बडगाम में राजनीतिक संग्राम: नेकां के गढ़ में उमर की प्रतिष्ठा दांव पर, जनता पूछ रही है पुराने वादों का हिसाब
बडगाम में आगामी चुनावों को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) की प्रतिष्ठा दांव पर है, जहां पीडीपी से सीधी टक्कर और सांसद रुहुल्ला के तीखे तेवर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। जनता पिछले चुनावी वादों की नाकामी से नाराज दिख रही है और सोच-समझकर वोट देने की बात कर रही है।
विस्तार
अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली...राज्य का दर्जा बहाली...जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) को हटाने का वादा... युवाओं के लिए नौकरियों का वादा... एक संतुलित आरक्षण नीति लागू करने का प्रयास करने का वादा...।
हम बडगाम का चुनावी मिजाज जानने के लिए निकले तो नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के पिछले चुनावी वादे एक-एक कर जेहन में कौंधने लगे। एक-एक शब्द ऐसे याद आने लगे मानो एक साल पुरानी नहीं, कल की ही बात हो। साफ है कि ये सवाल बड़े हैं और चुनावी समर में उठेंगे भी।
बडगाम सीट पर 2002 से 2014 तक जीत की हैट्रिक लगाकर विधानसभा का सफर कर चुके सत्तारूढ़ दल के सांसद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी लगातार चुनाव में किए गए वादों पर पार्टीलाइन से हटकर सवाल उठाते रहे हैं। साफ है कि इसको लेकर चुनाव में भी सवाल उठेंगे।
वादों से निकल हकीकत की धरातल पर चलें तो सवाल बड़े हो जाते हैं। अनुच्छेद 370 की बहाली से ध्यान हटाकर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने पर जोर देने पर सत्तारूढ़ दल प्रतिद्वंद्वियों के निशाने पर रहा है।
आरक्षण नीति में संशोधन सहित अन्य प्रमुख चुनावी वादों को पूरा न कर पाने को लेकर सीधे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर तोहमत लगते रहे हैं। आम आदमी पार्टी के विधायक मेहराज मलिक की जन सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तारी पर सवाल उठाने के सिवा मुख्यमंत्री इसे खत्म करने के वादे पर भी कुछ ठोस नहीं कर सके।जेहन में उमड़ते-घुमड़ते सवालों के साथ हमने सबसे पहले शरीयताबाद का रुख किया। शरीयताबाद इसलिए भी खास है क्योंकि यह सत्तारूढ़ सांसद आगा सैयद रुहुल्ला का क्षेत्र है।
चुनावी मिजाज को लेकर सवाल करते ही कई लोगों के दर्द उभर आते हैं। तपाक से जवाब आता है-नेकां को इस सीट से जीत दिलाने के बावजूद यहां के लोगों के बारे में नहीं सोचा गया। इंजीनियरिंग के छात्र आसिफ अली भी ऐसा ही जवाब देते हैं। वे कहते हैं, देखिए! इस क्षेत्र के लोगों ने नेकां को जिताया लेकिन उसके बाद क्या हुआ? हमें लावारिस छोड़ दिया गया। हमारी सुध लेने भी कोई नहीं आया। हमारे बुनियादी मसलों पर भी कोई गौर नहीं करता।
हम तो अब जो भी फैसला लेंगे, सोच समझकर ही लेंगे। हां, यह बात सही है कि राजनीतिक दल किस चेहरे को मैदान में उतारते हैं हमारा फैसला उससे प्रभावित होगा। स्थानीय निवासी मुब्बशिर हुसैन छात्र आसिफ से इत्तफाक नहीं रखते।
वे बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं, यहां के लोग नेकां के साथ हैं। इसका सबूत यही है कि एक बार की जीत को छोड़कर यहां हमेशा नेकां का उम्मीदवार जीता। चाहे उम्मीदवार कोई भी हो, हम चाहेंगे कि नेकां का खेमा ही जीते।
जीती सीट छोड़ने की नाराजगी के साथ पीडीपी की पहुंच की चर्चा
हम बडगाम के सुंडीपोरा पहुंचे तो नेकां को लेकर नाराजगी के स्वर सुनाई देने लगे। इस सीट को छोड़ने और गांदरबल सीट को बरकरार रखने के मुख्यमंत्री के फैसले पर लोग सवाल उठाते हैं। कुछ तो इससे आगे जाकर कहते हैं कि पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के मुंतजिर मेहदी हारने के बावजूद क्षेत्र में बराबर सक्रिय रहे हैं। इसका पीडीपी के उम्मीदवार को फायदा मिलेगा।
सुंडीपोरा बडगाम के रूफ अहमद कहते हैं, नेकां को लेकर लोगों में कुछ हद तक नाराजगी है लेकिन अंत में उसके समर्थक उसे वोट कर सकते हैं। सबसे खास होगा शिया नेता आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी का रुख। यहां उनका अच्छा प्रभाव माना जाता है। यहीं के फैसल रियाज कहते हैं, इस बार लोग सोच-समझकर वोट करेंगे। पिछले चुनाव में 15 हजार से अधिक सुन्नी मतदाताओं ने पीडीपी के हक में मतदान काया था। अब जो हालात देखने को मिल रहे हैं उससे लगता है कि उनके वोटों में कुछ इजाफा हो सकता है। जीत-हार चाहे जिसकी हो लेकिन पीडीपी अच्छी टक्कर देगी।
भाजपा का वोट बैंक नहीं...पीसी गठबंधन पहुंचा सकता है नुकसान
बडगाम के लोग इस सीट पर भाजपा को लेकर किसी संभावना से इन्कार करते हैं। पटवाव के प्रो. इफ्तिखार कहते हैं, यहां भाजपा का जीतना बहुत दूर की बात है। हालांकि सज्जाद लोन की अध्यक्षता वाली पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (पीसी), हकीम मोहम्मद यासीन के अगुवाई वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) और जमात-ए-इस्लामी समर्थित जस्टिस एंड डवलपमेंट फ्रंट के नेताओं ने पीपुल्स अलायंस फॉर चेंज नामक जो नया राजनीतिक मोर्चा बनाया है, उस पर भी निगाहें होंगी। इन नेताओं का बडगाम में अपना वोट बैंक है।
सियासी पंडितों की बात करें तो वे बडगाम उपचुनाव को सीएम उमर अब्दुल्ला की परीक्षा के रूप में देख रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इनायत अहमद कहते हैं, इस चुनाव में नेकां और पीडीपी के बीच सीधा मुकाबला है। यह नेकां सरकार के लिए एक परीक्षा है क्योंकि वह करीब एक साल से सत्ता में है।
नेकां को रुहुल्ला के समर्थकों को खींचना चुनौतीपूर्ण
श्रीनगर संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले शिया सांसद रुहुल्ला की पार्टी से दूरी बनाए रखना नेकां के लिए चिंता का विषय है। मुख्यमंत्री से उनके मतभेद सुर्खियों में रहे हैं। रुहुल्ला मौजूदा आरक्षण नीति को लेकर काफी मुखर रहे हैं और इसमें बदलाव की मांग करते रहे हैं। उन्होंने प्रत्याशियों के नाम पर अटकलों के बीच उमर सरकार पर विफल रहने के आरोप लगाए हैं। राजनीतिक विश्लेषक इनायत अहमद कहते हैं, भले ही नेकां का पलड़ा भारी दिख रहा हो पर रुहुल्ला का समर्थन नेकां, पीडीपी का भाग्य तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
चेहरों को लेकर कयास जारी
अभी तक किसी भी दल ने उम्मीदवारों को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं लेकिन अटकलों का बाजार गर्म है। शिया नेता आगा सैयद महमूद और मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी के नाम जनता के बीच उछल रहे हैं। वानी कुपवाड़ा से चुनाव हार गए थे लेकिन उमर अब्दुल्ला से नजदीकी के कारण वह मुख्यमंत्री के सलाहकार बन गए। वहीं आगा सैयद महमूद की क्षेत्र में अच्छी पैठ है। पीडीपी को लेकर चर्चा है कि वह मुंतजिर मेहदी को फिर आजमा सकती है। मुंतजिर 2024 के चुनाव में 17,525 वोट हासिल किए थे। कुल मतों में उनकी हिस्सेदारी 26.53 प्रतिशत थी। मुंतजिर के पक्ष में दलील दी जा रही है कि अब्दुल्ला के बडगाम सीट छोड़ने को पीडीपी जनता के बीच उछालकर भावनात्मक फायदा उठा सकती है।
| वर्ष | विजेता | पार्टी | प्राप्त मत |
| 1962 | आगा सैयद अली सैफवी | नेकां | 18,719 |
| 1967 | एचएस मेहदी नेकां | नेकां | 6,250 |
| 1972 | अली मोहम्मद मीर | कांग्रेस | 8,448 |
| 1977 | गुलाम हुसैन गिलानी नेकां | नेकां | 14,324 |
| 1983 | गुलाम हुसैन गिलानी नेकां | नेकां | 17,037 |
| 1987 | गुलाम हुसैन गिलानी नेकां | नेकां | 18,911 |
| 1996 | गुलाम हुसैन गिलानी नेकां | नेकां | 15,360 |
| 2002 | आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी | नेकां | 11,398 |
| 2008 | आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी | नेकां | 19,652 |
| 2014 | आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी | नेकां | 30,090 |
| 2024 | उमर अब्दुल्ला | नेकां | 36,010 |