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मौत की सजा का नहीं बदलेगा तरीका: फांसी की जगह दूसरे चार तरीकों पर विचार की बात, सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज

Tue, 18 Aug 2026 12:37 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला। Published by: अस्मिता त्रिपाठी Updated Tue, 18 Aug 2026 12:37 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी के बजाय कोई दूसरा तरीका अपनाने की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि भविष्य में ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक सबूत मिलने पर इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा संभव है। 

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Will the method execution change Supreme Court dismisses plea seeking consideration four alternatives hanging.
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाने वाले कैदियों को फांसी देने के बजाय कोई दूसरा तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। याचिका में कहा गया था कि फांसी देना सजा-ए-मौत देने का एक दर्दनाक तरीका है।
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कोर्ट ने क्या कहा? 
इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस रिट याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में इस मामले की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती।  अगर कोई ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक सबूत सामने आते हैं जिनसे इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने की जरूरत पता चलती है, तो समीक्षा की जा सकती है। 
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क्या केंद्र सरकार कर सकती है समीक्षा? 
हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि अगर केंद्र सरकार मौत की सजा देने के तरीके की व्यापक समीक्षा करना चाहती है और इसके लिए कोई दूसरा तरीका अपनाना चाहती है, तो यह फैसला उसके रास्ते में नहीं आएगा।
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इसके साथ ही कोर्ट ने 22 जनवरी, 2026 को मौत की सजा देने के लिए कोई दूसरा और ज्यादा सम्मानजनक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

याचिका में क्या कहा गया है? 
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर पीआईएल में मौत की सजा पाए कैदी को फांसी देकर मारने के मौजूदा तरीके को खत्म करने की मांग की गई थी, क्योंकि इसमें लंबे समय तक दर्द और तकलीफ होती है। इसमें मांग की गई थी कि फांसी की जगह जानलेवा इंजेक्शन गोली मारने, बिजली का झटका देने या गैस चैंबर जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाए, जिनसे कैदी की मौत कुछ ही मिनटों में हो सके।

याचिका में कहा गया है कि फांसी की पूरी प्रक्रिया में कैदी को मृत घोषित करने में 40 मिनट से अधिक समय लगता है। वहीं,  गोली मारने की प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं।  नसों में दिए जाने वाले घातक इंजेक्शन के मामले में, यह प्रक्रिया 5 मिनट में पूरी हो जाती है।


याचिकाकर्ता का क्या तर्क है? 
याचिकाकर्ता का तर्क है कि धारा 354(5) सीआरपीसी के तहत परिकल्पित निष्पादन (जब तक व्यक्ति की मृत्यु न हो जाए तब तक गर्दन से लटकाना) न केवल बर्बर, अमानवीय और क्रूर है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) की ओर से अपनाए गए प्रस्तावों के भी विरुद्ध है।


 
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