मई महीने की चिलचिलाती गर्मी और बिना एसी वाले सिनेमाघर और उसमें बत्ती चली जाए तो कूलर बंद। प्रोजेक्टर चलाए रखने भर को बिजली पैदा करने वाला जनरेटर और फिल्म अमिताभ बच्चन की। ये किस्सा कोई एक दो बार का नहीं है। अमिताभ बच्चन की फिल्मों के लिए मई महीना शुरू से मुफीद माना गया। आप खुद बाइस्कोप में अब तक अमिताभ बच्चन की मई महीने में रिलीज हुई फिल्मों त्रिशूल, जंजीर, शराबी और सूर्यवंशम के बारे में पढ़ चुके हैं। नसीब, डॉन और अमर, अकबर, एंथनी ने भी मई की तपती दोपहरी में ही सिनेमाघरों के बाहर टिकट लेने के लिए लाइनें लगवाईं हैं।
बाइस्कोप: जानिए परवीन बाबी की जगह कैसे 'लावारिस' में आईं जीनत अमान, और राखी की होते होते बची छुट्टी
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फिल्म लावारिस ने साल 1981 में कमाल का कलेक्शन किया लेकिन उस साल कलेक्शन के लिहाज से नंबर वन फिल्म थी, मनोज कुमार की क्रांति। मल्टीस्टारर नसीब नंबर दो पर थी और जीतेंद्र की मेरी आवाज सुनो का रहा तीसरा नंबर। लावारिस का नंबर इसके बाद आता है। इसी साल रिलीज हुईं अमिताभ बच्चन की फिल्में कालिया और याराना भी हिट रहीं। लेकिन अगले साल हुए फिल्मफेयर पुरस्कारों में एक भी पुरस्कार अमिताभ बच्चन को नहीं मिला। प्रकाश मेहरा ने फिल्म की कहानी खुद लिखी थी और इसमें काफी कुछ मसाला उन्होंने अपनी जिंदगी का भी डाला। प्रकाश मेहरा अक्सर अपने पिता के किस्से लोगों को सुनाया करते। अपने पिता से प्यार न मिलने का इतना गहरा असर प्रकाश मेहरा पर रहा कि वह इस किस्से को अपनी फिल्मों में घुमा फिराकर कई बार दोहराते रहे। उनकी आखिरी हिट फिल्म शराबी की भी यही कहानी रही।
लावारिस कहानी है एक अनाथ हीरा की। रणवीर सिंह को विद्या से प्यार है। विद्या के पेट में हीरा होता है तो उसे रणवीर सिंह उसके हाल पर छोड़ देता है। विद्या जिस बच्चे को जन्म देती है उसे उसका भाई मरा हुआ बता देता है। जिस गंगू को बच्चा ठिकाने लगाने के लिए मिलता है वह उसे पाल लेता है। हीरा बड़ा होता है और उसे पता चलता है कि वह लावारिस है। उसकी जिंदगी में मोहिनी आती है। और, महेंद्र सिंह से वह दूसरों के लिए पंगा लेने को तैयार होता दिखता है। रणवीर फिर कहानी में लौटता है। हीरा और उसकी पटरियां समांतर होने पाएं उससे पहले महेंद्र फिर कैंची काट देता है। धींगामस्ती होती है। पकड़ धकड़ होती है। जूतमपैजार और लात-घूंसे चलने के बाद कहानी द एंड के स्टेशन पर पहुंचती है, जहां सब कुछ ठीक ठाक हो ही जाता है।
फिल्म में अमिताभ बच्चन तो अपने फुलटू मूड में नजर आए हैं, जीनत अमान अपने करियर में इतनी नमकीन या तो यहां या फिर वहां हुई हैं जहां अमिताभ बच्चन फिल्म पुकार में गाना गाते हैं, समंदर में नहाके और भी नमकीन हो गई हो। लेकिन, आपको शायद पता न हो कि जीनत अमान इस फिल्म की सेकंड च्वाइस हीरोइन रहीं। फिल्म में हीरोइन तो पहले प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन की सिफारिश पर परवीन बाबी को ही लिया था, लेकिन परवीन बाबी का ये वो दौर था जब वह कुछ भी, कहीं भी, किसी के भी सामने बोल देती थीं। उनकी इस बिगड़ती मानसिक दशा और दिशा को देखते हुए अमिताभ बच्चन ने फिल्म लावारिस का पहला शेड्यूल परवीन बाबी के साथ शूट हो जाने के बावजूद जीनत अमान को इस फिल्म के लिए साइन करा दिया। प्रकाश मेहरा ने कभी इसकी कोई शिकायत नहीं की क्योंकि जो केमिस्ट्री अमिताभ बच्चन और जीनत की फिल्म के गाने, कब के बिछड़े हुए हम आज कहां आके मिले, में दिखाई है, वह इससे पहले अमिताभ और रेखा के बीच ही दिखी थी या तो फिल्म सुहाग में या फिर उसके पहले मिस्टर नटवरलाल में।
फिल्म में अमिताभ बच्चन की मां बनी राखी के भी अजीब किस्से हैं शूटिंग के। फिल्म में एक सीन फिल्माया जाना था अमजद खान और राखी के बीच। डायरेक्टर प्रकाश मेहरा सब लाइटिंग वाइटिंग करके लोकेशन पर रेडी टू टेक बैठे हैं लेकिन राखी हैं कि उनका पता ही नहीं। प्रोडक्शन मैनेजर फोन पर फोन किए जा रहा है और राखी के घर में जो फोन उठा रहा है वो उनसे बात तक नहीं करा रहा। प्रकाश मेहरा का माथा होते होते गरम हो गया। अमजद खान उन दिनों बिजी सितारे थे और बड़ी मुश्किल से उनकी डेट मिली थी। प्रकाश मेहरा ने कहा कि लास्ट फोन मिलाओ, मेरी बात कराओ और इस बार बात न हो तो आज का पैकअप। कल यही सीन किसी दूसरी हीरोइन के साथ करते हैं। प्रकाश मेहरा बोल तो गए पर उनके दिल को धक से ये भी हुआ कि राखी न आईं तो फिर अमिताभ बच्चन की मां का रोल करेगा कौन? क्योंकि खुद राखी तमाम मिन्नतों के बाद इस रोल के लिए तैयार हुई थी और वह भी इसलिए कि अमिताभ बच्चन का वह फिल्म कभी कभी दिलाने के लिए एहसान मानती थीं। खैर, फोन मिलाया गया। राखी के घर की घंटी बजी। और इत्तेफाकन खुद राखी ने फोन उठाया। प्रकाश मेहरा की वह आवाज पहचान गईं, छूटते ही बोलीं, बेबी की तबीयत खराब थी सुबह से तो फोन पर न आ सकी। बस अभी शूटिंग पर पहुंचती हूं। प्रकाश मेहरा ने लंबी सांस ली और बात आगे बढ़ी।
फिल्म लावारिस की तमाम बातों में से एक बात ये भी गौर करने लायक है कि इसके गाने सारे सुपरहिट थे। अपनी तो जैसे तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे कट जाएगी, साल का सुपर डुपर हिट गाना रहा। जीनत अमान के साथ वाला, कब के बिछड़े के बारे में मैं जिक्र कर ही चुका हूं। काहे पैसे पे तू इतना गुरूर करे है और जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारों, ये दोनों गाने उन दिनों कानपुर में घंटाघर से परेड तक खूब बजा करते थे। नई सड़क को तब खूनी सड़क भी कहा जाता था। पता नहीं होता था कि कब किधर से कट्टा या बम निकल आए। गैंगवार वाली सड़क थी। हम लोग बस किसी तरह हनुमान चालीसा पढ़ते हुए ये इलाका पार कर जाते थे। दिक्कत तब होती थी, जब ग्वालटोली से मूलगंज चौराहे के करीब बनी टाकीजों तक आने के लिए इसे अक्सर दोपहर में ही पार करना होता था। लावारिस की कमाई बॉक्स ऑफिस पर और कमाल होती अगर फिल्म में अमिताभ बच्चन का वो गाना, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है, न होता। साल 81 तक हिंदुस्तान क्रॉस जेंडर को लेकर इतना जेंटलमैन नहीं हुआ था। तमाम फैमिली वाले तो फिल्म देखने बस इसी गाने के चलते नहीं गए। ये अलग बात है कि अमिताभ बच्चन के स्टेज शोज में ये गाना खूब हिट रहा।
मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है, ये गाना पहली बार स्टेज पर अमिताभ बच्चन ने सरप्राइज के तौर पर गाया था। फिल्म में ये गाना भी अमिताभ बच्चन ने ही गाया है। इससे पहले वह फिल्म मिस्टर नटवरलाल में मेरे पास आओ मेरे दोस्तों जैसा हिट गाना गा ही चुके थे। हुआ यूं कि न्यूयॉर्क में लता मंगेशकर स्टेज पर गा रही थीं और अमिताभ बच्चन अपनी पत्नी के साथ सामने सीटों पर बैठे थे। लता मंगेशकर ने अमिताभ को आवाज लगाकर स्टेज पर बुलाया और दर्शकों को बताया कि ये गाते भी बहुत अच्छा हैं। बस फिर क्या, पब्लिक दीवानी हो गई। अमिताभ बच्चन के नाम का शोर मच गया। लता मंगेशकर ने फिर ललकारा, तो अमिताभ बच्चन ने माइक संभाल ही लिया। और, गाने में जब वो लाइन आई कि जिसकी बीवी छोटी उसका भी ब़ड़ा नाम है तो अमिताभ बच्चन ने वहां मौजूद जया को वाकई गोद में उठा लिया। पूरे हॉल में बवाल मच गया। न्यूयॉर्क पुलिस का पसीना छूट गया लोगों को वापस सीटों पर बिठाने में। ये और बात है कि पहली बार जब जया बच्चन ने ये गाना स्क्रीन पर देखा तो वह गुस्से से बाहर निकल गई थीं। मेरे अंगने में उत्तर प्रदेश का बहुत ही लोकप्रिय लोकगीत रहा है। फिल्म लावारिस से पहले ये गाना 1970 में आई शशि कपूर की फिल्म बॉम्बे टाकी के और 1975 में आई फिल्म मजे ले लो में भी बज चुका है।
लावारिस से पहले और फिल्म मुकद्दर का सिकंदर के तुरंत बाद निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन के साथ दो फिल्मों का एलान किया था, एक का नाम था कायर और दूसरी थी जादूगर। लेकिन बनी फिल्म लावारिस। जादूगर बहुत बाद में जाकर प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन के साथ बनाई। लावारिस के बाद प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन दोनों ने अमेरिका में मशहूर मुक्केबाज मोहम्मद अली से मुलाकात की थी। प्रकाश मेहरा ने जीनत अमान और इन दोनों को लेकर एक फिल्म जमीन के नाम से बनाने की शुरूआत भी कर दी थी। लेकिन, फिल्म क्रांति देखने के बाद उनके होश उड़ गए। जमीन की कहानी यही थी और इसके क्लाइमेक्स के सीन हू ब हू क्रांति जैसे ही थे। ये तो बाद में पता चला कि क्रांति लिखने वाले सलीम जावेद ने ये सीन उसी टीवी सीरीज रूट्स से उठाए थे जहां से प्रेरित होकर जमीन लिखने वाले हरबंस कुमार ने जमीन का क्लाइमेक्स लिखा था। प्रकाश मेहरा तब बहुत नाराज हुए और ये फिल्म फिर कभी बनी नहीं। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल यानी 23 मई बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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