दशहरा 2026: विजयादशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले का दहन क्यों होता है? जानें मान्यता
Dussehra 2026: दशहरे पर रावण दहन की परंपरा सदियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ी है। मान्यता है कि विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया था।
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Ravana Kumbhakarna And Meghnad Dahan History: विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व देशभर में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले तैयार किए जाते हैं और रामलीला के मंचन के बाद उनका दहन किया जाता है। रावण दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं और पूरा माहौल जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दशहरे पर रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी क्यों जलाए जाते हैं? आइए, जानते हैं इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और परंपरा का महत्व।
रामायण की कथा के अनुसार, लंकापति रावण ने माता सीता का हरण कर उन्हें लंका में बंदी बना लिया था। माता सीता को मुक्त कराने के लिए भगवान श्रीराम ने वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण किया। इस युद्ध में रावण की ओर से लड़ने वाले उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद का भी वध हुआ। अंततः भगवान श्रीराम ने रावण का अंत कर माता सीता को मुक्त कराया। इस घटना को धर्म की अधर्म पर और अच्छाई की बुराई पर विजय के रूप में देखा जाता है। इसी मान्यता के प्रतीक के तौर पर हर साल दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है।
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कुंभकर्ण और मेघनाद के दहन का कारण
कुंभकर्ण और मेघनाद भी रामायण की कथा के प्रमुख पात्र हैं। कुंभकर्ण, रावण का भाई था, जो अपनी विशाल काया और लंबे समय तक सोने के लिए प्रसिद्ध था। लंका युद्ध के दौरान वह रावण की ओर से युद्ध में उतरा, लेकिन अंततः भगवान श्रीराम के हाथों मारा गया। वहीं, मेघनाद, जिसे इंद्रजीत के नाम से भी जाना जाता है, रावण का शक्तिशाली पुत्र था। उसने युद्ध में अपनी मायावी शक्तियों और युद्ध कौशल का इस्तेमाल किया, लेकिन अंत में लक्ष्मण ने उसका वध कर दिया। दशहरे पर इन दोनों के पुतलों का दहन भी रामायण में धर्म की विजय और अधर्म के अंत की कथा को दर्शाता है।
रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने का तात्पर्य
दशहरे पर रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन केवल रामायण की युद्ध गाथा को याद करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अधर्म और अन्याय के अंत के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण का अहंकार और माता सीता का हरण उसके पतन का कारण बना। वहीं, कुंभकर्ण और मेघनाद ने भी युद्ध में रावण का साथ दिया। इन तीनों के पुतलों का दहन इस संदेश को दर्शाता है कि अहंकार, गलत कार्यों और अधर्म का अंत निश्चित है। यह परंपरा लोगों को सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
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