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Srinagar News: स्कॉस्ट की कार्यशाला में जुटे 18 राज्यों के 37 इंडियन फॉरेस्ट सर्विस अधिकारी
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श्रीनगर। शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ऑफ कश्मीर की ओर से ‘वन और वन्यजीव क्षेत्रों में इकोटूरिज्म : संभावनाएं और चुनौतियां’ विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय क्षमता-निर्माण कार्यक्रम किया जा रहा है।
1 से 3 सितंबर तक शालीमार कैंपस में चलने वाली इस कार्यशाला में 18 राज्यों के 37 इंडियन फॉरेस्ट सर्विस अधिकारी हिस्सा ले रहे हैं। भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ वानिकी पेशेवर, विश्वविद्यालय के नेता, शोधकर्ता और विषय विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए स्कॉस्ट-कश्मीर के कुलपति प्रो. नज़ीर अहमद गनई ने जोर दिया कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन को स्थिरता, संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उद्देश्य पर्यटकों की संख्या को अधिकतम करना नहीं, बल्कि पर्यटन के सकारात्मक मूल्य को अधिकतम करते हुए इसके पारिस्थितिक प्रभाव (इकोलॉजिकल फुटप्रिंट) को कम करना होना चाहिए।
हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता पर जोर देते हुए प्रो. गनई ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया, जिसमें पर्यटन पारिस्थितिक गिरावट के बजाय संरक्षण का एक साधन बने। कुलपति ने संरक्षित-क्षेत्र प्रबंधन, जैव विविधता मूल्यांकन, आगंतुक प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी और साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल निगरानी की बढ़ती भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य तैयार करने, पेशेवर क्षमताएं विकसित करने और उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए प्रौद्योगिकी-आधारित समाधान प्रदान करने में स्कॉस्ट-के की महत्वपूर्ण भूमिका है।
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1 से 3 सितंबर तक शालीमार कैंपस में चलने वाली इस कार्यशाला में 18 राज्यों के 37 इंडियन फॉरेस्ट सर्विस अधिकारी हिस्सा ले रहे हैं। भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में वरिष्ठ वानिकी पेशेवर, विश्वविद्यालय के नेता, शोधकर्ता और विषय विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए स्कॉस्ट-कश्मीर के कुलपति प्रो. नज़ीर अहमद गनई ने जोर दिया कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटन को स्थिरता, संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उद्देश्य पर्यटकों की संख्या को अधिकतम करना नहीं, बल्कि पर्यटन के सकारात्मक मूल्य को अधिकतम करते हुए इसके पारिस्थितिक प्रभाव (इकोलॉजिकल फुटप्रिंट) को कम करना होना चाहिए।
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हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता पर जोर देते हुए प्रो. गनई ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया, जिसमें पर्यटन पारिस्थितिक गिरावट के बजाय संरक्षण का एक साधन बने। कुलपति ने संरक्षित-क्षेत्र प्रबंधन, जैव विविधता मूल्यांकन, आगंतुक प्रबंधन, पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी और साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल निगरानी की बढ़ती भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य तैयार करने, पेशेवर क्षमताएं विकसित करने और उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए प्रौद्योगिकी-आधारित समाधान प्रदान करने में स्कॉस्ट-के की महत्वपूर्ण भूमिका है।
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