Trailer Review: गुलाबो सिताबो
कभी लखनऊ गए हैं आप? या फिर किसी टिपिकल लखनऊ वाले भैया से आपका पंगा हुआ हो कभी? अगर जवाब हां है तो फिर तो पता ही होगा। नहीं है तो हम बताए देते हैं। लखनऊ में हर काम तसल्लीबख्श होता है और काम अगर बेइज्जती करने का हो तो फिर तो बहुत ही नफासत के साथ किया जाता है। आपको पता भी नहीं चलता कि सामने वाला आपकी आरती उतार रहा है या वाकई आपकी आरती उतार दी गई।
बस कुछ कुछ ऐसे ही ये दोनों। बोले तो मिर्जा और बांके। फिल्म गुलाबो सिताबो के दो चूहे बिल्ली जैसे प्राणी। गुलाबो सिताबो दरअसल 30-40 साल पहले तक उत्तर प्रदेश के गांवों, कस्बों और शहरों तक में होता रहा एक तमाशा है। गर्मियों की तपती दोपहर के बाद सांझ ढलते ही तमाशा दिखाने वाले डमरू बजाते, बच्चे जुटाते और शुरू हो जाता खेल। बाजीगर एक हाथ में गुलाबो वाली कठपुतली पहनता और दूसरे हाथ में सिताबो वाली। खेल होता, गुलाबो खूब लड़ीं, सिताबो खूब लड़ीं। लकड़ी के बने दोनों के हाथ एक दूसरे की कनपटी पर बजते तो एक अलग ही ताल बनती दिखाई देती।
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शूजीत सरकार की निर्देशन बगिया में ये कहानी जूही चतुर्वेदी ने खिलाई है। इससे पहले की पांच फिल्में जो जूही ने लिखी हैं, उनमें से स्काई इज पिंक को छोड़ बाकी चारों के निर्देशक शूजीत ही रहे। दोनों का दोस्ताना विकी डोनर से शुरू होकर गुलाबो सिताबो तक पहुंचा है। गुलाबो सिताबो के खेल में पूरा फोकस दो गज की दूरी में रहता है। सो ट्रेलर भी वैसा ही है, एक पुरानी हवेली में रहने वाले किराएदारों और हवेली के मालिक मिर्जा में होती नोंकझोंक ही कहानी का असल रस है।
फिल्म गुलाबो सिताबो के अभिनेता दोनों रसीले हैं, अमिताभ बच्चन भी और आयुष्मान खुराना भी। फारुख जफर भी हैं साथ में, चौथपन में बालों में मेहंदी लगवातीं। ट्रेलर के लिहाज से 12 जून को तमाम घरों में खाना बनता नहीं दिखता। स्विगी और जोमैटो तब तक शायद स्पीड पकड़ लेंगे। आपके यहां होम डिलीवरी न हो तो एडवांस में पराठे बनवा कर रख सकते हैं। पॉपकॉर्न वगैरह भी कुकर में भून के सेट हो जाइए। मजा आने वाला है।