आठ सौ साल पहले जिस अशोक स्तंभ को फिरोजशाह तुगलक यमुनानगर से उठाकर दिल्ली ले गया था। वो आज फिर बनकर तैयार हो गया है। लेकिन इसमें एक खास बात है। ये अशोक चक्र देश का सबसे बड़ा चक्र है। इसे 12 कारीगरों ने छह महीने में तैयार किया और कई लाख लागत भी आई। क्लिक कर पढ़ें क्या है खास बातें...
यहां बना देश का सबसे बड़ा अशोक चक्र, छह महीने में रंग लाई 12 कारीगरों की मेहनत...ये हैं खास बातें
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अशोक चक्र का निर्माण हरियाणा के यमुनानगर में हुआ है। यहां के टोपरा कलां गांव के लोग उसे वापस तो नहीं ला सकें, लेकिन 45 लाख की लागत से इसका धर्म चक्र बना दिया। अशोक स्तंभ में होने की वजह से धर्म चक्र को अशोक चक्र के नाम से जाना जाता है। 30 फीट ऊंचा सुनहरे रंग का यह चक्र अशोका इडिक्ट पार्क में आठ फीट ऊंचे प्लेटफार्म पर स्थापित कर दिया गया है।
ग्राम पंचायत व दी बुद्धिस्ट फोरम ने 12 कारीगरों द्वारा छह महीने में इसे तैयार करवाया है। ग्रामीणों के जज्बे को देखते हुए हाल ही में प्रदेश के टूरिज्म डिपार्टमेंट ने अशोका इडिक्ट पार्क विकसित करने के लिए दो करोड़ रुपए की ग्रांट भी मंजूर की है।
24 तिल्ली वाले इस धर्म चक्र का पांच जनवरी को विधिवत रूप से उद्घाटन किया जाएगा। उद्घाटन कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद डॉ. सुभाषचंद्र, प्रदेश के टूरिज्म मंत्री रामबिलास शर्मा समेत कई बड़ी हस्तियां पहुंचेंगी।
एनआरई डॉक्टर का आइडिया
दरअसल दी बुद्धिस्ट फोरम के सदस्य डॉक्टर सत्यदीप नील गौरी फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं और वहां डेंटिस्ट हैं। उनके मन में अशोक चक्र स्थापित करने का विचार आया। इंजीनियर अनिल कुमार ने इसे बनाने की हामी भरी और कई प्रयोग के बाद इसे बनाया।
बौद्ध दर्शनशास्त्र के अनुसार धर्म चक्र की 24 तिल्लियों में 12 मन को काबू में करने का प्रतिनिधित्व करती हैं। 12 कर्म और आचार व्यवहार को दर्शाती हैं। यह अध्यात्म और त्याग का संदेश देती हैं। इसे नार्थ-साउथ मेग्नेटिक फील्ड ग्रेविटी के हिसाब से रखा गया है।
खासियतें
- 6 टन लोहा और 3 टन अन्य सामग्री।
- अब तक 45 लाख रुपए खर्च हुए।
- लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज कराने की तैयारी।
- गोल्डन कलर से पेंट कर लेमिनेट किया है।
अशोक स्तंभ ऐसे ले जाया गया दिल्ली
गांव साबापुर निवासी और गोल्ड इंडिया लेमिनेशन के फाउंडर रोशनलाल कंबोज ने बताया कि सम्राट अशोक ने 2300 साल पहले गुजरात की गिरनार की पहाड़ियों में इस स्तंभ को बनवा कर टोपरा कलां में स्थापित किया था। जिसकी लंबाई 42 फीट व चौड़ाई 2.5 फीट थी। इस पर प्राचीन ब्राह्मी लिपी और प्राकृत भाषा में लिखी गई उनकी सात राजाज्ञाएं खुदी हुई हैं।
देश का यह एकमात्र स्तंभ है, जिस पर सात राजाज्ञाएं खुदी हुई हैं। 1453 में फिरोजशाह तुगलक जब टोपरा कलां में शिकार के लिए आए तब उसकी नजर इस स्तंभ पर पड़ी। इतिहासकार श्यामे सिराज ने लिखा है कि यमुना के रास्ते इस स्तंभ को दिल्ली ले जाने के लिए एक बड़ी नाव तैयार की गई।