सब्सक्राइब करें

Grahan Review: ‘चौरासी’ के कैनवस पर खिंची सच्ची सी प्रेम कहानी, ‘बमफाड़’ से दो कदम आगे बढ़े चंदेल

Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 24 Jun 2021 06:05 PM IST
विज्ञापन
Grahan Review Hindi by Pankaj Shukla Disney Plus HotStar Zoya Hussain Ranjan Chandel Pawan Malhotra
ग्रहण रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

वेब सीरीज रिव्यू: ग्रहण


लेखक: सत्य व्यास के उपन्यास ‘चौरासी’ पर आधारित
सीरीज लेखक: अनु सिंह चौधरी, नवजोत गुलाटी, विभा सिंह, प्रतीक पयोधी, रंजन चंदेल व शैलेंद्र कुमार झा
कलाकार: जोया हुसैन, अंशुमान पुष्कर, टीकम जोशी, सहीदुर रहमान, वमिका गब्बी और पवन मल्होत्रा आदि।
निर्देशक: रंजन चंदेल
ओटीटी: डिज्नी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: ***

हिंदी लेखकों का भी ओटीटी पर समय आ गया है, ये मैं नहीं सत्य व्यास का लिखा उपन्यास ‘चौरासी’ कह रहा है। शुक्रिया कहना चाहिए निर्माता अजय राय का जिन्होंने चेतन भगत और विक्रम चंद्रा जैसों पर लहालोट रहने वाली मुंबई की फिल्मी दुनिया में हिंदी उपन्यासों की प्रतिष्ठा लौटाई। रंजन चंदेल ने फिल्म ‘बमफाड़’ के बाद फिर बढ़िया काम किया है। वह थोड़ा सतर्क रहें और अपने सहायक बढ़िया चुनें तो उनका सिनेमा बेहतर और फिर बेहतरीन भी हो सकता है। थाने में एसपी के आने से पहले दिखने वाली महिला सिपाही या फिर बैकग्राउंड में घास काटने वाली कैंची लेकर कपड़ा जैसा काटते निकल गए माली के पासिंग शॉट्स खटकते हैं। हालांकि, इनके बाद भी ‘बेताब’ और ‘शोले’ के संदर्भों के साथ शुरू होने वाली वेब सीरीज ‘ग्रहण’ अच्छा मनोरंजन करने में कामयाब रहती है। सीरीज दो धाराओं में एक साथ बहती है और दोनों धाराओं का संगम बनती है इसकी नायिका अमृता सिंह।

Trending Videos
Grahan Review Hindi by Pankaj Shukla Disney Plus HotStar Zoya Hussain Ranjan Chandel Pawan Malhotra
वेब सीरीज ग्रहण का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

वेब सीरीज ‘ग्रहण’ की कहानी साल 2016 और साल 1984 में अलग अलग चलती है। किस्सा एक टीवी जर्नलिस्ट की हत्या से शुरू होता है। पुलिस महकमे में सियासी दखलंदाजी से आगे बढ़ता है। बीच में पुलिस अधीक्षक के कनाडा वाले प्रेमी का मोड़ भी है। लेकिन, हाईवे पर कहानी पहुंचती है जब फील्ड ड्यूटी में रोज रोज की अड़ंगेबाजी से तंग एसपी सिटी इस्तीफा दे देती है और डीआईजी उसे बना देते हैं 1884 के सिख दंगों की फिर से खुली जांच का प्रभारी। रंजन चंदेल ने अनुराग कश्यप स्कूल में फिल्ममेकिंग के पहाड़े सीखे हैं। कहानी भी उन्होंने शैलेंद्र कुमार झा के साथ मिलकर सही चुनी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Grahan Review Hindi by Pankaj Shukla Disney Plus HotStar Zoya Hussain Ranjan Chandel Pawan Malhotra
वेब सीरीज ग्रहण का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

लेकिन, इस सीरीज को बाकी लोगों से पहले दिखाने के लिए डिज्नी प्लस हॉटस्टार ने जो तमाम शर्ते लगाईं, उससे वे डरे हुए दिखे कि कहीं यहां भी कोई 'तांडव' न हो जाए। ओटीटी प्रबंधन को ये लगा होगा कि सीरीज सिख विरोधी दंगों पर है। अमिताभ बच्चन जैसे लुक्स वाला एक युवक सिखों के घरों को बर्बाद करने की शुरूआत करने का बीड़ा उठाता है। सिखों के घरों पर दिन में निशान लगाकर रात में आग लगाई जाती है। तो पंगा हो सकता है। लेकिन, परदे पर ये सब झारखंड में हो रहा है 1984 में और झारखंड बना ही है साल 2000 में। यानी मामला सब काल्पनिक है लेकिन सत्य व्यास ने दो कालखंडों को लेकर कहानी इतनी सच्ची बुनी है कि सीरीज देखने के बाद उसे पढ़ने की भी इच्छा जाग उठी है।

Grahan Review Hindi by Pankaj Shukla Disney Plus HotStar Zoya Hussain Ranjan Chandel Pawan Malhotra
वेब सीरीज ग्रहण का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

वेब सीरीज ‘ग्रहण’ का कैनवास थोड़ा विशाल होता है तो ये सीरीज ‘मिर्जापुर’ से आगे निकलने का माद्दा रखती है। एरियल शॉट में 1984 का बोकारो दिखाते समय छतों पर पुराने वाले टीवी एंटीना भी दिखते तो सीरीज देखने का आनंद दूना होता। यहां समझने वाली बात ये भी है कि कहानी बिहार या झारखंड में घट रही हो तो हर किरदार को लालू प्रसाद यादव वाली टोन में बोलना जरूरी नहीं है। बिहार व झारखंड के लोग भी अच्छी खड़ी बोली बोल सकते हैं, जैसे रघु छत पर मुन की देह का स्पर्श पाते ही बोल पड़ता है। इन तमाम कमजोर कड़ियों के बावजूद आम दर्शकों के लिए वेब सीरीज इस सप्ताहांत का अच्छा बिंज वॉच है। करीब सात घंटे में पूरे होते आठ एपीसोड बीच में थोड़ा ढीले भी पड़ते हैं लेकिन मांझा छोटा हो और सद्दी पर ही पतंग उड़ानी हो तो अच्छे पंतगबाज पतंग ऊंची ले जाकर ढील देते ही हैं।

विज्ञापन
Grahan Review Hindi by Pankaj Shukla Disney Plus HotStar Zoya Hussain Ranjan Chandel Pawan Malhotra
वेब सीरीज ग्रहण का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

अभिनय के मामले में ये सीरीज जोया हुसैन, अंशुमान पुष्कर और पवन मल्होत्रा की है। पवन मल्होत्रा शिथिल होकर जब भी अभिनय करते हैं, जमते हैं। अकड़ना अब उनको रास नहीं आता। बेटी के साथ बैठकर बीयर पीने वाली पिता के रूप में भी वह अच्छे लगे और बेटी के सामने आए धर्मसंकट के कृष्ण बने भी। जोया हुसैन को पल भर में चेहरे के भाव बदल लेना खूब आता है। यही एक अच्छे कलाकार की निशानी भी होती है। जोया हुसैन का अभिनय कुदरती है। ‘मुक्काबाज’ में उन्हें अनुराग कश्यप की शिष्या के तौर पर ज्यादा परखा गया। यहां वह अपनी खुद की लय में हैं। कद काठी के हिसाब से रोल भी उन पर जमता है। वह हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में शामिल हैं जिन पर अनुराग के राग का ठप्पा लगना नुकसानदेह रहा। अंशुमान पुष्कर ने यहां काम अच्छा किया है लेकिन उनका पहलवानों वाला डील डौल कहीं कहीं अखरता भी है। उनके संवादों पर भी अलग से काम हो सकता था। कुछ नहीं तो संवादों की एक वर्कशॉप तो जरूरी ही थी।

अगली फोटो गैलरी देखें
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें Entertainment News से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। मनोरंजन जगत की अन्य खबरें जैसे Bollywood News, लाइव टीवी न्यूज़, लेटेस्ट Hollywood News और Movie Reviews आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed