बीसवीं सदी के आठवें दशक में हिंदी सिनेमा में एंट्री मारने वाले हीरो ने एक लंबी लकीर खींची। ये लकीर खींचने वाला खुद भी कम लंबा नहीं था। लोगों ने मसखरी में उसका नाम भी ‘लम्बू’ रखा। छह फुट की ऊंचाई लेकिन कद अभी इतना नहीं हुआ था कि लोग स्टूडियो में घुसते ही कुर्सी छोड़कर सलाम करें। फिर कुछ ऐसा हुआ कि हिंदी सिनेमा का इतिहास दो हिस्सों में बंट गया। एक उसके आने के पहले का सिनेमा और एक उसके परदे पर फिल्म जंजीर में एंग्री यंगमैन का रूप धरने के बाद का सिनेमा।
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बंबई (मुंबई) तब दादर के आगे बांद्रा और जुहू तक भी बमुश्किल ही आ पाया था और, अंधेरी तक आने में तो लोग दस बार सोचते थे। लेकिन, एक दिन लोगों ने देखा तो पाया कि बैलगाड़ियों की लंबी कतारें वसई विरार की तरफ से और मध्य मुंबई में कल्याण और ठाणे की तरफ से आती ही चली जा रही हैं। लोगों को पता चला कि कोई फिल्म लगी है शहर में, नाम है, जय संतोषी मां। थिएटर वाले तो भूल भी चुके थे कि कोई नई फिल्म उन्होंने बीते शुक्रवार लगाई है। फिल्म ने पहले शो में कमाए थे 56 रुपये, दूसरे में 64, ईवनिंग शो की कमाई रही 98 रुपये और नाइट शो का कलेक्शन बमुश्किल सौ रुपये छू पाया था। लेकिन सोमवार की सुबह सुबह जो हलचल शुरू हुई तो महीनों तक फिर जहां जहां जय संतोषी मां लगी थी वहां के सफाई करने वाले मालदार हो गए शो के बीच उछाली गई रेजगारियां बटोर बटोर करके।
ये उन दिनों की बात है जब जोधपुर में मंडोर के पास संतोषी मां का एक मंदिर हुआ करता था। लोगों को पता भी नहीं था कि ऐसी कोई देवी पुराणों में हैं भी। खुद इस फिल्म में संतोषी मां का किरदार करने वाली अभिनेत्री अनीता गुहा को नहीं पता था कि ऐसी कोई देवी हैं। साल 2006 में स्टार गोल्ड पर फिल्म जय संतोषी मां पहली बार दिखाई जाने वाली थी और फिल्म के प्रसारण से पहले चैनल वालों ने अनीता गुहा को खोज निकाला औऱ उनके खूब इंटरव्यू भी कराए। बांद्रा के उनके फ्लैट के सामने हालांकि किसी जमाने में लोगों का हुजूम उमड़ता था, उनके दर्शन करने के लिए। उन्होंने तब बताया भी था कि कैसे लोग अपने बच्चे उनकी गोद में आशीर्वाद पाने के लिए डाल दिया करते थे।
फिल्म की कहानी सत्यवती नाम की एक महिला की है जिसको उसके ससुराल वाले बहुत कष्ट देते हैं और फिर संतोषी मां की कृपा से उसके जीवन में सब ठीक हो जाता है। सत्यवती के पति बिरजू का रोल करने वाले यानी कि फिल्म के हीरो आशीष कुमार की मानें तो उन्होंने ही इस फिल्म का आइडिया फिल्म के प्रोड्यूसर सतराम रोहरा को दिया था। आशीष के बच्चे नहीं थे और तभी उनकी पत्नी ने संतोषी मां के सोलह शुक्रवार व्रत रखने शुरू किए। व्रत के बीच में ही आशीष की पत्नी गर्भवती हो गईं तो बाकी के व्रतों की कथाएं आशीष ने अपनी पत्नी को सुनाई।
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अपने घर में बिटिया के जन्म के बाद आशीष ने ये बात सतराम के गुरु और फाइनेंसर सरस्वती गंगाराम को सुनाई जिन्होंने फिल्म शुरू करने के लिए 50 हजार रुपये दिए थे। बाद में फिल्म से उस समय के चर्चित फिल्म वितरक केदारनाथ अग्रवाल जुड़े और उन्होंने तब तक शूट हो चुकी फिल्म के अधिकार 11 लाख रुपये एडवांस देकर खरीद लिए। फिल्म कुल 12 लाख में बनी और इसने बॉक्स ऑफिस पर अब तक कमाए हैं करीब 25 करोड़ रुपये। ये अलग बात है कि फिल्म के हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनने के बाद भी न इसके वितरक के हाथ कुछ लगा और न ही इसके निर्माता के। यहां तक कि फिल्म के निर्माता सतराम रोहरा ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया था। ये किस्सा थोड़ी देर में।
फिल्म जब तक सिनेमाघरों में लगी रही तब तक खूब धूम से चली। गांवों से आने वाले चप्पल उताकर कर सिनेमाघरों में प्रवेश करते। अपने साथ वे फूल माला लेकर आते। और फिल्म शुरू होते ही जब दूसरे ही सीन में संतोषी मां की आरती होती तो सब अपनी अपनी आरती जलाकर आरती करना शुरू कर देते। फिल्म खत्म होने के बाद बाकायदा सिनेमाघरों के बाहर प्रसाद बंटता और पास में ही लंबी कतार दिखती संतोषी मां की फ्रेम की हुई फोटो के साथ शुक्रवार की व्रत कथा बेचने वाले दुकानदारों की।
जिनका बचपन इमरजेंसी के उस दौर में बीता है, उनको पता है कि शुक्रवार को तब चाट की दुकान की तरफ देखना भी कितना बड़ा गुनाह होता था औऱ जो बच्चा गलती से शुक्रवार को खटाई खा भी ले, वो बेचारा हफ्तों तक इसी अपराधग्लानि में जीता रहता कि घर पर कहीं कुछ अशुभ न हो जाए। लोगों के घरों पर खूब पोस्टकार्ड आते। इन पोस्टकार्ड्स पर ऐसे ही 16 पोस्टकार्ड और लिखकर दूसरों को भेजने को कहा जाता। और फिर ये चेन चलती ही रहती। हालात यहां तक आ गए थे कि डाकखानों में पोस्टकार्ड मिलने बंद हो गए।
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फिल्म में संतोषी मां का रोल करने वाली अनीता गुहा रातोंरात स्टार बन गईं। इससे पहले वह सीता मैया के रोल तीन फिल्मों में कर चुकी थीं। फिल्म आराधना में राजेश खन्ना की मां बन चुकी थीं और फिर उनके जीवन में संतोषी मां का आशीर्वाद आ गया। इस पूरी फिल्म में जब तक उन्होंने शूटिंग की, हमेशा व्रत रहकर ही काम किया। इस बारे में तब अनीता ने बताया था, “पहले दिन की शूटिंग बहुत अफरातफरी में हुई। हम सब लोग सुबह से मेकअप कराकर रेडी थे लेकिन पहला शॉट काफी देर से हुआ। इस चक्कर में पहले ब्रेकफास्ट और फिर लंच मिस हो गया। शाम को इसका एहसास हुआ औऱ निर्देशक विजय शर्मा ने कुछ खाने को कहा तो मुझे लगा कि खाने लगी तो चेहरे का मेकअप फिर से कराना होगा तो मैंने कहा कि अब काम खत्म करके ही खाती हूं। तो पूरा दिन उस दिन बिना कुछ खाए पीये ही निकल गया। फिर मैंने सोचा कि हो सकता हो कि इसमें भी ईश्वर की कुछ इच्छा रही हो तो इसके बाद मैंने जितने दिन शूटिंग की, बिना कुछ खाए पीये ही शूटिंग की।”
लेकिन, जैसा कि हर कालजयी किरदार करने वाले के साथ होता है वैसा ही अनीता गुहा के साथ भी हुआ, इस फिल्म के बाद उन्हें भी दीपिका चिखलिया और अरुण गोविल की तरह धार्मिक रोल ही ऑफर होने लगे। और, ये इसके बाद कि वह जय संतोषी मां फिल्म से पहले राजेंद्र कुमार की फिल्म गूंज उठी शहनाई में फिल्मफेयर का बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर फीमेल का नॉमीनेशन जीत चुकी थीं।
फिल्म जय संतोषी मां चली तो बस ईश्वर के ही चमत्कार से। फिल्म की कहानी अच्छी लिखी गई थी। गांव गरीब के संतोष की कहानी थी। उस समय के सामाजिक हालात से जूझ रहे आम आदमी को संतोष देने की कहानी थी। गरीब इसी बात में खुश हो जाता कि कोई ऐसी भी देवी हैं जो सिर्फ गुड़ चने का प्रसाद पाकर ही खुश हो जाती हैं। नहीं तो बाकी देवताओं को तो बड़े छप्पन भोग लगाने होते हैं उन्हें खुश करने के लिए। फिल्म शुरू होती है रक्षा बंधन के त्योहार से जहां भगवान गणेश के दोनों बेटे एक बहन की जिद करते हैं। भगवान गणेश और उनकी पत्नियों ऋद्धि व सिद्धि की इस संतान का नाम नारद रखते हैं, संतोषी। फिल्म इसके बाद देवलोक से सीधे मर्त्यलोक आती है जहां सत्यवती मंदिर में मां संतोषी की आरती करते दिखती है। फिल्म की कहानी दोनों लोकों में समानांतर चलती रहती है।
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फिल्म को सबसे ज्यादा मदद मिली अपने संगीत से। कवि प्रदीप के लिखे गीतों को संगीतकार सी अर्जुन ने बहुत ही मौलिक और लोकगीतों के अनुरूप धुनें दीं। खुद कवि प्रदीप ने फिल्म में दो गाने गाए। मन्ना डे और महेंद्र कपूर की आवाजें फिल्म के किरदारों पर बिल्कुल फिट बैठीं और सोने पर सुहागा बनी उषा मंगेशकर की आवाज। फिल्म की हीरोइन कानन कौशल के लिए गाए उनके सारे गीत सुपरहिट रहे। मजा तो तब आता था जब रेडियो सीलोन पर गीतमाला सुनने वालों को एकदम से अमीन सयानी इस फिल्म का कोई भजन सुनाने लगते। अब कार्यक्रम फिल्मी गीतों का था और फिल्म जय संतोषी मां के गाने सुपरहिट थे तो फिर किसी न किसी पायदान पर तो बजने ही थे। ये सिलसिला एक दो नहीं बल्कि कई हफ्तों तक चला। फिल्म के गानों के लिए उषा मंगेशकर को फिल्मफेयर बेस्ट प्लेबैक सिंगर फीमेल का नॉमीनेशन भी मिला।
फिल्म जय संतोषी मां के सामाजिक-आर्थिक असर पर बाकायदा लोगों ने शोध पत्र लिखे हैं। इस फिल्म ने देवी संतोषी का इतना प्रचार भारत और विदेश में किया कि उनकी तस्वीरों और व्रत कथाओं का एक अलग से कारोबार विकसित हो गया. पूरे देश में जहां तहां संतोषी माता के मंदिर बने। लोग श्रद्धा पूर्वक उनकी पूजा करने लगे और इसी फिल्म ने पहली बार देश में लोगों को धर्म का कारोबार करने का चस्का भी लगाया। देश में भगवान का रास्ता बताने के नाम पर मंडली जमाने वाले तमाम बाबा खुद ही भगवान कहलाकर अपनी पूजा कराने लगे। फिल्म का ये दुरुपयोग शायद देवी संतोषी मां ने भी नहीं सोचा था। तभी तो फिल्म से जुड़े सभी लोगों के साथ कुछ न कुछ अनिष्ट होता चला गया।
फिल्म जय संतोषी मां में संतोषी माता बनीं अनीता गुहा को सफेद दाग की बीमारी हुई और इसके चलते उनका अपने घर से बाहर आना बाद के दिनों में काफी कम हो गया। पति माणिक दत्त का असामयिक निधन होने के बाद वह बहुत ही गुमनाम सी जिंदगी जीते हुए 2007 में दुनिया छोड़ गईं। कानन कौशल को भी फिल्म के बाद ज्यादा कोई खास मदद नहीं मिली। उन्होंने अपने करियर में 60 हिंदी और 16 गुजराती फिल्में की लेकिन उनकी कोई पहचान बन नहीं सकी। फिल्म निर्माता सतराम रोहरा दिवालिया होने के बाद बहुत मुसीबत में रहे।
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