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Explainer: जोजिला सुरंग कितनी खास? करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने रची हमले की साजिश, अब मिली अभेद्य सुरक्षा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 09 Jun 2026 05:59 PM IST
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सार
लद्दाख को हर मौसम में कश्मीर और शेष भारत से जोड़ने वाली सामरिक रूप से अहम जोजिला सुरंग के अंदर आखिरी चट्टानी दीवार को ब्लास्ट के जरिए सफलतापूर्वक तोड़ दिया गया। इसे इंजीनियरिंग की भाषा में ब्रेकथ्रू कहा जाता है, जिसके गवाह खुद सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी बने। इस सफलता के साथ ही कश्मीर और लद्दाख के बीच निर्बाध और सुरक्षित संपर्क बहाल रखने के लिए निर्माण कार्य अगले चरण में पहुंच गया।
जोजिला सुरंग।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत के अहम जोजिला सुरंग प्रोजेक्ट में मंगलवार (9 जून) को एक बड़ा पड़ाव आया। जोजिला दर्रे के ठीक नीचे स्थित निर्माणाधीन इस सुरंग में अहम ब्रेकथ्रू हासिल किया गया। केंद्रीय सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में कारगिल की तरफ खुलने वाले इस सुरंग के हिस्से पर ब्लास्टिंग (धमाकों) का आखिर राउंड पूरा कर लिया गया। यानी सुरंग से आखिरी ब्लॉक हटने के बाद अब जोजिला सुरंग का निर्माण और तेज होते हुए अपने अंतिम चरण तक पहुंच गया है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जोजिला दर्रे पर बन रही इस सुरंग का इतिहास क्या है? इसे बनाने की जरूरत क्यों महसूस की गई? सुरंग कहां से कहां तक स्थित है? इसे बनाने में कितना खर्च आया है? इसके अलावा इस सुरंग की खास बातें क्या हैं? साथ ही कारगिल युद्ध से जुड़ी इसकी कहानी क्या है? आइये जानते हैं...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर जोजिला दर्रे पर बन रही इस सुरंग का इतिहास क्या है? इसे बनाने की जरूरत क्यों महसूस की गई? सुरंग कहां से कहां तक स्थित है? इसे बनाने में कितना खर्च आया है? इसके अलावा इस सुरंग की खास बातें क्या हैं? साथ ही कारगिल युद्ध से जुड़ी इसकी कहानी क्या है? आइये जानते हैं...
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जोजिला दर्रे पर बन रही इस सुरंग का इतिहास क्या है?
जोजिला दर्रे पर बन रही इस अहम सुरंग के निर्माण का इतिहास करीब एक दशक पुराना है। यूं तो इसका अधिकतर काम मोदी सरकार में ही हुआ है, लेकिन इसकी योजना को आधिकारिक तौर पर मंजूरी 2013 में ही मिल गई थी।
मेघा इंजीनियरिंग ने 1 अक्तूबर 2020 से परियोजना पर काम शुरू किया और 14 अक्तूबर 2020 को पहली ब्लास्टिंग (विस्फोट) की गई। हिमालय के बेहद नाजुक भूविज्ञान, भूस्खलन के खतरे और जमा देने वाले तापमान (शून्य से 35 डिग्री नीचे तक) जैसी विषम परिस्थितियों से जूझते हुए इंजीनियरों ने काम जारी रखा। आखिरकार अब इस सुरंग का निर्माण अंतिम चरण में पहुंच चुका है।
सुरंग कहां से कहां तक स्थित है?
जोजिला सुरंग जम्मू और कश्मीर में सोनमर्ग के पास बालटाल से लेकर लद्दाख में द्रास के पास मीनमर्ग तक स्थित है। यह सुरंग राष्ट्रीय राजमार्ग-1 (एनएच-1) पर जोजिला दर्रे के ठीक नीचे बनाई जा रही है। 13.15 किलोमीटर लंबी यह महत्वपूर्ण सुरंग सीधे तौर पर कश्मीर घाटी को लद्दाख क्षेत्र से जोड़ती है।इस सुरंग के निर्माण की जरूरत क्यों महसूस की गई?
हर मौसम में सीमाई इलाकों से संपर्क: सर्दियों में भारी बर्फबारी, बर्फीले तूफानों और हिमस्खलन की वजह से जोजिला दर्रा साल में लगभग 6 से 7 महीने (160 से 180 दिनों तक) बंद रहता है। इस दौरान लद्दाख का संपर्क कश्मीर घाटी और देश के बाकी हिस्सों से काफी हद तक कट जाता है। रास्ता बंद होने पर हवाई यात्रा ही एकमात्र विकल्प बचता है, जिसका किराया सर्दियों के चरम महीनों में 40,000 रुपये तक पहुंच जाता है। यह सुरंग कश्मीर और लद्दाख के बीच 365 दिन का सुरक्षित संपर्क सुनिश्चित करेगी।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य आवश्यकता: यह राजमार्ग लद्दाख, सियाचिन ग्लेशियर और चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तैनात भारतीय सैनिकों के लिए प्राथमिक आपूर्ति मार्ग है। सुरंग के बन जाने से सेना और सैन्य साजो-सामान की आवाजाही बिना किसी मौसमी रुकावट के पूरे साल हो सकेगी, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम पड़ाव होगा।
यात्रा के समय में भारी कमी: मौजूदा समय में सोनमर्ग और मीनमर्ग (या बालटाल से मीनमर्ग) के बीच के पहाड़ी दर्रे को पार करने में कई घंटे लगते हैं। सुरंग के पूरी तरह चालू होने के बाद यह 13.15 किलोमीटर लंबी यात्रा केवल 15 से 40 मिनट के भीतर पूरी की जा सकेगी।
दुर्घटनाओं से बचाव और सुरक्षित यात्रा: मौजूदा पहाड़ी मार्ग बेहद दुर्गम और खतरनाक है, जहां भूस्खलन और खराब मौसम के कारण अकसर जानलेवा दुर्घटनाएं होती हैं। आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों से लैस इस सुरंग के बनने से यात्रा बहुत अधिक सुरक्षित हो जाएगी और दुर्घटनाओं की संभावना न के बराबर रह जाएगी।
सामाजिक-आर्थिक विकास: साल भर कनेक्टिविटी रहने से इस क्षेत्र में पर्यटन, व्यापार और अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए मौके पैदा होंगे और कठोर सर्दियों के दौरान होने वाले पलायन को रोका जा सकेगा।
दुर्घटनाओं से बचाव और सुरक्षित यात्रा: मौजूदा पहाड़ी मार्ग बेहद दुर्गम और खतरनाक है, जहां भूस्खलन और खराब मौसम के कारण अकसर जानलेवा दुर्घटनाएं होती हैं। आधुनिक सुरक्षा प्रणालियों से लैस इस सुरंग के बनने से यात्रा बहुत अधिक सुरक्षित हो जाएगी और दुर्घटनाओं की संभावना न के बराबर रह जाएगी।
सामाजिक-आर्थिक विकास: साल भर कनेक्टिविटी रहने से इस क्षेत्र में पर्यटन, व्यापार और अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए मौके पैदा होंगे और कठोर सर्दियों के दौरान होने वाले पलायन को रोका जा सकेगा।
जोजिला सुरंग को बनाने में कितना खर्च आया?
2013 में कैबिनेट ने इस सुरंग परियोजना के लिए 6,809 करोड़ रुपये के बजट को मंजूरी दी थी। 2017 जब पहली बार बोली आमंत्रित की गईं, तो यह ठेका आईएल एंड एफएस को 4,899 करोड़ रुपये में दिया गया था। हालांकि, आईएल एंड एफएस के दिवालिया हो जाने की वजह से बाद में यह प्रोजेक्ट मेघा इंजीनियरिंग को मिला, जिसने 2020 में आगे के प्रोजेक्ट के लिए 4,509 करोड़ रुपये की सबसे कम बोली लगाकर इसका निर्माण कार्य अपने हाथ में लिया।भले ही मेगा इंजीनियरिंग ने कम दर पर बोली लगाकर ठेका लिया, लेकिन इस पूरी परियोजना की संशोधित कुल लागत बढ़कर पहले 6500 करोड़ रुपये आंकी गई। हालांकि, अब इस प्रोजेक्ट के 2028 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके चलते इसकी कुल लागत 8,308 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस संशोधित बजट में पांच फीसदी वार्षिक मुद्रास्फीति और सुरंग के चालू होने के बाद चार साल के रखरखाव और संचालन के खर्च को भी जोड़ दिया गया है। इसके अलावा, पहले ठेकेदार के दिवालिया होने के कारण निर्माण में हुई देरी से भी वित्तीय ढांचा प्रभावित हुआ है।
मार्च 2025 में संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, कुल बजट में से 3,934.42 करोड़ रुपये का खर्च सुरंग निर्माण पर किया जा चुका था और लगभग 64% काम पूरा हो गया था।
क्यों अपने आप में खास होगी जोजिला सुरंग?
जोजिला सुरंग यूं तो महज एक सुरंग के तौर पर देखी जा सकती है, हालांकि पहाड़ की जबरदस्त ऊंचाई पर होने की वजह से यह अपने आप में इंजीनियरिंग का एक अद्भुत अजूबा है।विश्व रिकॉर्ड और आयाम
यह दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब, दो दिशा वाली सड़क सुरंग है, जो समुद्र तल से लगभग 11,578 फीट ऊंचाई पर स्थित है। घोड़े की नाल के आकार वाली यह 2-लेन सुरंग 13.153 किलोमीटर लंबी, 9.5 मीटर चौड़ी और 7.57 मीटर ऊंची है। इसे एशिया की सबसे लंबी दो दिशा वाली सुरंग भी माना जा रहा है।
स्मार्ट और अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणालियां
इसे एक स्मार्ट टनल के तौर पर डिजाइन किया गया है। इसमें पूरी तरह से ट्रांसवर्स वेंटिलेशन सिस्टम, निर्बाध बिजली आपूर्ति, आपातकालीन बिजली की व्यवस्था, सीसीटीवी निगरानी, वैरिएबल मैसेज साइन, ट्रैफिक लॉगिंग उपकरण और एक समर्पित टनल रेडियो सिस्टम मौजूद है।
आपातकालीन सुविधाएं
सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुरंग के अंदर हर 125 मीटर पर आपातकालीन टेलीफोन और अग्निशमन कैबिनेट लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा पैदल यात्रियों के सुरक्षित निकास के लिए हर 250 मीटर पर क्रॉस-पैसेज और वाहनों के लिए हर 750 मीटर पर मोटरेबल क्रॉस-पैसेज और ले-बाय (पार्किंग) की सुविधा होगी।
निर्माण की खास तकनीक
हिमालय के नाजुक भूविज्ञान और बदलती चट्टानों की स्थिति को देखते हुए इसे न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड का इस्तेमाल करके बनाया जा रहा है। यह तकनीक अनुक्रमिक खुदाई करने और तुरंत सपोर्ट (जैसे शॉट्रीट और रॉक बोल्टिंग) की सुविधा देती है, जिससे अस्थिर पहाड़ी वातावरण में भी निर्माण सुरक्षित रहता है।
विशाल कॉरिडोर का हिस्सा
यह सुरंग लगभग 30.894 किलोमीटर लंबे एक बड़े कॉरिडोर प्रोजेक्ट का मुख्य हिस्सा है। इस प्रोजेक्ट में केवल 13.15 किलोमीटर की मुख्य सुरंग ही नहीं, बल्कि अप्रोच रोड, हिमस्खलन से बचाव के लिए स्नो गैलरी, 460 मीटर की कुल लंबाई वाले तीन पुल और नीलग्रार की जुड़वां सुरंगेंभी शामिल हैं।
सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुरंग के अंदर हर 125 मीटर पर आपातकालीन टेलीफोन और अग्निशमन कैबिनेट लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा पैदल यात्रियों के सुरक्षित निकास के लिए हर 250 मीटर पर क्रॉस-पैसेज और वाहनों के लिए हर 750 मीटर पर मोटरेबल क्रॉस-पैसेज और ले-बाय (पार्किंग) की सुविधा होगी।
निर्माण की खास तकनीक
हिमालय के नाजुक भूविज्ञान और बदलती चट्टानों की स्थिति को देखते हुए इसे न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड का इस्तेमाल करके बनाया जा रहा है। यह तकनीक अनुक्रमिक खुदाई करने और तुरंत सपोर्ट (जैसे शॉट्रीट और रॉक बोल्टिंग) की सुविधा देती है, जिससे अस्थिर पहाड़ी वातावरण में भी निर्माण सुरक्षित रहता है।
विशाल कॉरिडोर का हिस्सा
यह सुरंग लगभग 30.894 किलोमीटर लंबे एक बड़े कॉरिडोर प्रोजेक्ट का मुख्य हिस्सा है। इस प्रोजेक्ट में केवल 13.15 किलोमीटर की मुख्य सुरंग ही नहीं, बल्कि अप्रोच रोड, हिमस्खलन से बचाव के लिए स्नो गैलरी, 460 मीटर की कुल लंबाई वाले तीन पुल और नीलग्रार की जुड़वां सुरंगेंभी शामिल हैं।
क्या है इसका कारगिल युद्ध से जुड़ा इतिहास?
जोजिला से होकर गुजरने वाला श्रीनगर-लेह राजमार्ग लद्दाख (जिसमें सियाचिन ग्लेशियर और चीन से लगी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) शामिल हैं) में तैनात भारतीय सैनिकों के लिए सैन्य रसद आपूर्ति का मुख्य मार्ग है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना ने जानबूझकर इस राजमार्ग पर नजर रखने वाले ऊंचे पहाड़ी इलाकों को निशाना बनाया था। उनका नापाक मकसद भारत की इसी सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने का था, ताकि कारगिल और लद्दाख को देश से काटा जा सके।कारगिल युद्ध के इसी कड़वे अनुभव ने भारतीय रक्षा योजनाकारों को यह स्पष्ट कर दिया कि सैन्य तैनाती को बनाए रखने, भारी उपकरणों की आवाजाही और अग्रिम मोर्चों पर तेजी से सेना भेजने के लिए जोजिला से होकर एक निर्बाध और सुरक्षित पहुंच का होना बेहद जरूरी है। इसी वजह से इस सुरंग को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इतना जरूरी माना गया। सुरंग का पूर्वी छोर लद्दाख के द्रास क्षेत्र (मीनमर्ग) के करीब खुलता है। द्रास ने कारगिल युद्ध के दौरान एक बेहद अहम भूमिका निभाई थी। द्रास के पास ही ऐतिहासिक कारगिल युद्ध स्मारक स्थित है, जो 1999 के इस युद्ध में अदम्य साहस दिखाने वाले भारतीय सैनिकों की याद में स्थापित किया गया है।
एक तरह से देखा जाए तो कारगिल युद्ध ने यह साबित कर दिया था कि दुश्मन इस दर्रे की भौगोलिक चुनौतियों का फायदा उठा सकता है। इसलिए, जोजिला सुरंग का बनना भारत के लिए केवल एक सड़क परियोजना न होकर दुश्मन के खिलाफ भारतीय सेना के लिए एक अभेद्य ढाल है।
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