35 साल बाद बड़ा कदम: सतीम त पतीम अब और नहीं, पनुन कश्मीर ने बनाया अपना लिखित संविधान
विस्थापित कश्मीरी पंडित संगठन 'पनुन कश्मीर' ने अपने समुदाय को एकजुट करने और युवाओं को उनकी जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से अपना लिखित संविधान तैयार किया है। संगठन का कहना है कि यह संविधान समुदाय के संघर्ष, अधिकारों और पुनर्वास की दिशा में मार्गदर्शन का काम करेगा।
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सतीम त पतीम (सातवीं और अंतिम बार) अब और नहीं...। कश्मीरी पंडित समुदाय की भावी पीढ़ी को उनके अतीत, रीति-रिवाजों, गौरवशाली परंपरा और विस्थापन के दर्द से रूबरू कराने के लिए संगठन ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। आखिरी विस्थापन के 35 साल बाद पनुन कश्मीर ने अपना आधिकारिक संविधान कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ पनुन कश्मीर तैयार किया है। इसका मुख्य उद्देश्य देश और दुनिया भर में बिखरे हुए समुदाय के लोगों, विशेषकर युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ना है ताकि वे आने वाले समय में भी पनुन कश्मीर (अपना कश्मीर) की मांग और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष को मजबूती से जारी रख सकें।
विस्थापित कश्मीरी पंडित समुदाय के सबसे बड़े संगठन पनुन कश्मीर के अध्यक्ष टीटू गंजू ने कहा कि साल 1389 से 1990 तक हम कश्मीरी पंडित समुदाय सात बार अपनी जन्मभूमि और ऋषि कश्यप की तपोस्थली कश्मीर से पलायन कर चुके हैं। अब यह सिलसिला हमेशा के लिए थम चुका है। 1990 का विस्थापन हमारा आखिरी विस्थापन था।
संविधान निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने वाले टीटू बताते हैं कि 1990 के निष्कासन/ विस्थापन के बाद कश्मीरी पंडित वापसी के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। उम्मीद में हजारों लोगों की सांसें थम चुकी हैं। भावी पीढ़ी को भटकाव से बचाने और संघर्ष जारी रखने के लिए मार्गदर्शन के लिए संविधान जरूरी था। पनुन कश्मीर के भगीरथ प्रयास में यही संविधान मददगार बनेगा। सभी को एक सूत्र में बांधते हुए मार्गदर्शक बनेगा।
विधि विशेषज्ञों से सलाह लेकर तैयार हुआ संविधान
टीटू ने बताया कि 24 मार्च 2026 को संविधान लिखने और 10 मई तक इसे पूर्ण करने का निर्णय लिया गया। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट से सेवानिवृत कई जजों और कार्यरत अधिवक्ताओं से सलाह-मशविरा लेने के बाद ‘कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ पनुन कश्मीर’ का निर्माण पूर्ण हुआ जिसे 24 मई 2026 को अंगीकार किया गया। इसमें आठ भाग में विभिन्न मुद्दों से संबंधित 29 अनुच्छेद हैं।
अब तक सात बार पलायन
- पहला पलायन (1389–1413) : सुल्तान सिकंदर बुतशिकन के शासनकाल के दौरान।
- दूसरा पलायन (1586) : मुगल सम्राट अकबर द्वारा कश्मीर को जीतने के बाद।
- तीसरा पलायन (1753) : अफगान (दुर्रानी) शासन के आगमन के समय।
- चौथा पलायन (1819) : सिख शासन के दौरान।
- पांचवां पलायन (1931) : डोगरा शासन के खिलाफ सांप्रदायिक दंगों के दौरान।
- छठा पलायन (1986): अनंतनाग और कश्मीर के अन्य हिस्सों में भड़के दंगों के कारण।
- सातवां और सबसे बड़ा पलायन (1990 के दशक में): आतंकवाद और चरमपंथ के उभार के बाद।
पनुन कश्मीर संविधान के आठ भाग में हैं 29 अनुच्छेद
भाग-1 में तीन अनुच्छेद 1-3 तक उद्देश्य, सिद्धांत और व्याख्या की गई है। भाग-2 के अनुच्छेद 4 में संवैधानिक संरचना की जानकारी। भाग-3 के अनुच्छेद 5-7 तक में आम सभा के बारे में बताया गया है। भाग-4 में अनुच्छेद 8-17 तक कार्यकारी संरचना, भाग-5 में अनुच्छेद 18-22 तक कॉलेजियम के बारे में और भाग-6 में अनुच्छेद 23-24 के तहत जवाबदेही, निष्कासन और अनुशासनात्मक ढांचा का विवरण दिया गया है। भाग-6 में अनुच्छेद 25-28 में संबद्ध शाखाएं और संस्थागत एकीकरण और भाग-8 में अनुच्छेद 29 में शिकायत निवारण प्रकोष्ठ के बारे में अवगत कराया गया है। इसके अलावा अनुबंध के परिशिष्ट-1 में मार्गदर्शन संकल्प-1991 और परिशिष्ट-2 में पनुन कश्मीर नरसंहार और अत्याचार निवारण विधेयक-2020 के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है।
कश्मीरी पंडित समुदाय अब तक सात बार विस्थापित हो चुका है लेकिन अब आगे नहीं होगा। 1990 में तो हमारा विस्थापन नहीं बल्कि निष्कासन हुआ। नरसंहार हुआ। पनुन कश्मीर के संघर्ष को जारी रखने, भावी पीढ़ी को अतीत से अवगत कराने और मार्गदर्शन के लिए कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ पनुन कश्मीर का निर्माण किया गया है। भारतीय संविधान की तरह यह हम कश्मीरी समुदाय के सुरक्षा कवच के रूप में काम करेगा। देश-विदेश में रह रहे लोगों के बीच इसे ऑनलाइन और पुस्तक के रूप में पहुंचाया जा रहा है। टीटू गंजू, अध्यक्ष पनुन कश्मीर/सदस्य संविधान समिति