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Droupadi Murmu vs Yashwant Sinha: देश को मिलेगी पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति या दूसरी बार विपक्ष का उम्मीदवार रचेगा इतिहास?

Mon, 18 Jul 2022 07:20 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 18 Jul 2022 07:20 AM IST
सार

यह जानना अहम है कि दोनों नेता आखिर किन वजहों से इस पद के दावेदार बन गए? दोनों का निजी और सार्वजनिक बैकग्राउंड क्या रहा है? इसके अलावा दोनों ही नेताओं की वजह से कैसे चुनाव दिलचस्प हो चुके हैं?

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President Election 2022 Droupadi Murmu vs Yashwant Sinha know about them and their selection candidates news in hindi
राष्ट्रपति चुनाव 2022 - फोटो : अमर उजाला
देश का अगला राष्ट्रपति कौन होगा, इसका फैसला आज मतपेटियों में बंद हो जाएगा। हालांकि, सत्तासीन एनडीए और संयुक्त विपक्ष के बीच इस बार मुकाबला काफी कड़ा है। दरअसल, दोनों ही ओर से सांसदों-विधायकों के वोट जुटाने के लिए मजबूत नेताओं को खड़ा किया गया है। जहां भाजपा ने जातीय समीकरणों को निष्क्रिय करने के लिए एक आदिवासी-महिला उम्मीदवार को उतारकर माहौल को अपने पक्ष में बनाने की कोशिश की है। वहीं, विपक्ष ने मोदी सरकार के सख्त विरोधी यशवंत सिन्हा को प्रत्याशी बनाया है, जो कि अनुभव के मामले में काफी आगे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति पद के लिए दोनों ही उम्मीदवारों के बीच कड़े मुकाबले की उम्मीद है।




इस बीच यह जानना अहम है कि दोनों नेता आखिर किन वजहों से इस पद के दावेदार बन गए? दोनों का निजी और सार्वजनिक बैकग्राउंड क्या रहा है? इसके अलावा दोनों ही नेताओं की वजह से यह चुनाव दिलचस्प हो चुके हैं?
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यशवंत सिन्हा - फोटो : अमर उजाला
पहले जानें- कौन हैं यशवंत सिन्हा?
यशवंत सिन्हा का जन्म 6 नवंबर 1937 को बिहार के नालंदा जिले स्थित अस्थावां गांव में कायस्थ परिवार में हुआ था। उन्होंने राजनीति शास्त्र में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की है। इसके बाद कुछ समय तक वह पटना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी रहे। 1960 में सिन्हा का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस के लिए हो गया। 24 साल तक उन्होंने बतौर आईएएस अपनी सेवाएं दीं। इस दौरान वह भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय में उप सचिव भी रहे। बाद में उन्हें जर्मनी के दूतावास में प्रथम सचिव वाणिज्यिक के तौर पर नियुक्त किया गया। 1973 से 1975 के बीच में उन्हें भारत का कौंसुल जनरल बनाया गया। 

फिर शुरू हुआ राजनीति सफर 
1984 में यशवंत सिन्हा ने प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देकर जनता पार्टी जॉइन कर ली। यहीं से उनके राजनीतिक करियर का आगाज हुआ। 1986 में उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया। 1988 में वह पहली बार राज्यसभा के सांसद बने। 1989 में जब जनता दल का गठन हुआ तो वह उसमें शामिल हो गए। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया। इस दौरान चंद्रशेखर की सरकार में वह 1990 से 1991 तक वित्त मंत्री भी रहे। 

1996 में वह भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता बने। 1998 में उन्हें केंद्र सरकार में वित्त मंत्री बनाया गया। इसके बाद उन्हें विदेश मंत्री भी बनाया गया। 2004 में चुनाव हार गए। 2005 में उन्हें फिर से राज्यसभा सांसद बनाया गया। 2009 में सिन्हा ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया। 2021 में उन्होंने टीएमसी जॉइन कर ली। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया।
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यशवंत सिन्हा - फोटो : अमर उजाला
विपक्ष ने क्यों बनाया उम्मीदवार?
यशवंत सिन्हा का राजनीतिक अनुभव भाजपा से भी जुड़ा रहा है। इन दिनों वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुर विरोधी हैं। ऐसे में उनकी कोशिश होगी कि वह एनडीए और भाजपा में सेंध लगा सकें। इसके लिए वह पूरी कोशिश करेंगे। इसके साथ ही वह उन दलों को भी एकजुट करने की कोशिश की है, जिन्होंने अब तक विपक्ष से दूरी बनाकर रखी हुई है। इनमें आम आदमी पार्टी, टीआरएस और कुछ अन्य छोटी पार्टियों को साथ लाने में उन्हें बड़ी सफलता मिली है। 
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द्रौपदी मुर्मू - फोटो : अमर उजाला
कौन हैं द्रौपदी मुर्मू?
एनडीए से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू 20 जून 1958 को ओडिशा में एक आदिवासी परिवार में पैदा हुईं थीं। उन्होंने रामा देवी विमेंस कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद द्रौपदी ने ओडिशा के राज्य सचिवालय से नौकरी की शुरुआत की। ओडिशा के बेहद पिछड़े और संथाल बिरादरी से जुड़ी 64 वर्षीय द्रौपदी के जीवन का सफर संघर्षों से भरा रहा है। आर्थिक अभाव के कारण महज स्तानक तक शिक्षा हासिल करने में कामयाब रही द्रौपदी ने पहले शिक्षा को अपना करियर बनाया। 

मुर्मू का विवाह श्याम चरण मुर्मू के साथ हुआ है। मुर्मू का राजनीतिक करियर 1997 में शुरू हुआ था। वे पहली बार नगर पंचायत का चुनाव जीत कर पहली बार स्थानीय पार्षद बनी। तीन साल बाद, वह रायरंगपुर के उसी निर्वाचन क्षेत्र से राज्य विधानसभा के लिए चुनी गईं। साल 2000 में पहली बार विधायक और फिर भाजपा-बीजेडी सरकार में दो बार मंत्री बनने का मौका मिला। साल 2015 में उन्हें झारखंड का पहला महिला राज्यपाल बनाया गया। 20 जून को मुर्मू ने अपना जन्मदिन मनाया है। पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरी भी ओडिशा में पैदा हुए थे, लेकिन वह मूलत: आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे।

ओडिशा के मयूरभंज जिले की रहने वाली द्रौपदी मुर्मू ओडिशा में दो बार रायरंगपुर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी विधायक रही हैं। वह भाजपा और बीजू जनता दल की गठबंधन सरकार में 6 मार्च 2000 से 6 अगस्त 2002 तक वाणिज्य और परिवहन के लिए स्वतंत्र प्रभार और 6 अगस्त 2002 से 16 मई 2004 तक मत्स्य पालन और पशु संसाधन विकास राज्य मंत्री भी रहीं थीं। उन्हें 2007 में ओडिशा विधान सभा द्वारा सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए "नीलकंठ पुरस्कार" से सम्मानित किया गया था। उन्हें 2015 में झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। वह पहली ऐसी उड़िया नेता हैं, जिन्हें किसी राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया गया।
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पीएम मोदी के साथ द्रौपदी मुर्मू - फोटो : Agency (File Photo)
भाजपा ने क्यों बनाया उम्मीदवार?
द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समाज से आती हैं। ये पहली बार होगा जब कोई आदिवासी देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होगा। इसका संदेश देश के 8.9 फीसदी अनुसूचित जनजाति के वोटर्स को जाएगा। कई राज्यों की कई सीटों पर आदिवासी वोटर्स निर्णायक हैं। ऐसे में भाजपा ने द्रौपदी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर अनुसूचित जनजाति के वोटर्स को अपनी ओर करने की कोशिश की है। अगले दो सालों में 18 राज्यों में चुनाव होने हैं। इनमें दक्षिण के चार बड़े राज्य शामिल हैं। ओडिशा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना। वहीं, पांच राज्य ऐसे हैं जहां अनुसूचित जनजाति और आदिवासी वोटर्स की संख्या काफी अधिक है। इनमें झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र शामिल हैं। इन सभी राज्यों की 350 से ज्यादा सीटों पर मुर्मू फैक्टर भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। 

इतना ही नहीं, द्रौपदी मुर्मू अगर चुनाव जीतती हैं तो दूसरी महिला होंगी जो राष्ट्रपति बनेंगी। इससे महिलाओं में भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा। ऐसे में एक महिला को राष्ट्रपति बनाने से भाजपा को महिला वोटर्स में अपनी पकड़ को और मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है। 
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