दुनियाभर में बांझपन के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। आंकड़ों से पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर ये वयस्क आबादी के लगभग 17.5% हिस्से को प्रभावित करती है। इसका मतलब है कि हर 6 में से लगभग 1 व्यक्ति इस समस्या का शिकार है। जिन लोगों के लिए सामान्य तरीके से बच्चा पैदा कर पाना मुश्किल हो गया है, उनके लिए डॉक्टर आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन की सलाह दे सकते हैं।
IVF Tips: किस्मत नहीं बल्कि ये चीजें तय करती हैं आपका आईवीएफ सफल होगा या नहीं? जानिए डॉक्टर की सलाह
भारत समेत दुनिया भर में आईवीएफ की मांग तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि आईवीएफ कोई चमत्कार नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसकी सफलता व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता तथा बांझपन के कारण पर निर्भर करती है
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आईवीएफ की बढ़ रही है मांग
मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में भई आईवीएफ की मांग तेजी से बढ़ी है। डॉक्टर कहते हैं, इसकी एक बड़ी वजह देर से शादी और परिवार शुरू करने की बढ़ती उम्र हो सकती है। तनावपूर्ण जीवनशैली, मोटापा, पीसीओएस-एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याओं और पुरुषों में घटती स्पर्म क्वालिटी भी इसका खतरा बढ़ाने वाली हो सकती है।
डॉक्टर कहते हैं, आईवीएफ की प्रक्रिया में महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को शरीर के बाहर प्रयोगशाला में मिलाकर भ्रूण तैयार किया जाता है।
- इसके बाद भ्रूण को महिला के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है।
- जब एक वर्ष तक नियमित असुरक्षित संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण न हो तब कुछ जांच के आधार पर डॉक्टर आईवीएफ की सलाह दे सकते हैं।
- हर दंपति को सीधे आईवीएफ कराने की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर पहले बांझपन का कारण पता लगाते हैं।
- कई मामलों में जीवनशैली में सुधार, वजन कंट्रोल करने और हार्मोनल दवाओं की मदद से भी गर्भधारण संभव हो जाता है।
आईवीएफ के बाद सामान्य तरीके से हो सकता है दूसरा बच्चा?
डॉक्टर कहते हैं, आईवीएफ का विकल्प तब चुना जाता है जब अन्य उपाय सफल न हों या समस्या ऐसी हो जिसमें प्राकृतिक गर्भधारण की संभावना बहुत कम हो। इसलिए बिना विशेषज्ञ की सलाह केवल ट्रेंड देखकर आईवीएफ कराने का निर्णय उचित नहीं माना जाता।
अमर उजाला से बातचीत में वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ गरिमा भारती कहती हैं, कई ऐसे उदाहरण देखे गए हैं जहां आईवीएफ से पहला बच्चा होने के बाद दूसरा बच्चा बिना किसी चिकित्सा सहायता के हुआ। हालांकि यदि महिला के दोनों फैलोपियन ट्यूब का पूरी तरह बंद हैं या पुरुष में बांझपन की समस्या है तो ऐसी स्थिति में सामान्य गर्भधारण कठिन हो सकता है।
आईवीएफ के अच्छे परिणाम के लिए क्या चीजें जरूरी?
डॉ गरिमा बताती हैं, आईवीएफ हर किसी केस में सफल हो ये जरूरी नहीं है। शरीर की कई स्थितियां ये तय करती हैं कि आईवीएफ का परिणाम कैसा होगा?
- इसमें महिला की उम्र सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- 35 वर्ष से कम उम्र में आईवीएफ के सफल होने की संभावना अधिक होती है।
- बढ़ती उम्र के साथ अंडाणुओं की गुणवत्ता कम हो सकती है। इससे आईवीएफ में भी दिक्कत आ सकती है।
- इसके अलावा शुक्राणु की गुणवत्ता, गर्भाशय का स्वास्थ्य, हार्मोनल समस्याएं, मोटापा और धूम्रपान जैसी स्थितियां भी आईवीएफ के परिणाम पर असर डाल सकती हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
डॉ गरिमा कहती हैं, आईवीएफ केवल चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि कई चरणों में पूरी होने वाली एक उपचार यात्रा है। इसकी शुरुआत से पहले दंपति को अपनी मेडिकल हिस्ट्री, पहले हुए उपचार और जीवनशैली से जुड़ी सभी जानकारी डॉक्टर के साथ साझा करनी चाहिए।
- उपचार शुरू होने से पहले संतुलित और पर्याप्त नींद लें। कैफीन का सेवन कम करें और धूम्रपान-शराब जैसी आदतों से पूरी तरह दूरी बनाएं।
- यदि कोई पुरानी बीमारी है तो उसे पहले नियंत्रित करना जरूरी है।
- आईवीएफ के दौरान दवाएं और इंजेक्शन तय समय पर लिए जाएं और हर फॉलोअप विजिट पर जाएं।
- डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं बंद न करें और समय से पहले प्रेग्नेंसी टेस्ट करने की जल्दबाजी न करें।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।