप से अपनी बात रखने के लिए भी बुलाया जा सकता है। समिति जरूरत पड़ने पर संबंधित जगहों का दौरा भी कर सकती है ताकि मामले की प्रत्यक्ष जानकारी हासिल की जा सके। इसके बाद समिति विषय की गहराई से जांच करके अपनी रिपोर्ट तैयार करती है। रिपोर्ट में सरकार के लिए सुझाव और सिफारिशें होती हैं।

Why Was the FCRA Bill Sent to the JPC? What Is a Joint Parliamentary Committee and How Does It Work?
जेपीसी - फोटो : Amar Ujala

सरकार समिति की सिफारिशों पर क्या करती है?

समिति की सिफारिशों के बाद संबंधित सरकारी विभाग समिति को यह जानकारी देता है कि उसने उन सिफारिशों पर क्या कार्रवाई की।

अगर किसी सिफारिश को लागू नहीं किया गया है तो विभाग को उसका कारण भी बताना होता है। अगर समिति विभाग की ओर से दिए गए जवाब से संतुष्ट नहीं होती है तो वह सदन में कार्रवाई संबंधी रिपोर्ट पेश कर सकती है।

समिति की रिपोर्ट आने के बाद क्या होता है?

  • जब संयुक्त समिति अपनी रिपोर्ट सदन में पेश कर देती है तो उसके बाद संबंधित मंत्री विधेयक पर आगे की कार्रवाई के लिए प्रस्ताव ला सकते हैं।
  • समिति की रिपोर्ट के आधार पर विधेयक पर विचार करके उसे पारित किया जा सकता है।
  • विधेयक को उसी समिति या किसी दूसरी समिति के पास दोबारा भेजा जा सकता है।
  • जनता की राय लेने के लिए विधेयक को फिर से प्रसारित किया जा सकता है।
  • इसके बाद जब विधेयक पर विचार करने का प्रस्ताव पारित हो जाता है तो उसकी एक-एक धारा पर अलग-अलग विचार किया जाता है। इस दौरान सांसद विधेयक में संशोधन के प्रस्ताव भी दे सकते हैं।

पहले किन मामलों में जांच संयुक्त संसदीय समिति बनी?

  • 1993 में बैंकिंग और प्रतिभूति लेनदेन में हुई अनियमितताओं की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई थी।
  • 2002 में शेयर बाजार में हुए घोटाले और उससे जुड़े मामलों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई थी।
  • 2004 में सॉफ्ट ड्रिंक, फलों के जूस और दूसरे पेय पदार्थों में कीटनाशक अवशेष और सुरक्षा मानकों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई थी।
  • 2008 में बोफोर्स सौदे से जुड़े मामलों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई थी।
  • 2013 में दूरसंचार लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के आवंटन और कीमत से जुड़े मामलों की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाई गई थी।
  • लाभ के पद से जुड़े संवैधानिक और कानूनी मामलों की जांच के लिए भी संयुक्त समिति बनाई गई थी।
  • जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए भी संसदीय जांच समिति बनाई गई थी।

क्या जेपीसी ने पहले कानूनों और नीतियों पर असर डाला है?

2001 से 2002 की शेयर बाजार घोटाले की संयुक्त संसदीय समिति ने नियामकीय निगरानी, लेनदेन व्यवस्था और बाजार नियामक तथा शेयर बाजारों के बीच समन्वय से जुड़े कई सुझाव दिए थे। सरकार ने बाद में समिति की 236 सिफारिशों पर कार्रवाई की जानकारी दी।

2004 की कीटनाशक अवशेष संबंधी संयुक्त संसदीय समिति ने सॉफ्ट ड्रिंक में कीटनाशक अवशेषों के आरोपों की जांच की। समिति ने अस्वीकार्य स्तर के अवशेषों की पुष्टि की और कड़े सुरक्षा मानकों तथा बेहतर जांच की सिफारिश की। इसके काम से पेय पदार्थों की सुरक्षा से जुड़ी आगे की नियामकीय कार्रवाई और सार्वजनिक जांच को बढ़ावा मिला।

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