सजने लगे अखड़े: प्रकृति, प्रेम और परंपरा का पर्व करम, झारखंड में अंतिम चरण में तैयारियां; जानें क्यों है खास?
झारखंड में प्रकृति, भाई-बहन के प्रेम और सामुदायिक एकता का प्रतीक करम पर्व मनाने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। रांची समेत राज्य के विभिन्न जिलों में अखड़ों की साफ-सफाई, करम डाली की व्यवस्था और पारंपरिक गीत-संगीत व नृत्य की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।
विस्तार
प्रकृति, हरियाली, भाई-बहन के प्रेम और सामुदायिक एकता का प्रतीक करम पर्व झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पर्व केवल झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और देश के अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। हालांकि, झारखंड में करम पर्व की सांस्कृतिक पहचान और व्यापकता विशेष रूप से मजबूत है। राजधानी रांची समेत राज्य के विभिन्न जिलों में अखड़ों की साफ-सफाई, करम डाली की व्यवस्था, पारंपरिक वेशभूषा, गीत-संगीत और नृत्य की तैयारियां अंतिम चरण में हैं।
खूंटी विधानसभा क्षेत्र के झामुमो विधायक राम सूर्या मुंडा ने कहा कि करम पर्व पूरी तरह प्रकृति से जुड़ा पर्व है। करम डाली को अखड़े में स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। महिलाएं और युवतियां व्रत रखती हैं और पूजा के बाद रातभर मांदर की थाप पर पारंपरिक गीत और नृत्य का आयोजन होता है। धान रोपनी के बाद आने वाले प्रमुख पर्वों में करम पर्व का विशेष महत्व है। मान्यता है कि अविवाहित युवक करम पेड़ पर चढ़कर डाली लाता है और महिलाएं उसकी पूजा करती हैं।
रांची नगर निगम के वार्ड 34 के पार्षद अजीत कच्छप ने कहा कि शहर और गांव में करम पर्व मनाने की परंपरा में कुछ अंतर जरूर है। गांवों में जहां मांदर की थाप और पारंपरिक नृत्य प्रमुख होता है, वहीं शहरों में डीजे का चलन बढ़ा है। उन्होंने कहा कि दोनों जगहों पर पर्व का उत्साह देखने लायक होता है।
ये भी पढ़ें- यूपी में मारा गया झारखंड का मोस्ट वांटेड: टीपीसी कमांडर बृजेश गंझू मुठभेड़ में ढेर, दो पुलिसकर्मी बाल-बाल बचे
राज्यसभा सांसद बैद्यनाथ राम ने कहा कि करम पर्व झारखंड के साथ बिहार समेत कई राज्यों में मनाया जाता है। अब दिल्ली जैसे महानगरों में भी लोग इस पर्व का आयोजन कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं। उन्होंने कहा कि गांवों में करम पेड़ के पास पूजा और करम डाली को घर या अखड़े में स्थापित करने की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र होती है।
खूंटी के मुरहू प्रखंड उप प्रमुख अरुण साबू ने करम पर्व को भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जोड़ते हुए कहा कि बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं। वहीं, राजद नेता गौरीशंकर यादव ने इसे प्रकृति को समर्पित लोकपर्व बताते हुए कहा कि करम की तीन डालियों को सम्मानपूर्वक लाकर अखड़े के बीच स्थापित किया जाता है। इसके बाद सामूहिक पूजा और पारंपरिक नृत्य-गीत का आयोजन होता है।
ये भी पढ़ें- बिहार: आधी रात कमरे में लगी आग, जली मिली 60 वर्षीय महिला की लाश; नशेड़ी कलयुगी बेटे पर हत्या का आरोप
यूथ कांग्रेस नेता राज उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज के अधिकांश पर्व प्रकृति और अच्छी फसल की कामना से जुड़े हैं। करम पर्व में भी भाई-बहन के प्रेम के साथ बेहतर स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। व्रत रखने के बाद करम डाली की पूजा की जाती है और फल-फूल से पर्व की शुरुआत होती है। गांवों में इसकी पारंपरिक छटा आज भी विशेष रूप से देखने को मिलती है, जबकि रांची जैसे शहरों में भी करम पर्व का स्वरूप लगातार व्यापक हो रहा है।