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Bhuj The Pride Of India Review: सस्ते वीडियो गेम जैसी फिल्म से लगा अजय देवगन के नाम पर बट्टा
बीते साल कोरोना संक्रमण से पहले रिलीज हुई फिल्म ‘तानाजी द अनसंग वॉरियर’ जिस एक चीज के लिए बरसों बरस मिसाल के तौर पर याद की जाएगी, वह हैं इसके विजुअल इफेक्ट्स। इन्हें बनाने वाली कंपनी अजय देवगन की ही है, एनवाई वीएफएक्स वाला। इसी कंपनी ने फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ के विजुअल इफेक्ट्स भी तैयार किए हैं। फर्क बस फिल्म के निर्देशक का है। टीवी पर हजारों एपिसोड्स बना चुके मुकेश दुधैया उर्फ अभिषेक दुधैया ने अपनी डेब्यू फिल्म में जो किया है, उसके लिए अजय देवगन के फैंस उन्हें अरसे तक माफ नहीं करेंगे। देशभक्ति, दिलेरी और धरती का दम दिखाने वाली एक अच्छी खासी कहानी का उन्होंने चार चार पटकथा लेखकों के चलते पूरा गुड़ गोबर कर दिया है। कम लोगों को ही पता होगा कि भुज की जिस हवाई पट्टी को रातों रात बनाकर भारतीय वायुसेना का विमान वहां उतारने के लिए भुज एयरबेस के इंचार्ज स्क्वॉड्रन लीडर विजय कार्णिक ने आसपास के गावों की महिलाओं की मदद ली थी, उसे पूरा गोबर से लीपा गया था ताकि पाकिस्तानी विमानों को आसमान से नजर ना आ सके। हालांकि, फिल्म में ऐसा कुछ नहीं दिखाया गया है और शुरू में इस बात का जिक्र भी है कि फिल्म ऐतिहासिक घटनाओं का वास्तविक चित्रण नहीं है।
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फिल्म- भुज द प्राइड ऑफ इंडिया
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ से अजय देवगन के फैंस को काफी उम्मीदें रही हैं। पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर रिलीज होने के लिए तैयार हो रही फिल्म साल भर बाद उसी मौके पर रिलीज तो हुई लेकिन इस बीच इसके नमक से आयोडीन उड़ चुका है। बड़ी फिल्मों को सीधे ओटीटी पर रिलीज करने के डिज्नी प्लस हॉटस्टार के पिछले साल घोषित उपक्रम ‘फर्स्ट डे फर्स्ट शो की होम डिलीवरी’ की पहली सीरीज की ये आखिरी फिल्म है। इस सीरीज की अधिकतर फिल्मों का हश्र ऐसा ही रहा सिवाय ‘लूटकेस’ और ‘बिग बुल’ के। सीरीज की दो फिल्मों ‘सड़क 2’ और ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ में संजय दत्त दिखे और दोनों फिल्में औसत से भी खराब फिल्में रहीं। फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ को कुछ देर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी देखा और अजय देवगन को ‘भविष्य’ के लिए शुभकामनाएं दीं। फिल्म का वर्तमान शायद उनको भी अच्छा नहीं लगा।
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भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ अच्छी है भी नहीं। एक तो किसी फिल्म की कहानी जब इसके हीरो को सुनानी पड़े तो पटकथा की कमजोरियों का पर्दाफाश वहीं हो जाता है। फिल्म के निर्देशक शुरू के चालीस मिनट तक तो समझ ही नहीं पाते कि फिल्म को किस करवट बिठाना है और इस चक्कर में झूला झूलती फिल्म हाथ से निकल जाती है। भुज की हवाई पट्टी के जिस मूल कथानक पर फिल्म बनी है, वह फिल्म के आखिरी चालीस मिनट में है और उसके बाद भी फिल्म बहुत बचकानी लगती है। फिल्म ‘शेरशाह’ की तरह यहां भी दिक्कत वही है कि निर्माताओं को देशभक्ति के तड़के से फिल्म बेचनी है। लेकिन, देशभक्ति का तड़के के मसाले हर बार एक जैसे नहीं हो सकते। फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ देखने के बाद तो शेरशाह भी बेहतर फिल्म लगने लगी है।
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भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अजय देवगन की फिल्म ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ अपने पहले शॉट से ही खराब वीएफएक्स के चलते पकड़ खो देती है। फिल्म अभिनय के लिहाज से भी अच्छी नहीं है। नोरा फतेही का पूरा का पूरा ट्रैक देखकर यूं लगता है कि टी सीरीज ने फिल्म में पैसा सिर्फ इसी हिस्से के लिए लगाया है। वह आइटम नंबर के लिए ठीक हैं। एक्टिंग उनके बस की बात अभी नहीं है। यही हाल प्रणिता सुभाष का है। मराठी हीरो के पंजाबी गाने में दिखी प्रणिता फिर क्लाइमेक्स में रोलर चलाती दिखती हैं। इधर कुछ फिल्मों से अजय देवगन की पत्नियां बनने वाली नायिकाओं का फुटेज हिंदी सिनेमा में लगातार कम होता जा रहा है। ये एक शोध का विषय भी हो सकता है। हां, सोनाक्षी सिन्हा ने फिल्म में अच्छा काम किया है। गुजराती बाला की बहादुरी दिखाने में भले उन्होंने नकली तेंदुआ परदे पर मारा हो, लेकिन उनके हाव भाव तारीफ के काबिल हैं। शरद केलकर, संजय दत्त, महेश शेट्टी जैसे कलाकारों ने फिल्म की फील्डिंग ठीक से जमा तो ली लेकिन असली पिच ही यहां कमजोर निकली। फिल्म में एमी विर्क ने एयरफोर्स पायलट के तौर पर काम किया है।
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भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म पटकथा, अभिनय, निर्देशन, तकनीकी पक्ष के अलावा अपने संगीत में भी मात खाती है। एक तो 1971 के मराठी नायक पर पंजाबी गाना फिल्माकर ही इसके निर्देशक ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। बाकी रही सही कसर पूरी कर दी है क्लाइमेक्स में बजने वाले इसके बेहद बचकाने गाने ने। कोशिश यहां ‘हकीकत’ के गाने ‘कर चले फिदा जान ओ तन साथियों’ की नकल करने की है लेकिन कैफी आजमी बनने के लिए असल की शायरी पर जिंदा रहना होता है। हां, गांवों की महिलाओं के सामने सुनाई गई कविता अच्छी है। फिल्म को कुल मिलाकर जो एक स्टार मिलता है वह है इसके हीरो अजय देवगन की बहादुरी के लिए कि अपने बेहतरीन दौर में उन्होंने सिर्फ देशभक्ति फिल्म के नाम पर ये फिल्म करने की हिम्मत जुटा ली। अपने हिस्से का काम भी उन्होंने बहुत बढ़िया किया है लेकिन दो घंटे से भी कम की ये फिल्म देखना किसी चुनौती से कम नहीं है।
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