Lungs Cancer Day: हर स्टेज के साथ जानलेवा होता जाता है फेफड़ों का कैंसर, क्या इससे बचाव के लिए कोई वैक्सीन है?
लंग्स कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण बेहद सामान्य लगते हैं। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और हर स्टेज के साथ शरीर के भीतर अलग-अलग बदलाव होते हैं। इसके जोखिमों के बारे में आइए विस्तार से जान लेते है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अगर कोई आपसे पूछे कि शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग कौन सा है, तो सबसे पहले हमारे दिमाग में शायद 'दिल' का ख्याल आता है। ये शरीर के सभी अंगों तक खून को पंप करने में मदद करता है, जिससे उनका कामकाज आसान होता है। पर फेफड़ों के बिना शरीर को ऑक्सीजन कैसे मिलेगा?
फेफड़े हर मिनट हमारे शरीर को जीवन देने वाली ऑक्सीजन पहुंचाते हैं। ऑक्सीजन हमारी कोशिकाओं के लिए मुख्य ईंधन का काम करती है, मसलन पूरे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए फेफड़ों का स्वस्थ रहना और निरंतर ठीक तरीके से काम करते रहना बहुत आवश्यक माना जाता है। हालांकि जब इन्हीं फेफड़ों की कोशिकाएं अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं तो यही जीवनदायी अंग सबसे घातक बीमारियों में से एक यानी लंग्स कैंसर का शिकार बन जाता है।
फेफड़ों का कैंसर हर साल करीब 18 लाख लोगों की मौत का कारण बनता है, समय के साथ ये खतरा बढ़ता ही जा रहा है। लंग्स कैंसर को कभी सिर्फ धूम्रपान के कारण होने वाली बीमारी माना जाता था, हालांकि अब ये उन लोगों में भी तेजी से बढ़ती जा रही है जिन्होंने कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया था।
फेफड़ों का कैंसर धीरे-धीरे बढ़ता है और समय के साथ बेहद घातक रूप लेता जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अगर समय रहते इसकी पहचान कर ली जाए और इलाज हो जाए तो लंग्स कैंसर की जटिलताओं को काफी कम किया जा सकता है।
लंग्स कैंसर और इसका बढ़ता जोखिम
दुनियाभर में लंग्स कैंसर को लेकर जागरूकता बढ़ाने, बीमारी का जल्द पता लगाने और प्रभावित लोगों की मदद करने के लिए हर साल 1 अगस्त को 'वर्ल्ड लंग कैंसर डे' मनाया जाता है। 'फोरम ऑफ इंटरनेशनल रेस्पिरेटरी सोसाइटीज' ने 2012 में इसकी शुरुआत की थी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में फेफड़ों का कैंसर, सबसे ज्यादा मौत का कारण बनने वाले कैंसरों में शामिल है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि लंग्स कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण बेहद सामान्य लगते हैं। लगातार खांसी, सांस फूलने, सीने में दर्द या वजन घटने जैसी समस्याओं को लोग अक्सर सामान्य संक्रमण या थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब कैंसर पहले ही काफी आगे बढ़ चुका होता है।
आइए स्टेज बाय स्टेज समझते हैं कि ये कैंसर कैसे घातक रूप लेता जाता है और समय रहते इसका पहचान और इलाज क्यों जरूरी हो जाता है?
श्वसन रोग विशेषज्ञ कहते हैं, लंग्स कैंसर तब होता है जब फेफड़ों की कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव हो जाता है। इससे कोशिकाएं बिना कंट्रोल के बढ़ने लगती हैं। समय के साथ ये कोशिकाएं ट्यूमर बना लेती हैं। नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर सबसे सामान्य प्रकार का कैंसर है, जो लगभग 85% मामलों में पाया जाता है। जबकि स्मॉल सेल लंग कैंसर ज्यादा आक्रामक होता है और तेजी से फैल सकता है।
नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर
नॉन-स्मॉल सेल लंग्स कैंसर फेफड़ों के कैंसर का सबसे आम प्रकार है। यह बीमारी तब होती है जब फेफड़ों की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं। इसमें मरीज को लगातार खांसी होती रहती है जो समय के साथ और गंभीर होती जातीहै। खांसी में खून आने की दिक्कत होना, सांस लेने में कठिनाई या सीने में दर्द बना रहना इसका सबसे सामान्य पहचान माना जाता है।
स्टेज-1 लंग्स कैंसर
स्टेज-1 में कैंसर केवल फेफड़े तक सीमित रहता है और आसपास के लिम्फ नोड्स या अन्य अंगों तक नहीं पहुंचता। इसमें ट्यूमर अपेक्षाकृत छोटा होता है और यही वह चरण है जिसमें इलाज की सफलता की संभावना सबसे अधिक रहती है।
- इस स्टेज में कई मरीजों को कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते।
- कुछ लोगों में हल्की लगातार खांसी, सीने में असहजता या सांस लेने में हल्की परेशानी हो सकती है।
- चूंकि लक्षण कम होते हैं, इसलिए इसकी आसानी से पहचान नहीं हो पाती है।
स्टेज-2 लंग्स कैंसर
स्टेज-2 में ट्यूमर का आकार बढ़ सकता है या कैंसर पास के लिम्फ नोड्स तक पहुंच सकता है।
- इस स्टेज में फेफड़े का ट्यूमर आमतौर पर 5सेमी से छोटा होता है
- इस चरण में लगातार खांसी, खून वाली खांसी, सीने में दर्द, सांस फूलना, बार-बार फेफड़ों में संक्रमण और थकान जैसे लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते हैं।
- ट्यूमर बड़ा होने के कारण वायुमार्ग में रुकावट भी पैदा हो सकती है।
स्टेज-3 लंग्स कैंसर
स्टेज-3 को आमतौर पर कैंसर एडवांस स्टेज का माना जाता है। इस चरण में कैंसर लिम्फ नोड्स या छाती के आसपास की संरचनाओं तक फैल सकता है।
- मरीज को लगातार तेज खांसी, खून आने, सीने में तेज दर्द, सांस लेने में परेशानी, आवाज बैठने या निगलने में कठिनाई जैसे लक्षण हो सकते हैं।
- इस स्टेज के कुछ मामलों में पहले ट्यूमर छोटा करने के बाद सर्जरी की जाती है। रोगी को जरूरत के आधार पर इम्यूनोथेरेपी भी दी जा सकती है।
- स्टेज-3 वाले फेफड़ों के कैंसर के बाद मरीज में अगले पांच साल का सर्वाइवल रेट लगभग 13% से 36% के बीच रह जाता है।
स्टेज-4 लंग्स कैंसर
स्टेज-4 कैंसर को सबसे एडवांस स्टेज माना जाता है। इसमें कैंसर फेफड़ों से निकलकर मस्तिष्क, हड्डियों, लिवर, एड्रिनल ग्रंथियों या दूसरे फेफड़े तक फैल सकता है। इसे मेटास्टेटिक लंग कैंसर कहा जाता है।
- इस चरण में मरीज को सांस लेने में गंभीर कठिनाई, लगातार दर्द, अत्यधिक कमजोरी, तेजी से वजन घटने, खून वाली खांसी के साथ हड्डियों में दर्द और न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
- इस स्टेज में इलाज का उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता बनाए रखना और बीमारी की प्रगति को धीमा करना भी होता है।
- स्टेज-3 वाले फेफड़ों के कैंसर के बाद मरीज में अगले पांच साल का सर्वाइवल रेट लगभग 3% से 10% के बीच रह जाता है।
लंग्स कैंसर से बचाव और वैक्सीन
लंग्स कैंसर से बचाव के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को इसके जोखिम कारकों जैसे धूम्रपान-प्रदूषण और रसायनों के संपर्क से बचने की सलाह देते हैं। फेफड़ों के कैंसर से बचाव के लिए विशेषज्ञ लगातार वैक्सीन पर काम कर रहे हैं। लंगवैक्स (बचाव के लिए वैक्सीन का ट्रायल), BNT116 (एमआरएनए ट्रीटमेंट वैक्सीन) और पर्सनलाइज्ड ट्यूमर-बेस्ड डीएनए वैक्सीन पर काम चल रहा है हालांकि अभी तक फेफड़ों के कैंसर की किसी भी वैक्सीन को इस्तेमाल के लिए मंजूरी नहीं मिली है।
कैंसर की वैक्सीन
हालिया रिपोर्ट में इंग्लैंड की एक महिला दुनिया की पहली ऐसी मरीज बन गई हैं जिन्हें लंग्स कैंसर की वैक्सीन दी गई है। डॉक्टरों को उम्मीद है कि इससे एडवांस्ड लंग कैंसर के कुछ प्रकारों के इलाज में काफी सुधार हो सकता है।
- क्रिस जोन्स नामक महिला लिवरपूल के क्लैटरब्रिज कैंसर सेंटर में हो रहे क्लिनिकल ट्रायल में हिस्सा ले रही हैं।
- इस वैक्सीन में 68 वर्षीय महिला के अपने ट्यूमर की कोशिकाओं का इस्तेमाल करके एक सिंथेटिक डीएनए बनाया गया है।
- उम्मीद है कि इससे इम्यूनोथेरेपी कहीं ज्यादा असरदार हो जाएगी।
--------------
स्रोत:
Lung cancer stages
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।