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चिंताजनक: बढ़ते सूखे से वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा, तापमान में तेजी से वृद्धि से घटी मिट्टी में नमी
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 19 Jan 2026 06:52 AM IST
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सार
धरती के बढ़ते तापमान से खेतों की मिट्टी तेजी से नमी खो रही है, जिससे सूखा अब संकट बनता जा रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि बसंत में सूखती मिट्टी आने वाले महीनों में फसल उत्पादन और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को गंभीर झटका दे सकती है। इसका भारत पर क्या असर होगा, रिपोर्ट में पढ़िए-
मिट्टी की नमी घटी (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
धरती का बढ़ता तापमान अब केवल मौसम की चरम घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह चुपचाप खेतों की मिट्टी से नमी छीनकर कृषि व्यवस्था की जड़ों को कमजोर कर रहा है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि बसंत ऋतु में मिट्टी के जल्दी सूखने की प्रवृत्ति के कारण यूरोप, अमेरिका समेत दुनिया के कई प्रमुख कृषि क्षेत्रों में भीषण सूखे की आशंका बढ़ रही है। इसका सीधा असर फसल उत्पादन और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है, भले ही सालाना बारिश के आंकड़े पहले जैसे या उससे अधिक क्यों न हों।
जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसका एक कम चर्चित लेकिन गंभीर परिणाम यह है कि मिट्टी और पौधों से पानी कहीं तेजी से वाष्पित हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार अब सूखा केवल कम बारिश का परिणाम नहीं रह गया है। कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य या औसत से अधिक होने के बावजूद खेतों की मिट्टी लंबे समय तक नमी नहीं रोक पा रही है। गर्म वातावरण में मिट्टी जल्दी सूख जाती है और फसलों को वह पानी नहीं मिल पाता, जिसकी उन्हें सबसे अधिक जरूरत होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि बसंत ऋतु में मिट्टी की नमी का स्तर भविष्य के सूखे की गंभीरता तय करने में अहम भूमिका निभाता है। शोध के मुताबिक अगर बसंत में मिट्टी पहले ही सूखी हो, तो गर्मियों में कृषि सूखा कहीं अधिक तीव्र रूप ले लेता है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि फसलों की शुरुआती वृद्धि इसी अवधि में होती है और पानी की कमी का असर पूरे मौसम की पैदावार पर पड़ता है।
ये भी पढ़ें: यूएई के राष्ट्रपति नाहयान आज आएंगे भारत, पीएम के निमंत्रण पर तीसरी बार आधिकारिक यात्रा
बारिश तो बढ़ी पर राहत नहीं
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि कई क्षेत्रों में सालाना औसत वर्षा में वृद्धि के बावजूद सूखे की घटनाएं कम नहीं हो रहीं। इसका कारण यह है कि बढ़ता तापमान बारिश के पानी को लंबे समय तक मिट्टी में टिकने नहीं देता। पानी तेजी से वाष्पित हो जाता है या बहकर निकल जाता है, जिससे फसलों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल बारिश के औसत आंकड़ों के आधार पर सूखे के जोखिम का आकलन करना अब भ्रामक साबित हो रहा है। नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित इस शोध के अनुसार दुनिया के कई प्रमुख खाद्य उत्पादन क्षेत्र सूखे के बढ़ते खतरे की चपेट में हैं। इनमें पश्चिमी और मध्य यूरोप, पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, उत्तरी दक्षिणी अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। ये क्षेत्र वैश्विक कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इतिहास से मिलती चेतावनी
यूरोप में 2003, 2010 और 2018 के भीषण सूखे इस बात की मिसाल हैं कि बसंत और प्रारंभिक गर्मियों में मिट्टी की नमी की कमी किस तरह पूरे मौसम को प्रभावित कर सकती है। इन वर्षों में देखा गया कि गर्म और शुष्क परिस्थितियों ने फसल उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये घटनाएं भविष्य के लिए चेतावनी हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के साथ ऐसे हालात और आम हो सकते हैं।
कृषि और किसानों पर बढ़ता दबाव...
बढ़ते तापमान और सूखती मिट्टी के कारण किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। भले ही बारिश के पैटर्न में बड़ा बदलाव न दिखे, लेकिन खेतों में नमी बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में कृषि को सुरक्षित रखने के लिए सूखा सहिष्णु फसलों को अपनाना, सिंचाई के तरीकों में सुधार करना और जल प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक बनाना अनिवार्य होगा। यह केवल तकनीकी बदलाव का नहीं, बल्कि कृषि नीति और निवेश के पुनर्विचार का भी सवाल है।
भारत की स्थिति संवेदनशील
विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत की स्थिति इस उभरते सूखा-संकट के संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार भारत में मानसून आधारित कृषि व्यवस्था पहले से ही वर्षा की अनिश्चितता, बढ़ते तापमान और भूजल दोहन के दबाव में है। अब बसंत और प्रारंभिक गर्मियों में मिट्टी की नमी तेजी से घटने की प्रवृत्ति गेहूं, चावल और दलहन जैसी प्रमुख फसलों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर रही है। उत्तर भारत के गंगा के मैदान, मध्य भारत और दक्कन के शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं, जहां हल्की वर्षा के बावजूद मिट्टी में नमी टिक नहीं पाती।
उत्सर्जन घटाना जरूरी, लेकिन पर्याप्त नहीं
वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते हैं कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती किए बिना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा नहीं किया जा सकता। कम उत्सर्जन वाले विकास मॉडल अपनाने से सूखे की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि उत्सर्जन घटाने से सूखे का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। इसलिए अनुकूलन रणनीतियों पर समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।
ये भी पढ़ें: भाजपा अध्यक्ष के लिए नबीन का नामांकन आज, पीएम-शाह का कार्यकारी अध्यक्ष को समर्थन; निर्विरोध निर्वाचन तय
नीति निर्माताओं के लिए स्पष्ट संदेश
यह अध्ययन नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है कि सूखे को केवल आपदा के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक संरचनात्मक जोखिम के रूप में देखा जाना चाहिए। कृषि योजनाओं, जल संसाधन प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा नीतियों में मिट्टी की नमी और तापमान के प्रभाव को केंद्रीय स्थान देना होगा। समय रहते कदम उठाए गए तो फसलों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा की परीक्षा
बढ़ती गर्मी और सूखती मिट्टी का यह संकट अंततः वैश्विक खाद्य सुरक्षा की परीक्षा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर अनुसंधान के निष्कर्षों के आधार पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में सूखा एक सामान्य स्थिति बन सकता है। ऐसे में किसानों, वैज्ञानिकों और सरकारों को मिलकर ऐसी रणनीतियां अपनानी होंगी, जो बदलते जलवायु हालात में भी दुनिया की बढ़ती आबादी के लिए भोजन सुनिश्चित कर सकें।
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बारिश तो बढ़ी पर राहत नहीं
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि कई क्षेत्रों में सालाना औसत वर्षा में वृद्धि के बावजूद सूखे की घटनाएं कम नहीं हो रहीं। इसका कारण यह है कि बढ़ता तापमान बारिश के पानी को लंबे समय तक मिट्टी में टिकने नहीं देता। पानी तेजी से वाष्पित हो जाता है या बहकर निकल जाता है, जिससे फसलों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता। वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल बारिश के औसत आंकड़ों के आधार पर सूखे के जोखिम का आकलन करना अब भ्रामक साबित हो रहा है। नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित इस शोध के अनुसार दुनिया के कई प्रमुख खाद्य उत्पादन क्षेत्र सूखे के बढ़ते खतरे की चपेट में हैं। इनमें पश्चिमी और मध्य यूरोप, पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, उत्तरी दक्षिणी अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। ये क्षेत्र वैश्विक कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इतिहास से मिलती चेतावनी
यूरोप में 2003, 2010 और 2018 के भीषण सूखे इस बात की मिसाल हैं कि बसंत और प्रारंभिक गर्मियों में मिट्टी की नमी की कमी किस तरह पूरे मौसम को प्रभावित कर सकती है। इन वर्षों में देखा गया कि गर्म और शुष्क परिस्थितियों ने फसल उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये घटनाएं भविष्य के लिए चेतावनी हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के साथ ऐसे हालात और आम हो सकते हैं।
कृषि और किसानों पर बढ़ता दबाव...
बढ़ते तापमान और सूखती मिट्टी के कारण किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। भले ही बारिश के पैटर्न में बड़ा बदलाव न दिखे, लेकिन खेतों में नमी बनाए रखना कठिन होता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में कृषि को सुरक्षित रखने के लिए सूखा सहिष्णु फसलों को अपनाना, सिंचाई के तरीकों में सुधार करना और जल प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक बनाना अनिवार्य होगा। यह केवल तकनीकी बदलाव का नहीं, बल्कि कृषि नीति और निवेश के पुनर्विचार का भी सवाल है।
भारत की स्थिति संवेदनशील
विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत की स्थिति इस उभरते सूखा-संकट के संदर्भ में अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार भारत में मानसून आधारित कृषि व्यवस्था पहले से ही वर्षा की अनिश्चितता, बढ़ते तापमान और भूजल दोहन के दबाव में है। अब बसंत और प्रारंभिक गर्मियों में मिट्टी की नमी तेजी से घटने की प्रवृत्ति गेहूं, चावल और दलहन जैसी प्रमुख फसलों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा कर रही है। उत्तर भारत के गंगा के मैदान, मध्य भारत और दक्कन के शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं, जहां हल्की वर्षा के बावजूद मिट्टी में नमी टिक नहीं पाती।
उत्सर्जन घटाना जरूरी, लेकिन पर्याप्त नहीं
वैज्ञानिक इस बात पर जोर देते हैं कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती किए बिना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा नहीं किया जा सकता। कम उत्सर्जन वाले विकास मॉडल अपनाने से सूखे की घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि उत्सर्जन घटाने से सूखे का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। इसलिए अनुकूलन रणनीतियों पर समान रूप से ध्यान देना जरूरी है।
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नीति निर्माताओं के लिए स्पष्ट संदेश
यह अध्ययन नीति निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश देता है कि सूखे को केवल आपदा के रूप में नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक संरचनात्मक जोखिम के रूप में देखा जाना चाहिए। कृषि योजनाओं, जल संसाधन प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा नीतियों में मिट्टी की नमी और तापमान के प्रभाव को केंद्रीय स्थान देना होगा। समय रहते कदम उठाए गए तो फसलों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा की परीक्षा
बढ़ती गर्मी और सूखती मिट्टी का यह संकट अंततः वैश्विक खाद्य सुरक्षा की परीक्षा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर अनुसंधान के निष्कर्षों के आधार पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में सूखा एक सामान्य स्थिति बन सकता है। ऐसे में किसानों, वैज्ञानिकों और सरकारों को मिलकर ऐसी रणनीतियां अपनानी होंगी, जो बदलते जलवायु हालात में भी दुनिया की बढ़ती आबादी के लिए भोजन सुनिश्चित कर सकें।