आज कांग्रेस के पूर्व सांसद और इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी का जन्मदिवस है लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इतनी भर नहीं है। आजाद भारत में फिरोज गांधी ऐसे पहले सांसद रहे जिन्होंने संसद और उसके बाहर अपनी ही पार्टी की सरकार की जमकर मुखालफत की वो भी तब जब इसके मुखिया उनके ससुर जवाहर लाल नेहरू ही थे। आइए आपको बताते हैं फिरोज गांधी के कुछ ऐसे ही अनसुने किस्सों के बारे में।
कैसे एक दूसरे के करीब आए थे इंदिरा और फिरोज, पढ़िए 11 अनसुने किस्से
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पांच भाई बहनों में सबसे बड़े फिरोज गांधी का असली नाम फिरोज घांदी था। उनके पिता जहांगीर घांदी गुजरात के भरूच के रहने वाले एक पारसी थे (हालांकि कुछ इतिहासकार उनके मुस्लिम होने का दावा भी करते हैं)। पिता की मौत के बाद फिरोज अपनी मां रत्तीमई फरदून के साथ भरूच से पहले मुंबई और फिर इलाहाबाद आकर रहने लगे। बताया जाता है कि यहां उनकी मौसी डा. शीरीन कमिसएरिएट रहती थीं, जो सिटी लेडी डफरिन हॉस्पिटल में एक प्रख्यात सर्जन थीं।
इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने विद्या मंदिर हाईस्कूल में एडमिशन लिया और यहां से स्कूली शिक्षा पूरी कर इविंग क्रिश्चियन कालेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के साथ साथ उन्होंने आजादी के आंदोलन में भी भाग लेना शुरू कर दिया। 1930 में उन्होंने कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। यहीं उनकी मुलाकात इंदिरा गांधी उर्फ इंदिरा प्रियदर्शनी से हुई।
फिरोज गांधी के सरनेम को लेकर इतिहासकारों में हमेशा ही विवाद रहा है। कहा जाता है कि आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी से प्रभावित होकर अपना सरनेम घांदी से गांधी कर लिया था। जबकि किस्सा ये भी है कि इंदिरा गांधी से शादी के बाद जब पंडित जवाहर लाल नेहरू नाराज हुए तो महात्मा गांधी ने उन्हें अपना सरनेम गांधी दे दिया था जो आज तक गांधी परिवार के साथ चला आ रहा है।
इंदिरा और फिरोज गांधी के प्रेम संबंध और शादी को लेकर भी बहुत किस्से प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जब इंदिरा की मां कमला नेहरू टीबी की गंभीर बीमारी से जूझ रहीं थी तब फिरोज गांधी ने उनकी बहुत सेवा की थी। जब स्विटजरलैंड में कमला नेहरू की मौत हुई तब उनके साथ फिरोज गांधी वहीं मौजूद थे। इससे पूर्व एक बार एक आंदोलन के दौरान जब कमला नेहरू बेहोश होकर गिरीं तो फिरोज गांधी उन्हें अपनी बाजुओं में उठाकर ले गए थे। यह देख इंदिरा फिरोज से काफी प्रभावित हुईं।