लाइफ कोच रिंपा, जो एक शांत स्वभाव की महिला है, आज अचानक खुद पर नियंत्रण खो बैठी। किचन में काम करते हुए किसी बात पर रिंपा को इतना गुस्सा आया कि उसने हाथ में पकड़ा कप जोर से दीवार पर फेंका। रिंपा का पति शशांक, जो पेशे से बच्चों का डॉक्टर है और एक शांत स्वभाव का व्यक्ति भी, अचानक उसके इस रवैये को देख चौंक गया। शशांक का चेहरा देख रिंपा को अगले ही पल अपने व्यवहार पर अफसोस हुआ। वह सोफे पर शशांक के बराबर में जाकर बैठ गई और अपने इस रवैये पर माफी मांगी। शशांक ने उससे इसकी वजह पूछी तो रिंपा को बताते हुए भी शर्म महसूस हुई कि बस सिंक के नीचे की गंदगी देख उसका गुस्सा फूटा। शशांक ने रिंपा को शांत रहने को कहा और किचन में जाकर टूटे कप के टुकड़े उठाने लगा।
Women Anger Reasons: क्यों बढ़ता जा रहा है महिलाओं में गुस्सा? इस रिपोर्ट में सामने आया चौंकाने वाला सच
Women Anger Reasons: आपको दिन में कई बार गुस्सा आता होगा। नासमझी या गलती पर गुस्सा आना लाजिमी है, लेकिन हर छोटी-छोटी बात पर गुस्सा होना चिंता की बात है। आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में महिलाएं ही नहीं, पुरुषों में भी गुस्सा बढ़ रहा है। आखिर इसकी वजह क्या है?
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क्या था रिपोर्ट में?
अगर आपसे पूछा जाए कि अपने इमोशन्स को महिला और पुरुष में से कौन सबसे अधिक अच्छी तरह काबू करता है तो शायद आप कहें, महिलाएं। ऐसा इसलिए, क्योंकि पुरुषों को गुस्सा जल्दी आता है, जबकि महिलाएं अपनी भावनाओं को मन की गठरी में दबा कर रखना भली-भांति जानती हैं।
2008 का एक अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करता है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अपने इमोशन्स पर अच्छी तरह काबू कर लेती हैं। लेकिन गैलप वर्ल्ड पोल इसके उलट आंकड़े पेश करता है। गैलप वर्ल्ड पोल के 2022, 2023 और 2024 के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक में पूरी दुनिया में महिलाओं का गुस्सा पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बढ़ा है।
गैलप की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं को गुस्सा और वह भी तेज गुस्सा आने लगा है। वे इस समय पुरुषों की तुलना में अधिक गुस्सा महसूस कर रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में महिलाओं की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं अधिक तीव्र हुई हैं। विशेष रूप से 2023 में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि लगभग 23 प्रतिशत महिलाओं ने यह माना कि वे बीते दिन गुस्से में थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 20 प्रतिशत था। यह अंतर आपको छोटा लग सकता है, लेकिन यह एक स्पष्ट प्रवृत्ति को दर्शाता है, क्योंकि यह पहली बार है, जब महिलाओं के गुस्से का प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा है।
रिपोर्ट में लगभग 40 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकारा कि वे अधिकांश समय चिंता और तनाव महसूस करती हैं, 30 प्रतिशत उदासी का अनुभव करती हैं और 25 प्रतिशत गुस्से का सामना करती हैं। गैलप वर्ल्ड पोल हर साल अपने इस सर्वे में 150 देशों में एक लाख 20 हजार महिला-पुरुषों को शामिल करता है। उनसे दूसरी कई तरह की चीजों के साथ यह सवाल भी करता है कि ‘पिछले दिन वह कौन-सा इमोशन था, जिसे आपने सबसे ज्यादा महसूस किया।’ इसके उत्तर में सामने आया कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में नकारात्मक भावनाओं को अधिक अनुभव करती हैं, जैसे चिंता, तनाव, उदासी और गुस्सा। विशेष रूप से भारत में महिलाओं में गुस्से की भावना पुरुषों की तुलना में अधिक है। महिलाएं 20 प्रतिशत अधिक उदास महसूस करती हैं और 6 प्रतिशत अधिक गुस्से का अनुभव करती हैं, यानी कि भावनाओं की पोटली को बांधे रखने वाली महिलाओं को अब गुस्सा आने लगा है।
कुछ घटनाएं और ढेर सारे कारण
हाल ही में आपने खबरों में मेरठ हत्याकांड के बारे में सुना होगा, जहां पत्नी मुस्कान रस्तोगी ने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर पति को मौत के घाट उतार दिया। बंगलूरू से 34 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर अतुल सुभाष की आत्महत्या का केस भी सामने आया, जहां उसने पत्नी की वजह से आत्महत्या कर ली। वहीं, हाल ही में सोनम-राजा रघुंवशी केस ने तो पूरे समाज को ही हिलाकर रख दिया। हालांकि यह केवल ऐसे केस हैं, जो सुर्खियों में रहे, लेकिन ऐसे ढेरों केसों की लंबी फेहरिस्त है, जो गैलप के आंकड़े को सच साबित करती है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि महिलाओं में इतना गुस्सा क्यों बढ़ रहा है? समाजशास्त्री कहते हैं कि “इस समय बढ़ती आत्मनिर्भरता के बीच महिलाएं घर के अंदर पितृसत्तात्मक व्यवस्था और घर के बाहर मुक्त माहौल के बीच के अंतर को साफ महसूस कर पा रही हैं। घर में वे बेशक इन बंधनों को मान लेती हैं, लेकिन बाहर इसे स्वीकार नहीं करतीं। इसलिए कह सकते हैं कि यह भी एक वजह है महिलाओं में गुस्सा बढ़ने की।”
हालांकि मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि महिलाओं में गुस्सा बढ़ने की कई वजहें हो सकती हैं। इनमें हार्मोनल बदलाव (जैसे पीरियड्स, प्रेग्नेंसी या मेनोपॉज), मानसिक तनाव, नींद की कमी, घरेलू जिम्मेदारियों का दबाव, भावनात्मक उपेक्षा और सामाजिक अपेक्षाएं शामिल हैं, जिनकी वजह कभी-कभी छोटी बात पर भी महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ता है।
दिमाग का धैर्य टूट रहा
गैलप वर्ल्ड पोल के अनुसार, पिछले एक दशक में महिलाओं में गुस्से का स्तर पुरुषों की तुलना में 6 प्रतिशत अधिक बढ़ा है। भारत में यह अंतर और भी अधिक है, यहां महिलाओं में गुस्से का स्तर 40.6 प्रतिशत और पुरुषों में 27.8 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से 12 प्रतिशत अधिक है। कह सकते हैं कि आज की तेज रफ्तार जिंदगी में गुस्सा एक आम मानसिक प्रतिक्रिया बनता जा रहा है। चाहे बच्चे हों या बड़े, पुरुष हों या महिलाएं, हर वर्ग के लोग छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। मनोवैज्ञानिक इसके पीछे कई सामाजिक, मानसिक और तकनीकी कारण बताते हैं।
इनमें सबसे पहला कारण है- तनाव और प्रतिस्पर्धा। आज की जीवन-शैली में व्यक्ति पर नौकरी, पढ़ाई, कॅरिअर और रिश्तों की जिम्मेदारियों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। लोग अपनी उम्मीदों और दूसरों की अपेक्षाओं के बीच झूल रहे हैं, जिससे मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है और गुस्सा फूट रहा है।
दूसरा बड़ा कारण है- डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया। लोग दिन भर फोन में व्यस्त रहते हैं। इससे रूबरू बातचीत कम होती जा रही है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट’ जिंदगी दूसरों से तुलना को जन्म देती है, जिससे असंतोष और चिढ़ पैदा होती है। वहीं, इंटरनेट पर बढ़ते ट्रोल और नकारात्मक कंटेंट भी मानसिक स्थिति को प्रभावित करते हैं। नींद की कमी, अस्वस्थ खान-पान और शारीरिक गतिविधि की कमी भी गुस्से को बढ़ाते हैं। जब शरीर थका हुआ होता है तो दिमाग का धैर्य जल्दी टूटता है।
तीसरी वजह यह है कि सहनशीलता और संवाद की कला कम होती जा रही है। लोग बात करने के बजाय तुरंत प्रतिक्रिया देने लगे हैं। रिश्तों में समझ और संयम की जगह तकरार और तात्कालिक भावनाएं हावी हो जा रही हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच वैश्विक रूप से लोगों के गुस्से में वृद्धि हुई है? गैलप वर्ल्ड पोल की रिपोर्ट के आंकड़ों को देखें तो यह सच लगता है कि न केवल महिलाओं, बल्कि समाज में भी नकारात्मक भावनाएं, जैसे गुस्सा, तनाव और चिंता का स्तर बढ़ा है। हालांकि यह कहना कि सभी लोगों में गुस्सा बढ़ा है, सामान्यीकरण होगा, लेकिन आंकड़े यह जरूर संकेत देते हैं कि भावनात्मक असंतुलन और तनाव पहले से अधिक महसूस किया जा रहा है।
काबू तो करना होगा
गुस्से की भावना को समझना और उसे स्वीकार करना आज के समय में बेहद जरूरी है। पारंपरिक सोच के कारण अक्सर महिलाओं से शांत, संयमित और समझदार बने रहने की उम्मीद की जाती है। यदि वे गुस्सा जाहिर करती हैं तो उन्हें असभ्य या संवेदनहीन कहा जाता है। यह सोच न सिर्फ अनुचित है, बल्कि महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है।
गुस्सा एक स्वाभाविक मानवीय भावना है, जो अन्याय, थकान, असमानता या दबाव की स्थिति में सामने आती है। महिला हो या पुरुष, गुस्से को दबाने से वह अंदर ही अंदर तनाव, चिंता और अवसाद में बदल सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि समाज सभी को अपनी भावनाएं खुलकर और स्वस्थ तरीकों से व्यक्त करने का अवसर दे।
यदि गुस्से की भावना को सही रूप में समझा और स्थान दिया जाए तो यह बदलाव और आत्मसशक्तीकरण का माध्यम भी बन सकता है। इससे न सिर्फ महिलाओं का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि वे समाज में अधिक सशक्त, स्वतंत्र और आत्मविश्वासी होकर प्रखर भूमिकाएं भी निभा सकेंगी।