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Jharkhand News: मोरहाबादी मैदान में टुसू महोत्सव की भव्य प्रस्तुति, राज्यपाल संतोष गंगवार हुए शामिल

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची Published by: राँची ब्यूरो Updated Tue, 13 Jan 2026 08:20 PM IST
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सार

Ranchi News: रांची के मोरहाबादी मैदान में कुरमाली भाषा परिषद ने टुसू महोत्सव का आयोजन किया। राज्यपाल संतोष गंगवार समेत कई अतिथियों की मौजूदगी में चौड़ोल, लोकगीत और नृत्य के जरिए झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रदर्शन हुआ।

Ranchi News: Grand Presentation of Tusu Festival at Morhabadi Ground, Governor Santosh Gangwar Participated
टुसू महोत्सव का उद्घाटन करते राज्यपाल संतोष गंगवार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राजधानी रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में मंगलवार को टुसू पर्व की भव्य झलक देखने को मिली। कुरमाली भाषा परिषद के तत्वावधान में आयोजित टुसू महोत्सव में झारखंड के विभिन्न जिलों से लोग रंग-बिरंगे, गुंबदनुमा और कलात्मक चौड़ोलों के साथ पहुंचे। सबसे ऊंचे और आकर्षक चौड़ोल को सजाने की प्रतिस्पर्धा दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी रही। टुसू गीतों, ढोल-नगाड़ों और लोकसंगीत की गूंज से पूरा मैदान उत्सवमय हो उठा।

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राज्यपाल और विशिष्ट अतिथियों की रही उपस्थिति
महोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में राज्यपाल संतोष गंगवार शामिल हुए। इस अवसर पर केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, राज्यसभा सांसद महुआ माजी, पूर्व सांसद शैलेन्द्र महतो सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। अतिथियों ने महोत्सव के आयोजन की सराहना करते हुए झारखंड की लोकसंस्कृति को जीवंत बताया।
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प्रकृति और फसल से जुड़ा पर्व
राज्यपाल संतोष गंगवार ने अपने संबोधन में कहा कि टुसू पर्व प्रकृति और नई फसल से जुड़ा हुआ त्योहार है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि जब देश के अन्य हिस्सों में मकर संक्रांति तिल-गुड़ और दान-पुण्य के रूप में मनाई जाती है, तब झारखंड का ग्रामीण और आदिवासी समाज बलिदान की स्मृति में टुसू पर्व मनाता है। उनके अनुसार टुसू केवल एक पर्व नहीं, बल्कि झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है।
 
संस्कृति और परंपरा से जुड़ाव पर दिया गया जोर
केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कहा कि आज टुसू, मकर संक्रांति और लोहड़ी जैसे पर्व एक साथ मनाए जाते हैं। उन्होंने इसे धान, धन और महिला सशक्तीकरण से जुड़ा उत्सव बताया। चौड़ोलों की भव्यता की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि फसल कटने और खलिहान भरने के बाद टुसू के रूप में उल्लास मनाया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि जो समाज अपनी भाषा, भेष-भूषा और परंपराओं को छोड़ देता है, वह न आगे बढ़ता है और न ही उसकी संस्कृति समृद्ध होती है।

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हर वर्ष आयोजित होता है टुसू महोत्सव
कुरमाली भाषा परिषद के अध्यक्ष डॉ. राजाराम महतो ने बताया कि हर वर्ष मोरहाबादी मैदान में टुसू महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इसमें झारखंड के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं। टुसू की पूजा-अर्चना के बाद चौड़ोलों के साथ पारंपरिक गीत और नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
 
महोत्सव के दौरान प्रस्तुत लोकनृत्य और टुसू गीतों ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। पूरे आयोजन में झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सजीव रूप में नजर आई और उत्सव का माहौल देर तक बना रहा।

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