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Batwara 1947 Review: सनी देओल कब तक अकेले बचाएंगे ये फिल्म? कहानी में दम, फिल्म ढाई घंटे तक धैर्य आजमाती रही

Fri, 14 Aug 2026 12:59 PM IST
Kiran Vinod Kumar Jain किरण जैन
Updated Fri, 14 Aug 2026 12:59 PM IST
सार

Batwara 1947 Review: फिल्म 'बंटवारा 1947' आज 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। कैसी है भारत और पाकिस्तान के विभाजन की पृष्ठिभूमि पर बनी यह फिल्म? यहां पढ़िए रिव्यू

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Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
'बंटवारा 1947' फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
बंटवारा 1947
कलाकार
सनी देओल , प्रीति जिंटा , शबाना आजमी , अली फजल , करण देओल और अभिमन्यु सिंह
लेखक
राजकुमार संतोषी, असगर वजाहत (नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जम्याइ नइ पर आधारित)
निर्देशक
राजकुमार संतोषी
निर्माता
आमिर खान, अपर्णा पुरोहित
रेटिंग
2/5

विस्तार

सनी देओल और प्रीति जिंटा की फिल्म ‘बंटवारा 1947’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। कहानी 1947 के बंटवारे से शुरू होती है। दंगे हैं। लाहौर जाने की मजबूरी है। एक मुस्लिम परिवार है। बेटा पीछे छूट जाता है। उधर लाहौर में एक हिंदू बूढ़ी मां है। वह अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं। हवेली पर कब्जे की राजनीति भी शुरू हो जाती है। मजहबी नफरत भी है। यानी पार्टिशन ड्रामा का पूरा मसाला मौजूद है।

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पहले आधे घंटे तक लगता है... अच्छा, मामला जम सकता है। लेकिन फिर फिल्म अपनी ही जगह पर घूमने लगती है। कुछ देर बाद कहानी से ज्यादा आपका ध्यान सनी देओल पर चला जाता है। अब सनी कब आएंगे? अगला लंबा डायलॉग कब शुरू होगा? और यही फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी है। कहानी में कहने को बहुत कुछ है। लेकिन फिल्म दिखाने से ज्यादा समझाती है। नतीजा? कई जगह लगता है..अब बस भी करो।

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Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
'बंटवारा 1947' - फोटो : साभार@imdb

कहानी: हवेली के अंदर पूरा बंटवारा
1947 में दंगे भड़क चुके हैं। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे के बीच सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) अपने परिवार- हमीदा बेगम (प्रीति जिंटा) और जावेद मिर्जा (करण देओल) के साथ लाहौर पहुंचते हैं। नया मुल्क, नया शहर और नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की कोशिश।
रहने के लिए उन्हें एक बड़ी हवेली मिलती है। लेकिन एक पेंच है। उस घर में दुर्गावती देवी (शबाना आजमी) अभी रहती हैं। उनका परिवार बिछड़ चुका है और वह अपने बेटे रतनलाल के लौटने का इंतजार कर रही हैं। वह घर छोड़ने से साफ मना कर देती हैं। बस, यहीं से असली खेल शुरू होता है।

एक तरफ मिर्जा परिवार है, जिसे लाहौर में अपनी जगह बनानी है। दूसरी तरफ दुर्गावती हैं, जिनके लिए वह हवेली सिर्फ चार दीवारें नहीं, उनका पूरा अतीत है।
और फिर आता है लोकल नेता याकूब खान (अभिमन्यु सिंह), जिसकी नजर उसी हवेली पर है। मामला सिर्फ घर का नहीं रह जाता। मजहब, राजनीति, नफरत, बदला और इंसानियत... सब एक ही हवेली में घुस आते हैं। हबीब अनवर (अली फजल) भी कहानी में आता है, जो मिर्जा परिवार का साथ देता है और इंसानियत की आवाज बनता है।
कहानी का आइडिया अच्छा है। सच कहें तो कागज पर ये फिल्म काफी दमदार लगती है। दिक्कत स्क्रीन पर है।

Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
बंटवारा 1947 - फोटो : इंस्टाग्राम

एक्टिंग: सनी देओल के अलावा सबको थोड़ा और जीना था

  • सनी देओल इस फिल्म में एक्टिंग कम और फिल्म को संभालने का काम ज्यादा करते हैं। उनकी आवाज, स्क्रीन प्रेजेंस और ठहराव आज भी काम करता है। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म उन्हें बार-बार भाषण देने भेज देती है।
  • मजहब पर बात करनी है तो सनी। इंसानियत समझानी है... सनी। किसी को जवाब देना है... सनी। क्लाइमैक्स से पहले माहौल बनाना है... तो भी सनी।
  • एक वक्त के बाद लगता है कि फिल्म है या सनी देओल का मोटिवेशनल स्पीकिंग सेशन? और मजेदार बात यह है कि कई जगह आपको पहले ही अंदाजा हो जाता है कि अब सनी का लंबा डायलॉग आने वाला है। और आता भी है।
  • मगर इस बार उनके लंबे मोनोलॉग में वह पुराना ‘सनी देओल वाला’ असर नहीं है। बात सही है, संदेश भी सही है... लेकिन सीन इतना लंबा खिंचता है कि असर पैदा होने के बजाय भाषण जैसा लगने लगता है।
  • प्रीति जिंटा की वापसी अच्छी लगती है, लेकिन हमीदा के किरदार में वह सहजता नहीं दिखती। कई जगह उनकी मासूमियत भी बनावटी लगती है। संवाद बोल रही हैं, लेकिन उन्हें महसूस करवाने वाली बात गायब है।
  • शबाना आजमी जैसी अभिनेत्री से इस किरदार में काफी उम्मीद थी। लेकिन कई जगह उनका दर्द महसूस होने के बजाय सिर्फ डायलॉग सुनाई देते हैं। लगता है जैसे वह किरदार जी नहीं रहीं, बस लाइनें बोल रही हैं। एक जगह उनका अंदाज देखकर अचानक फिल्म ‘करण अर्जुन’ याद आ गया। बस अब पर्दे पर ‘मेरे करण अर्जुन आएंगे’ सुनना बाकी था।
  • अली फजल सहज लगते हैं। उनके हिस्से में कम शोर है... शायद इसी वजह से उनकी परफॉर्मेंस ज्यादा सच्ची लगती है। फिल्म में वह हबीब अनवर के किरदार में हैं।
  • करण देओल को भी अपना एक्शन सीन मिल जाता है, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस में सहजता की कमी खटकती है। गुस्सा हो या इमोशन, सब कुछ थोड़ा बनावटी लगता है। और उनका एक्शन सीन देखकर तो ऐसा लगता है जैसे उन्होंने मेकर्स से कहा हो- ‘पापा को पूरा एक्शन दे दिया, मेरा भी एक करवा दीजिए।
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Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
बंटवारा 1947 - फोटो : सोशल मीडिया

एक्शन: इस बार हैंडपंप नहीं, बैलगाड़ी का पहिया है
अब सनी देओल की फिल्म है तो मारधाड़ से बचना मुश्किल है। यहां भी सनी अकेले कई लोगों पर भारी पड़ते हैं। फर्क इतना है कि इस बार हाथ में हैंडपंप नहीं, बैलगाड़ी के पहिए हैं। कागज पर सुनने में मजेदार लगता है। स्क्रीन पर फीका।

लेखन: कहानी अच्छी, संवाद कई जगह सिर पकड़ने वाले
कहानी का आइडिया अच्छा है, लेकिन संवाद कई जगह फिल्म का मजा किरकिरा कर देते हैं। मसलन, जब हमीदा की बेटी पूछती है कि पाकिस्तान क्यों बना, तो उनका जवाब है- ‘ये जाकर अपने अब्बा से पूछो... ये सब बातें ये मर्द हमें कहां बताते हैं।’
इतने बड़े सवाल पर ये जवाब सुनकर लगा... अच्छा, तो पाकिस्तान बनने की पूरी कहानी घर के मर्दों ने छिपाकर रखी थी...ऐसे कई संवाद फिल्म में हैं, जो सुनने में अटपटे लगते हैं।

फिल्म असगर वजाहत के चर्चित नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जम्याइ नइ से प्रेरित है। राजकुमार संतोषी और असगर वजाहत इसके लेखन से जुड़े हैं।

Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
'बंटवारा 1947' - फोटो : सोशल मीडिया

निर्देशन और स्क्रीनप्ले: यहीं फिल्म सबसे ज्यादा हारती है
राजकुमार संतोषी ने विषय गलत नहीं चुना। बल्कि विषय बेहद जरूरी है। फिल्म को देखकर लगता है कि इसे आज के दर्शक और आज के फिल्म बनाने के तरीके को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया।

लाहौर का सेट भी कई जगह सेट ही नजर आता है। वह शहर, वह डर, वह दंगों का माहौल... जिस तरह से महसूस होना चाहिए, वैसा महसूस नहीं होता। आज के दर्शक ने VFX और CGI में पूरी-की-पूरी दुनिया बनते देखी है। ऐसे में यहां कई जगह बनावटी सेटअप खटकता है।

सबसे बड़ी समस्या है... फिल्म आपको समझने का मौका नहीं देती। वह हर बात समझाती है। मजहब बुरा नहीं होता... इंसान बुरा होता है। नफरत गलत है... इंसानियत बड़ी है। बातें सही हैं, बिल्कुल सही हैं। लेकिन फिल्म इन्हें बार-बार बोलती है। और जब कोई फिल्म अपनी बात इतनी बार समझाने लगे, तो इमोशन कम और प्रवचन ज्यादा महसूस होने लगता है।

Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
बंटवारा 1947 - फोटो : यूट्यूब

संगीत: बस ठीक-ठाक
ए.आर. रहमान का संगीत है, लेकिन फिल्म में ऐसा कोई गाना नहीं है जो खास असर छोड़ जाए। पहला गाना तो फिल्म की रफ्तार और धीमी कर देता है। दूसरा थोड़ा बेहतर लगता है। बैकग्राउंड म्यूजिक ठीक है, लेकिन याद रह जाने वाला नहीं।

Batwara 1947 Review and Ratings Sunny Deol Preity Zinta Shabana Azmi Karan Aamir Khan Rajkumar Santoshi Movie
फिल्म 'बंटवारा 1947' - फोटो : इंस्टाग्राम@imkarandeol

देखें या नहीं?
‘बटवारा 1947’ की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि फिल्म जिस दर्द को महसूस करवाना चाहती है, उसे बार-बार बोलकर समझाती रहती है। कहानी में दम था, लेकिन पर्दे पर वह लंबे संवादों, धीमी रफ्तार और जरूरत से ज्यादा ड्रामे में दब जाता है।

कुल मिलाकर, सनी देओल के लिए टिकट काट सकते हैं। बस ढाई घंटे का धैर्य साथ लेकर जाइए... क्योंकि इस बार सनी फिल्म को तो संभाल लेते हैं, लेकिन फिल्म आपका धैर्य नहीं संभाल पाती।

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