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PHOTOS:यहां मिली है नवपाषाण काल की सभ्यता, जानिए क्या निकला है खुदाई में
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Wed, 11 Oct 2017 10:01 AM IST
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चित्रकूट में खुदाई
चित्रकूट में चल रही खुदाई में नवपाषआण काल की कई वस्तुएं निकल रहीं हैं। जिससे यह पुख्ता हो गया है कि मध्य गंगा घाटी की तरह थी बुंदेलखंड भूभाग की सभ्यता ।
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चित्रकूट में खुदाई के दौरान निकल रहीं है अजीबोगरीब चीजें
गोस्वामी तुलसीदास की जन्मस्थली के रूप में पहचाने जाने वाले राजापुर क्षेत्र के संडवावीर, समोगरी गांव में पुरातत्व विभाग एवं डॉ.शकुंतला देवी मिश्र पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ के इतिहास विभाग की निगरानी में खुदाई चल रही है। यहां पुरा पाषाण काल से लेकर चंदेलकालीन सामग्री मिली है।
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चित्रकूट में खुदाई के दौरान निकल रहीं है अजीबोगरीब चीजें
संडवावीर, समोगरी और उरदाइन मंदिर के पास हुई खुदाई में मिले अवशेष कुछ समय पहले कौशांबी और इलाहाबाद के श्रंगवेरपुर में खुदाई के दौरान मिले अवशेष से मिलते जुलते हैं। इस आधार पर इतिहासकारों का मानना है कि मध्य गंगा घाटी और बुंदेलखंड की सभ्यता एक समान रही होगी। इसका विस्तृत अध्ययन करने के लिए सोमवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के प्रो.एमसी गुप्ता और शोधार्थी रजनीश सोनी भी खनन स्थल पर पहुंचे।
चित्रकूट में खुदाई के दौरान निकल रहीं है अजीबोगरीब चीजें
इन्होंने सोमवार को खनन में मिले पानी रखने के मिट्टी के बर्तन और माला के प्रयोग होने वाली मोती के समान अवशेष (मनका), हड्डी से बनी मोतीनुमा माला, हड्डी के औजार आदि को बारीकी से परखा। इस दौरान चित्रकूट एसपी प्रताप गोपेंद्र ने भी खुदाई में मिली सामग्री के बारे में जानकारी ली। खुदाई में लगी टीम में शामिल डॉ.रामनरेश पाल, डॉ.ब्रजेश रावत, बीके खत्री, वीरेंद्र शर्मा, राजेश कुमार व शिवप्रेम आदि का कहना है कि पूरे बुंदेलखंड के क्षेत्र में इसी तरह की कुछ और सामग्री मिली है।
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चित्रकूट में खुदाई के दौरान निकल रहीं है अजीबोगरीब चीजें
क्या है कालखंड में समानता
राजापुर के कलवलिया में मौजूद डॉ.शकुंतला देवी मिश्र पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर बृजेश रावत ने बताया कि पाषाण काल के तीन भाग हैं। पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल व नवपाषाण काल। इस क्षेत्र में अभी तक नवपाषाण काल, ताम्रपाषाण काल एवं ऐतिहासिक काल से जुड़े अवशेष मिल रहे हैं। ताम्र पाषाण काल (5000- 7000 ईसा पूर्व) में पत्थर के उपकरण, उसके बने हथियार इनमें उकरे गए चित्र, तांबे व कुछ अन्य धातु के सामान के अलावा काली चिकनी मिट्टी प्रयुक्त होती थी। नव पाषाण काल (7000 - 10000 ईसा पूर्व) में मिट्टी के बर्तन, हाथ के बने बर्तन, अधजले बर्तन व खुरदुरे बर्तन प्रयोग होते थे। इन दोनों काल के बाद के समय को ऐतिहासिक काल माना गया है। इसमें उपकरण आदि के अलावा यदि लिपि पठनीय हुई तो इसी काल के अंतर्गत माना जाता है। पाषाण काल में तो लिपि का अविष्कार ही नहीं हुआ था।
राजापुर के कलवलिया में मौजूद डॉ.शकुंतला देवी मिश्र पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर बृजेश रावत ने बताया कि पाषाण काल के तीन भाग हैं। पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल व नवपाषाण काल। इस क्षेत्र में अभी तक नवपाषाण काल, ताम्रपाषाण काल एवं ऐतिहासिक काल से जुड़े अवशेष मिल रहे हैं। ताम्र पाषाण काल (5000- 7000 ईसा पूर्व) में पत्थर के उपकरण, उसके बने हथियार इनमें उकरे गए चित्र, तांबे व कुछ अन्य धातु के सामान के अलावा काली चिकनी मिट्टी प्रयुक्त होती थी। नव पाषाण काल (7000 - 10000 ईसा पूर्व) में मिट्टी के बर्तन, हाथ के बने बर्तन, अधजले बर्तन व खुरदुरे बर्तन प्रयोग होते थे। इन दोनों काल के बाद के समय को ऐतिहासिक काल माना गया है। इसमें उपकरण आदि के अलावा यदि लिपि पठनीय हुई तो इसी काल के अंतर्गत माना जाता है। पाषाण काल में तो लिपि का अविष्कार ही नहीं हुआ था।
