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महबूबा का ट्वीटः कश्मीरी पंडितों के पलायन का दर्द बना दक्षिणपंथियों का हथियार, फिर हुई ट्रोलिंग

Mon, 30 Sep 2019 01:21 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Mon, 30 Sep 2019 01:21 PM IST
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Mehbooba Mufti tweets Kashmiri Pandits pain is now a weapon in hands of rightwing extremists
महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री व पीडीपी मुखिया महबूबा मुफ्ती के ट्विटर अकाउंट के जरिए सोमवार को उनकी बेटी इल्तिजा ने कहा कि 1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन का दर्द वर्तमान समय में दक्षिणपंथी संगठनों के लिए हथियार बना हुआ है। इल्तिजा ने लिखा कि कश्मीरी मुसलमानों को 1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए गलत तरीके से जिम्मेदार ठहराया जाता है। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपिता गांधी की विचारधारा का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि गांधी की परिकल्पना वाला धर्मनिरपेक्ष भारत अब एक निरंकुश शासन में बंधक बन चुका है। इस ट्वीट के बाद इल्तिजा को काफी ट्रोल होना पड़ा। लोगों ने इस ट्वीट को लेकर उन्हें काफी खरीखोटी सुनाई।

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1990-घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन

19 जनवरी, इतिहास के पन्नों में यह तारीख घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के दिन के रूप में दर्ज है। 90 के दशक में कश्मीर से पंडितों का विस्थापन शुरू हुआ था। जेहादी कट्टरपंथियों के जुल्म ने उन्हें घर छोड़ने को मजबूर कर दिया।


उस डरावनी रात को सोचकर आज भी कश्मीर पंडित सिहर उठते हैं। वर्ष 1985 के बाद से कश्मीरी पंडितों को कट्टरपंथियों और आतंकवादियों से लगातार धमकियां मिलने लगीं। आखिरकार 19 जनवरी 1990 को कट्टरपंथियों ने 4 लाख कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया।

कश्मीर से भागे सैंकड़ों पंडितों ने फरीदाबाद में शरण ली। सेक्टर दो, तीन, 55, 37, 14, 15 में ऐसे 12 सौ से ज्यादा परिवार हैं, जो आज भी 1990 के मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। सोपोर कस्बे में स्टेशनरी और सेबों के थोक विक्रेता रहे पंडित परिवार अब एक कमरे के मकान में रहते हैं।

चरमपंथियों ने ऐसा तनाव पैदा किया कि पड़ोसी भी दुश्मन हो गए

जबकि कस्बे में उनके 30 एकड़ जमीन में सेब के बागान थे, चार मंजिला मकान था, किराएदार थे। लेकिन आंतकवादियों ने सब बर्बाद कर दिया। बताया कि जब आंतकवादियों ने हमला किया तो घर का दरवाजा नहीं खुला। छह महीने के बेटे अमित और उसकी मां को जमीन के नीचे तहखाने में छुपाया।

उस रात रिश्तेदार कन्हैयालाल को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। सेक्टर तीन में बंसीलाल और कृष्णा कौल अपने पूरे परिवार के साथ रैनाबारी में रहते थे। 1990 में चरमपंथियों ने ऐसा तनाव पैदा किया कि पड़ोसी भी उनके दुश्मन हो गए।

बड़े भाई मोतीलाल कौल को छह गोली मारकर हत्या करने का प्रयास किया। लेकिन वे बच गए। धमकी दी गई कि पूरा परिवार कश्मीर छोड़ दे। दस दिनों के भीतर ही परिवार को कश्मीर घाटी छोड़नी पड़ी। घर-बार, सामान सब पीछे छूट गया।

जब बच्चियों की इज्जत लूटने की बात सुनी तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई

दो कपड़ों में बिना चप्पल पहने ही कौल परिवार ने रात के घने अंधेरे में घर छोड़ दिया। जैसे-तैसे जम्मू पहुंचे, जहां से एक फौजी की मदद से शहर आ गए। इसके बाद कभी कश्मीर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। कृष्णा ने बताया कि कपड़े खरीदने के लिए उसने अखबार बेचा। उन्हें बेचकर तीसरा कपड़ा खरीदा।

उन्होंने बताया कि जब बच्चियों की इज्जत लूटने की बात सुनी, तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। वहीं एक कश्मीरी पंडित ने बताया कि आज भी वह पल याद है कि किस तरह उन्हें अपने ही घर से निकाल दिया गया था। आंखों के सामने ही लोगों को जिंदा जला दिया गया था।

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